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सुहागिनों का पर्व:पति की लंबी उम्र और परिवार की समृद्धि के लिए किया जाता है वट सावित्री व्रत

5 दिन पहले
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  • वट वृक्ष के नीचे होती है सावित्री और सत्यवान की मूर्ति की स्थापना, पूजा के बाद की जाती है बरगद की परिक्रमा

हिंदू धर्म में वट सावित्री का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और संतानहीन स्त्रियां गुणवान संतान पाने के लिए रखती हैं। हर साल ज्येष्ठ माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को ये व्रत रखे जाने की परंपरा है। इस साल 10 जून, गुरुवार को ये व्रत किया जाएगा। इसमें बरगद यानी वट की पूजा की जाती है और 3 दिनों तक व्रत रखा जाता है।

वट वृक्ष के नीचे होती है मूर्ति स्थापना
इस व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर नहाने के बाद घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें। इस दिन वट वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व होता है। वृक्ष के नीचे सावित्री और सत्यवान की मूर्ति को रखें। इसके बाद मूर्ति और वृक्ष पर सभी पूजन सामग्री अर्पित करें। लाल कलावे को वृक्ष में सात बार परिक्रमा करते हुए बांधें। इस दिन व्रत कथा सुनकर भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।

पौराणिक कथा
पौराणिक कथा है कि सावित्री नामक एक पतिव्रता स्त्री थी, जिसने यमराज से लड़कर अपने पति के जीवन की रक्षा की थी, उसे पुनर्जीवित किया था। इसके लिए सावित्री ने बिना जल लिए और बगैर कुछ खाए 3 दिनों तक पति के प्राणों के लिए तपस्या की थी।

बरगद के नीचे ही पति को जीवन मिलने के बाद उसी पेड़ के फूल खाकर और जल पीकर सावित्री ने अपना उपवास पूरा किया था। इसलिए तब से बरगद को जीवन देने वाला पेड़ मानकर उसकी पूजा की जाती है। सावित्री के तप को ध्यान में रखकर अपने पति की लंबी उम्र की कामना से सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके ये व्रत रखती हैं व अखंड सुहाग का वर पूजा आराधना से प्राप्त करती हैं।

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