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आषाढ़ में क्या करें, क्या नहीं:इस महीने करना चाहिए नमक, आंवले और छाते का दान, वामन अवतार की पूजा का भी विधान है

5 महीने पहले
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आषाढ़ मास 15 जून से शुरू हुआ है जो कि 13 जुलाई तक रहेगा। इस महीने में स्नान-दान, के साथ सूर्य को अर्घ्य देने और भगवान शिव की उपासना करने की परंपरा है। आषाढ़ मास में भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा का भी विधान है। इस महीने की परंपराएं मौसम को ध्यान में रखते हुए बनाई गई हैं। आषाढ़ मास से ही बारीश शुरू हो जाती है। इसलिए इन दिनों खान-पान के साथ ही कई बातों में बदलाव किया जाता है।

स्कंद पुराण: क्या करें इस महीने में
स्कंद पुराण के अनुसार आषाढ़ महीने में एकभुक्त व्रत करना चाहिए। यानी एक वक्त ही खाना, खाना चाहिए। इसके साथ ही संत और ब्राह्मणों को खड़ाऊ (लकड़ी की चरण पादुका) छाता, नमक तथा आंवले का दान करना चाहिए। इस दान से भगवान वामन प्रसन्न होते हैं। इसके साथ ही लाल कपड़े में गेहूं, लाल चंदन, गुड़ और तांबे के बर्तन का दान करने से सूर्य देवता प्रसन्न होते हैं।

सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और भगवान विष्णु की पूजा
इस महीने के देवता सूर्य और भगवान विष्णु के अवतार वामन है। इसलिए आषाढ़ महीने में इनकी ही पूजा और व्रत करने का महत्व बताया गया है। इस महीने में भगवान वामन और सूर्य की उपासना के दौरान कुछ नियमों को भी ध्यान में रखना चाहिए। जैसे रविवार को भोजन में नमक का उपयोग नहीं करना चाहिए। इस महीने में ज्यादा मसालेदार भोजन से भी बचना चाहिए।

आषाढ़ मास में ब्रह्मचर्य के नियमों का पालना चाहिए। तामसिक चीजों और हर तरह के नशे से भी दूर रहना चाहिए। आषाढ़ महीने में सूर्योदय से पहले उठकर नहाने का बहुत महत्व है। इस महीने में सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और ध्यान की मदद से ऊर्जा को नियंत्रित कर के खुद को निरोगी रखा जा सकता है।

पूर्वाषाढ़ नक्षत्र से बना आषाढ़ मास
पुरी के ज्योतिषाचार्य और धर्म ग्रंथों के जानकार डॉ. गणेश मिश्र बताते हैं कि पंचांग में सभी महीनों के नाम नक्षत्रों के हिसाब से रखे गए हैं। पूर्णिमा को चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसी पर महीने का नाम रखा गया है। आषाढ़ भी पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ नक्षत्रों से बना है। इस महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा इन्हीं दो नक्षत्रों में रहता है। इसलिए ज्योतिषियों ने इस महीने का नाम आषाढ़ रखा है। पूर्णिमा के दिन उत्ताराषाढ़ा नक्षत्र हो तो यह बहुत ही शुभ और पुण्य फलदायी संयोग माना जाता है। इस संयोग में दस विश्वदेवों की पूजा की जाती है।

शिव पूजा का भी विधान
आषाढ़ मास में भगवान शिव की पूजा का विधान भी ग्रंथों में बताया है। इस महीने रोज सुबह शिवलिंग पर दूध में पानी मिलाकर चढ़ाना चाहिए। भांग और धतूरे से शिवलिंग का श्रंगार करना चाहिए। वहीं, शाम को शिव मंदिर में तिल के तेल का दीपक लगाने की भी परंपरा है। आषाढ़ मास में रोज ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करना चाहिए। पूरे महीने इसका जाप करने के बाद श्रावण में इस मंत्र से शिव पूजा करने से विशेष पुण्य मिलता है।

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