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बुधवार को काल भैरव अष्टमी:शिव जी के अवतार हैं काल भैरव, सुख-समृद्धि और अच्छी सेहत की कामना से की जाती है बटुक भैरव की पूजा

3 महीने पहले
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बुधवार, 16 नवंबर को अगहन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी है। पुराने समय में इस तिथि पर शिव जी ने काल भैरव के रूप में अवतार लिया था। सभी पौराणिक देवी मंदिरों के साथ ही काल भैरव के मंदिर भी हैं। इस दिन काल भैरव का सिंदूर और चमेली के तेल से श्रृंगार करना चाहिए। हार-फूल चढ़ाएं, धूप-दीप जलाएं। भैरव महाराज को इमरती का भोग लगाएं।

भैरव अवतार में हैं तीनों गुण

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक शास्त्रों में कुल तीन तरह के गुण बताए गए हैं- सत्व, रज और तम। इन तीन गुणों से मिलकर ही सृष्टि की रचना हुई है। शिव पुराण में लिखा है कि शिव जी कण-कण में विराजित हैं, इस कारण शिव जी इन तीनों गुणों के नियंत्रक हैं। शिव जी को आनंद स्वरूप में शंभू, विकराल स्वरूप में उग्र और सत्व स्वरूप में सात्विक कहा जाता है। शिव जी के ये तीनों गुण भैरव के अलग-अलग स्वरूपों में बताए गए हैं।

जानिए भैरव के तीन स्वरूप और उनकी खास बातें

शास्त्रों में भैरव के 64 स्वरूप तक बताए गए हैं। इन स्वरूपों में बटुक भैरव, काल भैरव और आनंद भैरव खास हैं।

बटुक भैरव - बटुक भैरव को भैरव महाराज का सात्विक और बाल स्वरूप माना जाता है। इनकी पूजा से भक्त को सभी तरह के सुख, लंबी आयु, अच्छी सेहत, मान-सम्मान और ऊंचा पद मिल सकता है।

काल भैरव - ये स्वरूप भैरव का तामस गुण को समर्पित है। ये स्वरूप भक्तों के लिए कल्याणकारी है, इनकी कृपा से भक्त का अनजाना भय दूर होता है। काल भैरव को काल का नियंत्रक माना गया है। इनकी पूजा से भक्त के सभी दुख दूर होते हैं, शत्रुओं का प्रभाव खत्म होता है।

आनंद भैरव - ये भैरव का राजस स्वरूप है। देवी मां की दस महाविद्याएं हैं और हर एक महाविद्या के साथ भैरव की भी पूजा होती है। इनकी पूजा से धन, धर्म की सिद्धियां मिलती हैं।