हेमांबिका मंदिर में मूर्ति नहीं सिर्फ देवी के दो हाथ:कांग्रेस का हाथ का पंजा इसी मंदिर से प्रेरित, इंदिरा गांधी की थी विशेष आस्था

पडक्कल2 महीने पहलेलेखक: सतीश बाबू

आज नवरात्रि का आखिरी दिन है और हम केरल के हेमांबिका मंदिर में हैं। केरल के पडक्कल जिले में मौजूद हेमांबिका मंदिर यहां के बाकी मंदिरों की तुलना में थोड़ा छोटा है, लेकिन इसका इतिहास काफी बड़ा है। इतिहास की बात आई ही है तो केरल और हेमांबिका मंदिर के साथ हम बात करते हैं कांग्रेस की।

हाल ही में राहुल गांधी ने केरल से भारत जोड़ो यात्रा शुरू की है। कांग्रेस के लिए नई जमीन और नई उम्मीदों की खोज की जा रही है। चार दशक पहले इसी केरल से राहुल की दादी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कांग्रेस में नई जान फूंकने की शुरुआत की थी। बात तब की है जब 1975 में इमरजेंसी के बाद कांग्रेस ने जनाधार खो दिया था। कांग्रेस टुकड़ों में बंट रही थी। केरल में भी दो कांग्रेस थीं, पहली कांग्रेस (आई) जिसे यहां के मुख्यमंत्री के. करुणाकरण चला रहे थे और दूसरी कांग्रेस (ए) जो एके एंटोनी की लीडरशिप में थी। इंदिरा गांधी दोनों के कांग्रेस में विलय के लिए यहां आई थीं।

आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि कांग्रेस के इस इतिहास का हेमांबिका मंदिर से क्या संबंध है?

चलिए बताते हैं… उन दिनों इलेक्शन कमीशन ने कांग्रेस का चुनाव चिह्न गाय-बछड़ा निरस्त कर दिया था। कांग्रेस नए चुनाव चिन्ह के लिए चुनाव आयोग के दिए विकल्पों पर विचार कर रही थी। इसमें हाथ का पंजा था, हाथी भी था और कुछ और चिन्ह भी थे, लेकिन इंदिरा गांधी ने हाथ का पंजा चुना।

अब इसका भी हेमांबिका मंदिर से क्या संबंध है?

दरअसल, ये हाथ का पंजा इंदिरा गांधी ने इसी हेमांबिका मंदिर को ध्यान में रखकर चुना था। हेमांबिका मंदिर दुनियाभर के माता मंदिरों में सबसे अनूठा है। यहां माता की मूर्ति नहीं है। सिर्फ दो हाथ हैं। इन्हीं को देवी रूप में पूजा जाता है। इस मंदिर को इमूर भगवती मंदिर भी कहा जाता है। ये केरल के पडक्कल जिले की कलेकुलंगरा तहसील में है। माना जाता है भगवान परशुराम ने इस मंदिर की स्थापना की थी।

13 दिसंबर 1982 को जब इंदिरा गांधी मंदिर आई थीं, तब केरल के पारंपरिक वाद्य यंत्रों और गीतों से उनका स्वागत हुआ और ऐसे ही दल के साथ वो मंदिर गई थीं।
13 दिसंबर 1982 को जब इंदिरा गांधी मंदिर आई थीं, तब केरल के पारंपरिक वाद्य यंत्रों और गीतों से उनका स्वागत हुआ और ऐसे ही दल के साथ वो मंदिर गई थीं।

सुप्रीम कोर्ट जज की पत्नी की सलाह पर इंदिरा गांधी ने चुना था पंजा

पडक्कल के पूर्व सांसद वी.एस. विजयराघवन कहते हैं कि 1980 के आसपास इंदिरा जी यहां आई थीं। वे मुख्यमंत्री के. करुणाकरण के साथ मंदिर गई थीं। तब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस पी.एस, कैलासम की पत्नी सौंदर्या कैलासम ने इंदिरा गांधी को इस मंदिर की महिमा और विशेष मूर्ति के बारे में बताया था। कैलासम परिवार नेहरू परिवार के नजदीक था। इंदिरा जी को हेमांबिका मंदिर की दो हाथ वाली मूर्ति से ही ये प्रेरणा मिली और उन्होंने चुनाव चिह्न के तौर पर हाथ का पंजा चुना। 1980 में कांग्रेस की वापसी इसी चुनाव चिह्न से हुई।

13 दिसंबर 1982 को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब मंदिर में दर्शन किए तो वहां रजिस्टर पर नोट लिखा था। मंदिर समिति ने इसमें लिखा है कि उन्होंने यहां एक बड़ा तांबे का घंटा भी चढ़ाया था।
13 दिसंबर 1982 को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब मंदिर में दर्शन किए तो वहां रजिस्टर पर नोट लिखा था। मंदिर समिति ने इसमें लिखा है कि उन्होंने यहां एक बड़ा तांबे का घंटा भी चढ़ाया था।

चुनाव जीतीं तो इंदिरा गांधी ने चढ़ाए 5001 रु.

मंदिर के पुजारी कैमुकू वासुदेवन नंबूदिरी कहते हैं जब 1980 में कांग्रेस फिर सत्ता में आ गई तो मुख्यमंत्री के. करुणाकरण के साथ 1982 में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के तौर पर यहां आईं, तब उन्होंने मंदिर में 5001 रुपए और एक बड़ा घंटा भी चढ़ाया था। तब यहां के राज परिवार ने उन्हें एक लॉकेट गिफ्ट किया था जिसमें मंदिर की मूर्ति के प्रतीक दोनों हाथ के पंजे थे।

माता हेमांबिका का चित्र। इन्हीं दो हाथों की पूजा मंदिर में की जाती है।
माता हेमांबिका का चित्र। इन्हीं दो हाथों की पूजा मंदिर में की जाती है।

1500 साल पुराना मंदिर, दो कहानियां दो हाथ वाली मूर्ति की

मंदिर का मौजूदा स्ट्रक्चर करीब 1500 साल पुराना है। इस मंदिर को लेकर दो तरह की कहानियां हैं। एक कहानी कहती है कि एक राक्षस के हमले से बचने के लिए पार्वती जी भाग रही थीं और वो इस जगह मौजूद तालाब में गिर गईं। उन्होंने दोनों हाथ उठाकर शिव को बचाने के लिए पुकारा, शिव आए और राक्षस का वध किया। पानी के ऊपर उठे पार्वती के वो ही दो हाथ यहां मूर्ति के रूप में स्थापित हो गए।

दूसरी कहानी पं. वासुदेवन नंबूदिरी बताते हैं कि कल्लेकुलंगरा का एक पुजारी लगभग 15 किलोमीटर दूर मलमपुझा के अकमलावरम मंदिर में रोज पूजा करने जाता था। जब वह बूढ़ा हो गया, तो उसने देवी मां से कुछ वैकल्पिक रास्ता निकालने की प्रार्थना की। एक दिन कल्लेकुलंगरा के तालाब में नहाते समय उन्होंने एक महिला को डूबते देखा, जिसके केवल दो हाथ दिखाई दे रहे थे। जब स्थानीय लोगों ने महिला को बचाने की कोशिश की, तो वह एक मूर्ति बन गई। लोगों ने उन्हीं दो हाथों की मूर्ति को यहां स्थापित कर दिया। इस तरह यह मंदिर लगभग 1,500 साल पहले अस्तित्व में आया।

मंदिर में मौजूद तालाब, जिसको लेकर मान्यता है कि माता हेमांबिका की प्रतिमा यहीं मिली थी।
मंदिर में मौजूद तालाब, जिसको लेकर मान्यता है कि माता हेमांबिका की प्रतिमा यहीं मिली थी।

4 अंबिका मंदिरों में से एक है हेमांबिका

पं. नंबूदिरी बताते हैं- हेमांबिका मंदिर देवी के 4 प्रमुख अंबिका मंदिरों में से एक है, जिनकी स्थापना भगवान परशुराम ने की थी। तीन और मंदिर हैं, एक मूकांबिका जो उडुपी में है, दूसरा लोकांबिका जो केरल के ही कोडूंगालूर में है और तीसरा बालांबिका मंदिर जो कन्याकुमारी में है। इन चारों मंदिरों को अंबीकलायम कहते हैं।

पहले राज परिवार का मंदिर था, अब देवस्वम बोर्ड का

मंदिर के प्रबंधक पी.मोहनसुंदन कहते हैं यह मंदिर पलक्कट्टुसरी शेखरी वर्मा वलिया राजा के अधीन था जिसे बाद में मालाबार देवस्वम बोर्ड ने अपने अधिकार में ले लिया। आज भी इस मंदिर में पलक्कट्टूसरी राजा का राज्याभिषेक किया जाता है। मंदिर के तालाब का जीर्णोद्धार किया गया है और गर्भगृह को आगे ले जाने का भी प्रस्ताव है। मंदिर में पूजा का समय सुबह 5 बजे से 11.30 बजे तक और शाम 5 बजे से रात 8 बजे तक होता है।

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