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पुस्तक समीक्षा

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 01:15 PM IST

प्रोफेसर राम कृष्ण सिंह धनबाद में रहते हैं और उनकी दो पुस्तकें ‘गॉड टू अवेट्स लाइट’, ‘ग्रोइंग विदिन’ आई है। एक...
प्रोफेसर राम कृष्ण सिंह धनबाद में रहते हैं और उनकी दो पुस्तकें ‘गॉड टू अवेट्स लाइट’, ‘ग्रोइंग विदिन’ आई है।

एक समीक्षक, आलोचक और एक समकालीन कवि, प्रोफेसर राम कृष्ण सिंह धनबाद में रहते हैं और कई वर्षों से अंग्रेजी भाषा में लेखन करते आ रहे हैं। इनके करीब 160 शोध लेख, 175 पुस्तक समीक्षाएं और 42 किताबें छप चुकी हैं। इनकी कविताएं दर्जनों शोध ग्रंथों में, करीब 80 शोध लेखों में और 4 पुस्तकों में अन्वेषित की जा चुकी हैं। भारतीय अंग्रेजी हाइकू शैली में इनका नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इनकी कविताएं कई भाषाओं में (करीब 28 भाषा में) अनुदित हो चुकी हैं। अधिकतर हाइकू एवं टांका जैसे जापानी शैली में लिखने वाले डॉ. सिंह की कविताएं प्रथम दृश्या सरल लग सकती हैं, लेकिन उन कविताओं की गहराई को समझ पाना उतना ही मुश्किल है, जितना किसी मिट्टी के दलदल से मोती ढूंढ़ना। हाल में ही प्रो. सिंह की दो नई कविता संग्रह छपकर आई हैं, जिनमें से एक ‘गॉड टू अवेट्स लाइट’ टांका-हाइकू-टांका की प्रयोगात्मक शैली में लिखी गई है और दूसरी ‘ग्रोइंग विदिन’ रोमानियन और अंग्रेजी भाषा में कोंस्टांटा से छापी गई है।

‘बॉडीगार्ड/ हाउस-के बरामदे में/तितली के/टूटे पंख को खींचती/एक काली चींटी/सिर पर मंडराते बिखरे बादल/देते श्रद्धांजलि’ (ग्रोइंग विदिन)

‘छतरी के भीतर/चेहरा पोंछता/किताबों संग एक बूढ़ा’ (गॉड टू अवेट्स लाइट)

चूंकि राम कृष्ण सिंह यथार्थवादी हैं वे अपनी कविताओं में भी यथार्थ प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। उनकी कविताओं की केंद्र बिंदु पर आध्यात्मिक खोज, अंतरात्मा एवं सांसारिक समझ, सामाजिक अन्याय तथा विघटन, मानव पीड़ा, संबंधों का पतन, राजनैतिक भ्रष्टाचार, कट्टरवाद, शहरी जीवन का खोखलापन एवं झूठे मूल्य, पक्षपात, एकाकीपन, यौन संबंध, प्रेम, व्यंग्य तथा असहिष्णुता जैसे प्रसंग होते हैं।

‘छत पर/उसके गीले कपड़े से/छिपती-छिपाती गरीबी/खुद से वो बातें करती/धिक्कारती उस दिन को/जब वो जन्मी और छोड़ी गई/लिंग, सेक्स और जवानी की/खरीद-फरोख्त में...’ (ग्रोइंग विदिन)

एजरा पाउंड ने कहा था कि भाषा में अधिकतम संभावित अर्थ का परिपूर्ण होना मात्र महान साहित्य है। यह कथन डॉ. सिंह की कविताओं के लिए भी उपयुक्त है। उनकी कसी हुई भाषा पाठकों को स्वतंत्र व्याख्या की छूट देती है। डॉ. राम कृष्ण सिंह की शैली के कुछ प्रमुख पहलू इस प्रकार है- विशेष प्रभाव के लिए भाषा का हेर-फेर, विराम चिह्नों का अभाव, शीर्षकों का अभाव शृंगारिक रूपकों का प्रयोग तथा कठोर वास्तविकताओं का चित्रण। उनकी कविताएं पाठकों के मन में स्थाई आंतरिक प्रभाव छोड़ जाती हैं।

डॉ. सिंह के अनुसार, ‘कविता एक कला है, एक शाब्दिक कला, जो प्रभावशाली होने पर कुछ शारीरिक, भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक संवेदनाओं को उजागर करती हैं।’ ध्यान रखने योग्य बात यह है कि एक संवेदनशील तथा प्रयोगात्मक कवि को समझने की कला केवल धैर्यवान पाठकों में ही होती है। अब प्रश्न आपसे है, क्या आप में धैर्य है?

वर्षा सिंह, धनबाद

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