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धनबाद : 1916 में बांग्ला समाज ने निकाली पहली यात्रा

नबाद में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकालने का 102 वर्ष का लंबा इतिहास है। हीरापुर में 1916 में पहली बार रथयात्रा शुरू...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jul 14, 2018, 03:05 AM IST

धनबाद : 1916 में बांग्ला समाज ने निकाली पहली यात्रा
नबाद में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकालने का 102 वर्ष का लंबा इतिहास है। हीरापुर में 1916 में पहली बार रथयात्रा शुरू हुई। हीरापुर हरि मंदिर कमेटी के सीनियर सदस्य अशोक चटर्जी बताते हैं कि अधिवक्ता जेसी मल्लिक और गौर शंकर मजुमदार के सहयोग से रथयात्रा शुरू हुई। मंदिर के एक साइड में मौसी बाड़ी बनवाया गया। धनबाद में रहने वाले उड़िया समाज के लोगों ने 1977 में हावड़ा मोटर के पास से छोटा-सा रथ बनवाकर उसपर रथयात्रा शुरू की। 1997 में धनसार में जगन्नाथ मंदिर बनने के बाद वहां से यात्रा होती है।



इसलिए है खास : कोलकाता के चीतपुर से खास पीतल का रथ बनकर आया। उसमें भगवान जगन्नाथ को बैठाकर रथयात्रा निकाली गई। रथयात्रा हटिया मोड़ होते हुए ज्ञान मुखर्जी रोड रोड होते हुए मंदिर परिसर में आती है।

सरायकेला: मौसीबाड़ी जाने में दो दिनों का लगता है समय

रायकेला में परंपरा के अनुसार भगवान जगन्नाथ के जाने और लौटने की रथयात्रा एक नहीं बल्कि दो दिनों में पूरी होती है। मौसी बाड़ी जाने और लौटने के दौरान रास्ते में भगवान एक दिन का विश्राम करते हैं। साथ ही मौसी बाड़ी में प्रवास के दौरान अलग-अलग दिनों में भगवान के अलग अलग रूपों की सज्जा भी होती है। सरायकेला के तत्कालीन राजा अभिराम सिंह सन् 1680 में युद्ध में जा रहे थे तभी उन्होंने जंगल में भगवना जगन्नाथ की पूजा-अर्चना की। कुछ वर्षों के बाद सरायकेला के राजा उदित नारायण सिंहदेव ने वर्तमान जगन्नाथ मंदिर की स्थापना की।



इसलिए है खास : यहां रथयात्रा और घुरती रथयात्रा दो दिनों में पूरी होती है। मंदिर से निकलने के बाद भगवान बीच में एक दिन विश्राम करते हैं, फिर दूसरे दिन यात्रा पूरी होती है। उसी तरह घुरती रथयात्रा भी दो दिनों में पूरी होती है।

जमशेदपुर: 45 फीट ऊंचा रथ है आकर्षण का केंद्र

मशेदपुर में रथयात्रा की शुरुआत बेल्डीह नागा मंदिर में 1936 में हुई थी। उसी साल धालभूमगढ़ के राजा ने नागा साधुओं को भगवान जगन्नाथ की मूर्ति और रथ भेंट किया। कुछ वर्षों के बाद मंदिर के पुजारी पंडित गणेश तिवारी (अब स्वर्गीय) ने आयोजन की कमान संभाली। अब उनके दो पुत्र सुरेश तिवारी और शशि तिवारी यहां रथयात्रा का आयोजन कर रहे हैं। इस बार रथ को नए सिरे से तैयार किया जा रहा है। इस समय सबसे भव्य रूप से इस्कॉन की रथयात्रा होती है। 15 साल पहले शहर में इस रथयात्रा की शुरुआत हुई थी।



इसलिए है खास : इस्कॉन में तीन साल पहले 45 फीट ऊंचा और 15 फीट चौड़ा लोहे का रथ बनाया गया, जो पूरी तरह से मॉडर्न है। इसकी हाइट रिमोट द्वारा ऊंची या नीची की जा सकती है।

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