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540 गांवों में 11 साल पहले 3 दिन के लिए आई थी बिजली, 350 टोलों में आज भी नहीं

सरकार भले ही शत-प्रतिशत गावों के सौ फीसदी घरों को बिजली से आच्छादित करने का दावा कर रही है, लेकिन इसकी जमीनी हकीकत...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 03, 2018, 02:45 AM IST

540 गांवों में 11 साल पहले 3 दिन के लिए आई थी बिजली, 350 टोलों में आज भी नहीं
सरकार भले ही शत-प्रतिशत गावों के सौ फीसदी घरों को बिजली से आच्छादित करने का दावा कर रही है, लेकिन इसकी जमीनी हकीकत ठीक इसके विपरीत है। गिरिडीह जिले के ग्रामीण इलाकों में बिजली की आज भी दुर्दशा है। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत गावों को बिजली से आच्छादित करने की कोशिश हुई। जिसमें 85 फीसदी गावों में आधारभूत संरचना के तहत पोल व खंभे जरूर लगाए गए, लेकिन बिजली आपूर्ति नियमित नहीं हो पाई। शुरूआती दौर में कुछ गावों में बिजली जली लेकिन खानापूरी के तौर पर लगाए गए 10 व 25 केवीए के ट्रांसफार्मर सप्ताह दिनों के अंदर जल गई। गौरतलब है कि गिरिडीह जिले में 2700 राजस्व गांव है। कांग्रेस शासन में इन गावों के विद्युतीकरण का टेंडर डीवीसी को मिला। करीब ढाई वर्षों तक विद्युतीकरण का काम चला। जिसमें करीब 2400 गावों तक बिजली के खंभे व तार लग गए। विवादों में रहे 300 गावों में डीवीसी ने काम करने से इनकार कर दिया था। बाद में जेएसईबी के माध्यम से इन गावों में कागजी तौर पर विद्युतीकरण कार्य को पूरा किया गया। लेकिन देवरी, तिसरी, गावां प्रखंड के कई सुदूर इलाके इससे वंचित रह गए, जिसमें इन तीनों प्रखंडों के करीब 350 टोले ऐसे हैं, जहां बिजली के तार व पोल भी नहीं पहुंची है। फिलहाल गिरिडीह जिले के 30 फीसदी गांव ऐसे हैं जहां के लोगों को नियमित 5 से 6 घंटे बिजली मिलती है। जबकि 20 फीसदी गावों में 1 से 2 घंटे, 15 फीसदी गांवों में सप्ताह में एक-दो दिन सिर्फ 1-2 घंटा, 20 फीसदी गांव ऐसे हैं जहां शुरूआती दौर में ही 7-8 दिनों तक बिजली मिली इसके बाद आपूर्ति बंद हो गई।

ग्राउंड रिपोर्ट : एक

बिजली से वंचित कोवाटांड़ के ग्रामीण।

देवरी प्रखंड के तिलकडीह पंचायत में स्थित 40 घरों वाला कोवाटांड़ टोला की आबादी 360 लोगों की है। इस टोले में आज तक बिजली तो दूर बिजली खंभे व तार भी नहीं पहुंचे हैं। खासकर जो गांव से बाहर नहीं निकले हैं, उसने आज तक बिजली को देखा भी नहीं हैं। अब भी इस टोले के लोग केरोसिन, ढिबरी व लालटेन पर ही निर्भर हैं। हालांकि तिलकडीह पंचायत मुख्यालय में बिजली के खंभे व तार लगे हैं, जहां के लोगों को 1-2 घंटे बिजली प्रतिदिन मिल रही है। कोवाटांड़ गांव का जायजा लेने जब दैनिक भास्कर की टीम पहुंची और बिजली का मसला वहां रखा तो यह सुनते की काफी संख्या में लोग जुट गए और काफी खुश हुए। बार-बार लोग ये जानने को उत्सुक थे कि आखिर बिजली इस टोले में कब आएगी। इसी बीच एक शिक्षित महिला पहुंची, उसने बताया कि 2005 में विद्युतीकरण का सर्वे करने एक टीम आई थी। टीम के लोग बीपीएल लाभुकों की सूची तैयार कर आश्वस्त कर गई थी कि उन लोगों को मुफ्त में मीटर, बॉल व बिजली मिलेगा। लेकिन फिर कोई दोबारा नहीं आया। इस तरह आजाद भारत में भी अब तक इस गांव के लोगों को बिजली नसीब नहीं हो पाया है।

प्रवीण राय | गिरिडीह

सरकार भले ही शत-प्रतिशत गावों के सौ फीसदी घरों को बिजली से आच्छादित करने का दावा कर रही है, लेकिन इसकी जमीनी हकीकत ठीक इसके विपरीत है। गिरिडीह जिले के ग्रामीण इलाकों में बिजली की आज भी दुर्दशा है। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के तहत गावों को बिजली से आच्छादित करने की कोशिश हुई। जिसमें 85 फीसदी गावों में आधारभूत संरचना के तहत पोल व खंभे जरूर लगाए गए, लेकिन बिजली आपूर्ति नियमित नहीं हो पाई। शुरूआती दौर में कुछ गावों में बिजली जली लेकिन खानापूरी के तौर पर लगाए गए 10 व 25 केवीए के ट्रांसफार्मर सप्ताह दिनों के अंदर जल गई। गौरतलब है कि गिरिडीह जिले में 2700 राजस्व गांव है। कांग्रेस शासन में इन गावों के विद्युतीकरण का टेंडर डीवीसी को मिला। करीब ढाई वर्षों तक विद्युतीकरण का काम चला। जिसमें करीब 2400 गावों तक बिजली के खंभे व तार लग गए। विवादों में रहे 300 गावों में डीवीसी ने काम करने से इनकार कर दिया था। बाद में जेएसईबी के माध्यम से इन गावों में कागजी तौर पर विद्युतीकरण कार्य को पूरा किया गया। लेकिन देवरी, तिसरी, गावां प्रखंड के कई सुदूर इलाके इससे वंचित रह गए, जिसमें इन तीनों प्रखंडों के करीब 350 टोले ऐसे हैं, जहां बिजली के तार व पोल भी नहीं पहुंची है। फिलहाल गिरिडीह जिले के 30 फीसदी गांव ऐसे हैं जहां के लोगों को नियमित 5 से 6 घंटे बिजली मिलती है। जबकि 20 फीसदी गावों में 1 से 2 घंटे, 15 फीसदी गांवों में सप्ताह में एक-दो दिन सिर्फ 1-2 घंटा, 20 फीसदी गांव ऐसे हैं जहां शुरूआती दौर में ही 7-8 दिनों तक बिजली मिली इसके बाद आपूर्ति बंद हो गई।

वंचित गावों को चिन्हित कर किया जा रहा काम : एसी

पहले क्या हुआ इस पर तो कुछ नहीं बता सकते, लेकिन जिन गावों से ट्रांसफार्मर जलने की सूचना मिल रही है, वहां बदले जा रहे हैं। कुछ टोले जहां बिजली पोल व खंभे नहीं लगाए गए हैं उसे चिन्हित किया जा रहा है। गावों में बिजली खपत के अनुरूप क्षमतावान ट्रांसफार्मर लगाए जा रहे हैं। जिले के शत-प्रतिशत गावों में जल्द से जल्द बिजली सेवा बहाल की जाएगी। सरकार की ज्योति मिशन, सौभाग्य योजना व पंडित दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना के तहत एक भी गांव, टोला व घर बिजली सेवा से वंचित नहीं रहेगा, इसकी वृहत तैयारी की जा रही है।’’ संजय सिंह, अधीक्षण अभियंता, जेएसईबी

ग्राउंड रिपोर्ट : दो

जगैय गांव जहां 11 सालों से जला है ट्रांसफार्मर।

देवरी प्रखंड के घसकरीडीह पंचायत में स्थित 42 घरों वाला जगैय गांव, जहां की आबादी करीब 380 लोगों की है। यहां बिजली के तार व खंभे के साथ जले हुए 10 केवीए के ट्रांसफार्मर भी पोल में लगे हैं। लेकिन यहां पिछले 12 सालों से बिजली नहीं जली है। 2006 में विद्युतीकरण के बाद जब लाईन चालू किया गया, उसके बाद तीन दिनों तक कुछ घरों में बिजली जली। इसके बाद तेज आवाज के साथ ट्रांसफार्मर उड़ गया। इसके बाद ट्रांसफार्मर बदलने को लेकर जनप्रतिनिधियों व विभाग के अधिकारियों से लोग पत्राचार करते रहे, लेकिन ट्रांसफार्मर नहीं बदले गए। इस तरह लोग पहले जो स्थिति में थे, वही स्थिति में आ गए। जहां बिजली के तार व खंभे और जले ट्रांसफार्मर शोभा की वस्तु बनी हुई है। गांव के बाबुराम सोरेन, नेका हेम्ब्रम, जीतन हेम्ब्रम, अनिल मरांडी, शेलेन्द्र यादव, मनोहर यादव, राजकुमार यादव, कैलाश हाजरा, सहदेव हाजरा, इतवारी यादव, चिन्ता देवी, मंजू देवी, मीणा देवी आदि ने बताया कि ट्रांसफार्मर बदलने व विद्युत सेवा बहाल की मांग को लेकर प्रखंड से लेकर जिला तक कई बार पत्राचार किया। प्रखंड कार्यालय में धरना भी दिया, बावजूद न तो ट्रांसफार्मर बदला गया।

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