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भगवान जगन्नाथ को दाल-भात-सब्जी का लगता है भोग

रातू किला की ऐतिहासिक रथयात्रा का इतिहास 160 वर्ष से भी ज्यादा पुराना है। महाराजा प्रताप उदयनाथ शाहदेव के द्वारा...

Bhaskar News Network| Last Modified - Jul 14, 2018, 02:45 AM IST

भगवान जगन्नाथ को दाल-भात-सब्जी का लगता है भोग
भगवान जगन्नाथ को दाल-भात-सब्जी का लगता है भोग
रातू किला की ऐतिहासिक रथयात्रा का इतिहास 160 वर्ष से भी ज्यादा पुराना है। महाराजा प्रताप उदयनाथ शाहदेव के द्वारा रातू में रथयात्रा की शुरुआत की गई। इससे पूर्व भगवान के विग्रहों की सिर्फ पूजा की जाती थी। महाराजा उदयनाथ ने पुरी से भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा व भाई बलभद्र के विग्रहों को मंगा कर रातू किला में विधि पूर्वक पूजा-अर्चना शुरू की। रातू किला की रथयात्रा को छोटकागढ़ के नाम से भी जाना जाता है। वहीं जगन्नाथपुर की रथयात्रा को बड़कागढ़ के नाम से जाना जाता है। महाराज के मृत्यु होने के बाद इस प्रथा को उनकी पुत्री व पुत्रवधू द्वारा आज भी जारी रखा गया है। भगवान जगन्नाथ को दाल-भात व सब्जी विशेष प्रिय है, इसलिए भगवान को इन्हीं चीजों का भोग चढ़ाया जाता है। राजपुरोहित कामदेवनाथ मिश्र व करुणा मिश्रा प्रतिदिन भगवान को भोग चढ़ाते हैं।

इटकी : 250 वर्षों का इतिहास

इटकी ठाकुरगांव में रथयात्रा का इतिहास ढाई सौ वर्ष पुराना है। जमींदार मंगल साय को संतान नहीं हो रही थी। मन्नत मांगने प|ी के साथ पैदल पुरी गए। पूजा के उपरांत उन्हें संतानोत्पत्ति का स्वप्न मिला। कुछ दिनों बाद उनकी मन्नत पूरी हुई तो मिट्टी का मंदिर बनाकर जगन्नाथ स्वामी को स्थापित करके पहली बार रथयात्रा निकाली।

रामगढ़ : पुरी से जुड़ाव

कैथा जगन्नाथ मंदिर का पुरी जगन्नाथ धाम से सीधा जुड़ाव है। 1948 में स्थापित इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ मंदिर पुरी से लकड़ी लाकर भगवान का विग्रह बनाया गया था। 1945 में स्वामी शरणानंद स्वामी सत्संग कथा करते हुए कैथा पहुंचे, जहां रथयात्रा निकालने की सोची। इसके बाद 1948 से रथयात्रा यहां शुरू हुई।

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