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हल चलाता किसान या 4000 करोड़ के घोटाले का आरोपी... मधु कोड़ा का सच क्या है?

Dainik Bhaskar

Jul 05, 2018, 02:50 AM IST

Jagannathpur News - झारखंड में पहले निर्दलीय मुख्यमंत्री के रूप में पहचान बनाने वाले मधु कोड़ा की छवि 4000 करोड़ के घोटाले में आरोपी बनाए...

हल चलाता किसान या 4000 करोड़ के घोटाले का आरोपी... मधु कोड़ा का सच क्या है?
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झारखंड में पहले निर्दलीय मुख्यमंत्री के रूप में पहचान बनाने वाले मधु कोड़ा की छवि 4000 करोड़ के घोटाले में आरोपी बनाए जाने के बाद धूमिल हुई है। मगर मधु कोड़ा का कहना है कि वे राज्य की राजनीति में सशक्त चेहरा बन उभर रहे थे, इसीलिए उन्हें फंसाया गया। उन्होंने साफ कहा कि समय आने पर फंसाने वालों का नाम भी वे उजागर करेंगे। घोटाले की जांच कर रही एजेंसियों पर सवाल उठाते हुए वे बोले कि 9 साल की जांच में कोई एजेंसी घोटाले की रकम तक पता नहीं कर पाई। मंगलवार को दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने घोटाले के आरोपों से लेकर राज्य के मौजूदा मुद्दों तक हर विषय पर बातचीत की। प्रमुख अंश-

कांग्रेस चाहती थी मैं पार्टी में शामिल हो जाऊं...नहीं मानने का खामियाजा भुगता


-मैं किसान परिवार से हूं। खेती में हमारी रुचि है। जहां तक 4000 करोड़ के घोटाले का आरोप है, विभिन्न एजेंसियो द्वारा पिछले 8-9 साल से जांच चल रही है। इन एजेंसियों ने अलग अलग जांच कर आरोप तय किये हैं। किसी ने 1500 करोड़, किसी ने 3500 करोड़ और किसी ने 14 करोड़। मुझे समझ में नहीं आता कि आरोप पत्र में अंतर क्यों? सच यह है कि जांच एजेंसियां किसी तरह मुझे फंसाना चाहती है। मुझ पर लगा आरोप पूरी तरह गलत और झूठा है।


-मैं एक निर्दलीय की हैसियत से मुख्यमंत्री बना। कांग्रेस चाहती थी कि मैं उसके दल में शामिल हो जाऊं। कांग्रेस में शामिल नहीं होने का मुझे खामियाजा भुगतना पड़ा। फिर जिसे जहां अवसर मिला, उसी ने मुझे फंसाने का पूरा प्रयास किया।


समय आने पर नाम भी उजागर करेंगे। फंसाने वाले भी अब महसूस कर रहे हैं कि उन्होंने गलत किया। अवैध खनन के विरुद्ध भी मैं आवाज उठाता रहा हूं। इस कारण मुझे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।


-कुछ लोग पत्थलगढ़ी की परंपरा का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। कुछ लोग संविधान की गलत व्याख्या कर देश के कानून के विरुद्ध अविश्वास पैदा कर रहे हैं।


-सीएनटी-एसपीटी एक्ट और भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल में भी सुधार की जरूरत है। जो रैयत की जमीन है, उसे सरकार विभिन्न सरकारी योजनाओं और परियोजनाओं के लिए लेने का रास्ता बनाया है। लेकिन यह प्रावधान नहीं किया गया कि रैयत की जमीन के विकास का क्या प्रावधान होगा। हिमाचल में रैयत की जमीन पर परियोजना आने पर उसमें रैयतों को हिस्सेदारी मिलती है। हमे व्यवस्था यह करनी चाहिए कि रैयतों की जमीन का व्यवसायिक उपयोग के लिए ऋण की सुविधा दिलायें। एसटी,एससी और ओबीसी की जमीन पर व्यवसायिक गतिविधियों के लिए बैंक का ऋण मिले ताकि उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो।


-मैंने झारखंड की छवि धूमिल नहीं की। मुझे माध्यम बना कर झारखंड की छवि खराब करने की कोशिश की गई।


-यह ऐसा विषय है जिसका आज तक सटीक व्याख्या नहीं हो सकी। जब जो सरकार आती है उसकी उसी तरह से व्याख्या करती है। रीति-रिवाज, रूढ़ी प्रथा, संस्कार और संस्कृति, सब मिल कर धर्म बनता है। इसी से लोगों की पहचान होती है। इसी आधार पर धर्म की व्याख्या महापंडितों ने भी की। ऐसी स्थिति में किसी ठोस निर्णय पर पहुंचना आसान नहीं। सरकारी व न्यायालयी आदेशों में धर्म की अलग अलग व्याख्या है। इसलिए निर्णय लेने से पूर्व सटीक व्याख्या होनी चाहिए। वैसे मेरा मानना है कि जन्म से मरण तक जो हमारी रीति रिवाज है, वही हमारी पहचान है।


-इस पर अभी भी अनिश्चितता का माहौल है। नियोजन और शिक्षण में उन्हें परेशानी हो रही है।दो दिन की सरकारी नौकरी करनेवाला भी स्थानीय और वर्षों से रह रहे लोग आवासीय के लिए प्रखंड और अंचल कार्यालय का चक्कर काट रहे हैं। जबकि वह पुरखों से यहां रह रहे हैं। खतियान हो या न हो, वर्षों से रहनेवाले लोगों को भी स्थानीय माना जाना चाहिए।


-झारखंड की राजनीति में पिछले कई वर्षों में काफी गिरावट आयी है। इससे आम जनता और खास कर बुद्धिजीवी काफी चिंतित हैं। जिस उद्देश्य से झारखंड अलग राज्य का निर्माण हुआ, उस लक्ष्य को पूरा नहीं किया जा सका। सरकार भी सामाजिक परिवेश का गहन विश्लेषण नहीं कर पा रही है। सामाजिक संरचना के तह में नहीं जा रही है। अन्य राज्यों के सामाजिक परिवेश और नीतियों के आधार पर योजनाएं व नीतियां बनाई जा रही है, जो झारखंड के लिए सटीक नहीं बैठ रहा है। इस कारण एक समाज दूसरे समाज पर अविश्वास पैदा हो रहा है। समर्पण और सहयोग में कमी आ रही है। एक सामान्य नीति निर्धारण होनी चाहिए जिससे आम और खास यह महसूस करे कि सरकार हमारे लिए बनी है।


-सरकार के साथ जरूर हैं लेकिन समय समय पर सुझाव भी देते रहते हैं। खास कर झारखंड के हित में।

कोई एजेंसी 1500 करोड़ बताती है, तो कोई 14 करोड़...सब फंसा रहे हैं


-गढ़वा, दुमका और चाईबासा में मेडिकल कॉलेज खोलने का निर्णय। दुमका और गढ़वा में निर्माण कार्य भी चल रहा है। गोविंदपुर-साहेबगंज फोर लेन सड़क निर्माण का निर्णय जो उस क्षेत्र की जीवन रेखा है। इसके अलावा प्रशासन के विकेंद्रीकरण के लिए 35 प्रखंड, दो अनुमंडल रंका और जगन्नाथपुर तथा खूंटी-रामगढ़ जिला का निर्माण। ग्राम प्रधान को मानदेय देना। दुख इस बात की कि स्थानीय नीति को परिभाषित नहीं कर सका। आ भी लोग इसको लेकर परेशान हैं।

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