विज्ञापन

ढाई लाख की नौकरी छोड़ फिलीपिंस की नोरा अनाथ बच्चों को पढ़ाने शहर में बस गई

Dainik Bhaskar

Dec 18, 2017, 06:25 AM IST

बिरसानगर के छोटे से मकान में रहती हैं फिलीपिंस की नोरा शिवा।

Nora settled down in the city to teach orphans
  • comment

जमशेदपुर। बिरसानगर के छोटे से मकान में रहनेवाली फिलीपिंस की नोरा शिवा ने बस्ती के गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए घर को ही स्कूल बना दिया। जिन 39 बच्चों के माता-पिता नहीं है, उन्हें अपने ही घर में रखती है। नहाने-खिलाने से लेकर पढ़ाने का सारा जिम्मा उठाती है।

- कभी ढाई लाख रुपए की नौकरी करने वाली यह विदेशी महिला इन बच्चों में इतनी रच-बस गई कि इनका खर्च उठाने के लिए कागजे के ठोंगे बनाती है और गली-मोहल्लों में जाकर साइकिल से सब्जी बेचती है। ये बच्चे नोरा को मां ही मानने लगे हैं।

- 50 वर्षीय नोराने कहा फिलीपीन्स में कॉलेज की पढ़ाई के बाद दक्षिण कोरिया चली गई। वहां एक टेक्सटाइल कंपनी में काम करती थी। बिरसानगर (जमशेदपुर) के मनोज कुमार शिवा भी उसी कंपनी में थे। काम के दौरान मनोज से मुलाकात हुई। फिर प्यार हुआ और 1995 में हमदोनों ने कोर्ट में शादी कर ली। मैं ढाई लाख रुपए महीना कमा लेती थी।

-2005 में मनोज के पिता की मौत हो गई। मां की पहले ही मौत हो चुकी थी। मनोज टूट चुके थे। उन्हें सहारा देने मैं भी नौकरी छोड़कर जमशेदपुर गई। बिरसानगर में मनोज के पिता का एक छोटा मकान था। उसी में हम रहने लगे। यहां रहते मुहल्ले के कई बच्चों को देखा, जिनके माता-पिता नहीं थे।

लोगों को देखकर बेचैन हो जाती थी

- सड़कों पर जिंदगी गुजारते थे। उन गरीब बच्चों को जब भी देखती, बेचैन हो जाती। एक दिन तय किया कि यहीं रहूंगी। यतीम बच्चों की परवरिश करूंगी। गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, लेकिन अधिकांश घरों में पढ़ाई का माहौल नहीं था।

- बच्चों के पिता शराब पीकर गालीगलौज करते। कई बार मुझे भी गाली दी। फिर मैं बच्चों को अपने घर पर बुलाकर पढ़ाने लगी। मैं चाहती तो किसी भी अच्छे अंग्रेजी माध्यम स्कूल में टीचर बन सकती थी। मुझे लगा पैसा तो मिल जाएगा, लेकिन मेरा बेचैनी खत्म नहीं होगी।

- आज 200 बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाती हूं। 39 बच्चे मेरे साथ ही रहते हैं। यह काम मुश्किल है, लेकिन इरादे बुलंद हो तो रास्ते बन जाते हैं। बच्चों की परवरिश के लिए ठोंगे बनाकर दुकानों पर बेच देती हूं। साइकिल से घर-घर जाकर सब्जियां भी बेचती हूं। कभी-कभार मुहल्लावासी भी दाल-चावल दे जाते। मैं किसी से मदद मांगने नहीं जाती, लेकिन अपने बच्चों को समाज का जिम्मेदार नागरिक बनता देखना चाहती हूं।

बच्चों के प्रति नोरा का लगाव देखा तो बदल दिया साउथ कोरिया जाने का इरादा

- पति मनोज कुमार शिवा ने कहा विचार आया कि टाटा मोटर्स की नौकरी छोड़ वापस साउथ कोरिया चला जाऊं।लेकिन नोरा के पास पढ़नेवाले बच्चों को देखा तो फैसला बदल दिया। नोरा से पूछा तो उसने कहा-हमारे जाने के बाद इन बच्चों को कौन देखेगा? बहुत कठिन जिंदगी है, वह बच्चों के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहती है। अब मैं भी उनको हंसता-खेलता देखता हूं तो सारी परेशानी दूर हो जाती है।

Nora settled down in the city to teach orphans
  • comment
X
Nora settled down in the city to teach orphans
Nora settled down in the city to teach orphans
COMMENT
Astrology

Recommended

Click to listen..
विज्ञापन
विज्ञापन
एप में पढ़ें