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टीवी की टीआरपी तब बढ़ती है, जब कपड़े उतारे जाएं, लेकिन हमारी टीआरपी बढ़ती है, जब कपड़े पहनाए जाएं : सुरेन्द्र शर्मा

सिटी रिपोर्टर

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 02:30 AM IST
सिटी रिपोर्टर
सुरेन्द्र शर्मा के व्यंग्य की खूबसूरती का अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि यह पूछे जाने पर कि लुगाई पर की गई आपकी टिप्पणी पर आपकी प|ी का कैसा रिस्पांस होता है? कहते है-उन्हें टिप्पणी से क्या मतलब, जब मेरे कमाये पैसे उन्हें मिलते हैं। बकौल सुरेन्द्र शर्मा, मैंने प|ी पर हास्य किया है, उपहास नहीं। हास्य और उपहास में अंतर होता है। इस बात को समझना होगा। हमारे देश में प|ी एक सिस्टम का नाम है। प्यार हो या न हो, उसे निभाना पड़ता है।

कवि एक शो के लिए लाखों रुपए लेते हैं तो क्या खराबी है...

सुरेन्द्र शर्मा ने कहा कि अब पहले वाली मंचीय कविता नहीं रही। जो आयोजक होता है वह कवि सम्मेलन कराकर कमाता है। अगर वह कमाता है, तो हम क्यों नहीं? अमेरिका में उनके 8 शो हुए। सभी हाउसफुल रहे। उसका बेनीफिट मुझे भी मिलना चाहिए। पहले लोग चंदा करके कवि सम्मेलन कराते थे। उनके लिखे गीत को गायक गाकर 15-20 लाख रुपए लेता है। संतोष आनंद के गीत मिलेनियम सांग बने है, लेकिन वे आज गुमनानी के दौर में जीने को अभिशप्त है। आज शब्द का प्रभाव कम हो रहा है, तो शोर ज्यादा है।

हंसाना मकसद नहीं...

मेरा मकसद हंसाना नहीं है। टीवी और मंच की कविता में फर्क है। टीवी की टीआरपी तब बढ़ती है, जब कपड़े उतारा जाए, लेकिन हमारी टीआरपी बढ़ती है, जब कपड़े पहनाया जाए।

आरक्षण पर बोले...

आज की आरक्षण प्रणाली में कृष्ण को तो आरक्षण मिल जाएगा, सुदामा को नहीं? मेरा मानना है कि व्यक्ति गरीब होता है, कोई जाति नहीं?

सामाजिक समरसता पर..

जनता को धार्मिक दृष्टि से नहीं, एक दृष्टि से देखा जाना चाहिए। प्रधानमंत्री की कोई विचारधारा नहीं होती। धर्म के चश्मे पत्थर के हो गये हैं। हम तर्क करना भूल गये हैं। पहले धर्म का मकसद बेहतर मानव बनाना होता था। लेकिन बाद में हम धर्म को बढ़ाने और उसे भूनाने में लग गये। अब तो हम धर्म को भून कर खाने लगे हैं। हम ईश्वर से चाहते हैं, ईश्वर को नहीं चाहते। जब देश आजाद हुआ था, तो देश धार्मिक था, आज धर्मान्ध होता जा रहा है।