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किराए का मकान

किशोरी देवी आज जिस दोराहे पर असहाय व अपमानित-सी खड़ी थी। वहां से एक रास्ता बेटों के घर जाता था और दूसरा उनके दामाद...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 01:45 PM IST

किशोरी देवी आज जिस दोराहे पर असहाय व अपमानित-सी खड़ी थी। वहां से एक रास्ता बेटों के घर जाता था और दूसरा उनके दामाद श्यामा प्रसाद के घर। मगर अब हालात वैसे न थे कि बेटे-बहुओं से रूठ कर दामाद के घर चली जाय और फिर कुछ दिन वहां रुककर वापस बेटों के पास। वह अपने को ठगा-सा महसूस कर रही थी, जिंदगी ने ये किस मझधार में फंसा दिया। अश्रुपुरित नेत्रों से अपने उस घर की ओर देख रही थी जहां कभी वह अपने पति के साथ जिंदगी के सुनहरे पल गुजारी थी। वे जब तक जीवित थे, कोई कमी नहीं थी। कितने हंसी-खुशी के थे वे दिन। सुखी पूर्वक अपने गृहस्थी की बगिया को सजाए रखी। बच्चों का पालन-पोषण, शादी-विवाह किया।

दोराहे पर खड़ी किशोरी देवी अपनी ही परछाई को निहार रही थी। लगा जैसे आज उसकी परछाई भी उसका उपहास उड़ा रही हो, ‘किशोरी देवी तुमने तो अपने पति की कमाई खाने-पीने और ऐशो-आराम में उड़ा दी। कभी अपना एक घर बनाने की सोची? परिंदे भी प्रजनन से पहले अपने लिए एक घोसला बना लेते हैं, ताकि उनके बच्चे प्रेम से रह सके। पर तुमने क्या किया? सारी जिंदगी तो किराए के मकान में रह कर काट दी। तुम अच्छी तरह से जानती हो किराए का मकान अपना नहीं होता। उसे तो एक न एक दिन छोड़ना ही पड़ता है।’ किशोरी देवी को याद आने लगे वे दिन जब गांव में उसके पति गिरधारी का कारपेंटरी का काम नहीं चल पा रहा था। वे किशोरी देवी को लेकर शहर आ गए। शहर नया नया बस रहा था। वे लोग छपरहिया मुहल्ले में एक छोटा-सा किराए का मकान लेकर अपनी गृहस्थी बसा ली। समय के साथ उनके एक-एक कर पांच बच्चे उसी घर में हुए। सात व्यक्तियों का परिवार किराए के मकान में जिंदगी बसर करता रहा। बच्चे सयाने होते गए। कमरा छोटा पड़ता गया, मगर उन्होंने न तो वह मकान छोड़ा और न ही छपरहिया मुहल्ला। आंगन में न लेट्रिन की व्यवस्था थी न बाथरूम की। एक हौदा था, जिसमें दैनंदिनी जरूरतों के लिए पानी रखा जा सके। बहू-बेटियां आंगन में ही कपड़ों से घेर कर नहा-धो लेती।

दोस्तों ने कितनी बार समझाया कि कुछ पैसे जमा करके थोड़ी जमीन खरीद ले, मगर उन दोनों ने इस ओर कभी ध्यान नहीं दिया। वे तो कमाओ-खाओ में मगन थे, जबकि उनसे बाद में गांव से आए हुए दूसरे साथियों ने अपनी कमाई के हिसाब से कुछ बचत करके जमीन खरीद कर मकान बना लिए। दोनों पति-प|ी का तर्क था कि शहर में घर बनाकर क्या होगा? गांव में बहुत खेती-बाड़ी है। उन्हें कौन संभालेगा? यहां कौन-सा रहना है! बुढ़ापा तो वहीं गुजारनी है। सबसे बड़ी लड़की सुमन का ब्याह उन्होंने गांव से की। वह वहीं से ससुराल चली गई। मंझला बेटा सुनील भी विवाह लायक हो चला था। उसके लिए रिश्ते आने लगे थे लेकिन वे इससे पहले तीसरी नंबर की नीलम का ब्याह कर देना चाहते थे। उन्होंने शहर में ही नीलम का रिश्ता तय किया। नीलम का विवाह करने के साल भर बाद मंझला बेटा सुनील का भी ब्याह हो गया। तीनों बच्चों का विवाह उसी किराए के मकान में संपन्न हुआ। दोनों बेटियां विवाह के बाद अपने ससुराल चली गईं। रह गए चौथे नंबर का मुन्ना और पांचवीं नंबर की बेटी शीलू। सुनील की बहू के आ जाने से घर उनके लिए आरक्षित हो गया। बेटा-बहू कमरे में सोते, जबकि पूरा परिवार उस छोटे से बरामदे और आंगन में। रसोई बनाने का सामान बरामदे की दीवार पर टंग गया। इसी बीच गिरधारी जी को एक तरफ से पूरे शरीर में लकवा मार गया। कुछ दिनों तक बिस्तर पर रहने के पश्चात वे स्वर्ग सिधार गए। शहरी वातावरण में पले-बढ़े बच्चे गांव जाने के नाम पर कन्नी काटने लगे। बहू तो पहले ही कह दी कि जिसे जाना हो जाय, पर वह नहीं जाएगी। बहू कहती-सासु मां वहां की सारी संपत्ति बेचकर शहर में ही एक छोटा-सा जमीन खरीद ले। सभी इकट्ठे ही रहेंगे।

चौथे नंबर का मुन्ना अब कमाने लगा था। उसकी भी शादी हो गई। बेटी शीलू का विवाह दूसरे शहर में ठीक हो गया। जब पैसे की बात आई, श्यामा प्रसाद ने दामाद होने के नाते मदद की। बेटा सुनील भी अपने तरफ से कुछ पैसों की मदद की, लेकिन उसकी प|ी ने शर्त रख दी कि सासु मां अपने गले की सोने की सिकरी उसे दे देगी। शीलू के ससुराल जाते ही उसमें छोटी बहू ने अपना अधिकार जमा लिया। उसने सासु मां को अपने साथ रखने से मना कर दिया। किशोरी देवी को अपने पैरों के नीचे धरती खिसकती हुई लगी। दोराहे पर खड़ी किशोरी देवी के आंखों से पश्चाताप के आंसू बह रहे थे। वह सोच रही थी मर्द तो केवल कमाना जानते हैं, घर-गृहस्थी चलाना तो औरतों को होता है। कमाने-खाने के बाद जो बचता उसमें से ही अगर एक-एक पैसा जोड़कर अपने पति के जीवन काल में ही जमीन खरीद कर मकान बनाती, तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता।

प्रदीप कुमार शर्मा, बारीडीह, जमशेदपुर

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