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यहां सालों से जमीन के नीचे धधक रही है आग, कभी गिरती है राख तो कभी आग के गोले

प्रोजेक्ट में होता है 80 से 200 डिग्री सेल्सियस तापमान, बीसीसीएलकर्मियों ने 0.83 किलोमीटर स्क्वायर क्षेत्र में कम की आग

Bhaskar News | Last Modified - Apr 17, 2018, 07:03 AM IST

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    धनबाद.कोयले की खदान आग की लौ से धधक रही है। जलते कोयले की परत एकदम लाल है। एक तरफ आग की लपटें आसमान को छूने को बेताब है तो दूसरी तरफ जलते कोयले के धुएं ने एक बड़े इलाके को अपने आगोश में ले रखा है। झरिया फायर प्रोजेक्ट के सबसे अधिक फायर वाले राजापुर प्रोजेक्ट का हर नजारा डरा रहा है। रात के 11 बजे हैं...। फायर प्रोजेक्ट की गहराती रात में मशीनें शोर मचा रही हैं। 80 से 200 डिग्री सेल्सियस से अधिक के तापमान में कोयला मजदूर जलते कोयले की दीवारों (परत) को चीर रहे हैं। गर्मी से मजदूरों का मुंह सूख रहा है। चेहरा लाल है और शरीर पसीने से लथपथ...। हर 10 मिनट पर इन्हें पानी की जरूरत महसूस हो रही है। चंद कदमों की दूरी पर कभी राख गिर रहा है तो तो कभी कोयले के शोले...। रूह कांपा देने वाले इस नजारे के बीच दिन-रात खनन जारी है। जानते है क्यों...? क्योंकि हम धनबाद वाले हैं। धधकते 1864 मिलियन टन कोयले को हम बचाना चाहते हैं, ताकि तीन सालों तक इन कोयलों से अपना देश रोशन रहे। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बीच खनन की जद्दोजहद पर पेश है भास्कर की यह रिपोर्ट...।

    ऐसे हो रहा फायर प्रोजेक्ट में खनन : पानी आधारित अपनाई गई तकनीक

    फायर प्रोजेक्ट में खनन के लिए पानी आधारित तकनीक अपनाई गई। माइंस के पानी को पाइप के माध्यम से प्रोजेक्ट के हर कोने में पहुंचाया गया। जिस जगह पर जलते कोयले का खनन करना होता है, उस जगह पर तेज धार से पानी दिया जाता है। इससे कोयले में लगी आग थोड़ी कम होती है। आग कम होते ही उसे मशीनों के माध्यम से निकाल लिया जाता है। निकाले गए कोयलों को जला डंप किया जाता है, वहां भी पानी दिया जाता है। ताकि, कोयले की आग पर पूर्णत: अंकुश लग सके।


    कैसे लगी आग : 1916 में गलत माइनिंग से लगी आग

    गलत माइनिंग से साल 1916 में लगी आग सुरंग बनाकर खनन की प्रक्रिया अवैज्ञानिक थी, जिसे आजादी के बाद निजी कोल मालिकों ने जारी रखा। कोयले का गुण है जलना। अगर एक तय समय में कोयले को नहीं निकाला जाए तो वह स्वतः: जल उठेंगे। झरिया व आसपास के खदानों में 45 प्रतिशत कोयला जमीन के अंदर ही रह गया। अंदर के तापमान ने इन्हें जलने का मौका दिया। कोयला धधक उठा। साल 1916 में भौरा कोलियरी में आग लगने का पहला प्रमाण मिला था।

    ऐसे फैली आग : 1986 में 17 किमी स्क्वायर क्षेत्र जला

    साल 1986 में पहली बार आग का सर्वे कराया गया। सर्वे में 17 किमी स्क्वायर क्षेत्र जमीनी आग से जलता हुआ मिला। हुआ कुछ यूं कि तय समय पर नहीं निकाले गए 45 प्रतिशत कोयलों की अलग-अलग सिम में आग लगी। माइंस के सुरंग के रास्ते हवा मिली। कंबाइंड सिम (एक-दूसरे जुड़ी सिम) होने के नाते आग धीरे-धीरे फैलती गई। आग से बचाव के लिए बालू भराई किया गया, पर वह सफल नहीं रहा।


    साल 2006 : सर्वे में 3.01 किमी स्कवायर क्षेत्र में आग

    एनआरएससी (इसरो) ने धनबाद में फायर की स्थिति पर सर्वे किया। आग 3.01 किलोमीटर स्क्वायर क्षेत्र में मिला। बीसीसीएल के सामने इन जल रहे कोयलों को बचाने की चुनौती थी। ओपनकास्ट प्रोजेक्ट (ओसीपी) के माध्यम से फायर प्रोजेक्ट में खनन की योजना बनाई गई। योजना पर काम हुआ। साल 2012 में पुन: सर्वे हुआ तो 0.83 किमी स्क्वायर जलते क्षेत्र में आग कम मिली।

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    17 किलोमीटर स्क्वायर क्षेत्र में 32 साल पहले थी आग
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    घनुडीह फायर प्रोजेक्ट का 300 फीट की ऊंचाई से एरियल व्यू
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    दीपक कुमार, माइंस सेफ्टी विषय पर शोधकर्ता और डॉ. राजेंद्र सिंह, मुख्य वैज्ञानिक, सिंफर
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