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अतिक्रमण हटाने के बाद थानेदार नहीं करते मॉनिटरिंग, फिर से सड़क पर सज जाती हैं दुकानें

डीबी स्टार

Dainik Bhaskar

May 01, 2018, 03:10 AM IST
अतिक्रमण हटाने के बाद थानेदार नहीं करते मॉनिटरिंग, फिर से सड़क पर सज जाती हैं दुकानें
डीबी स्टार
शहर में अतिक्रमणकारियों के खिलाफ एक साल पहले अभियान चलाया गया था। मकसद शहर की ट्रैफिक व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त करने के साथ तेजी से बढ़ते सड़क हादसे का ग्राफ कम करना था। लेकिन फिर से अतिक्रमण का दौर शुरू हो गया है। जिला प्रशासन द्वारा समय-समय पर शहर की सड़कों से अतिक्रमण हटाया जाता है। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि जहां भी अतिक्रमण हटाया जाता है कुछ दिनों बाद वहां पुन: अतिक्रमण शुरू हो जाता है।

इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि जिला प्रशासन के पास अभियान की मॉनीटरिंग के लिए पर्याप्त संसाधन और मजबूत इरादे की कमी है। डीबी स्टार की पड़ताल में पता चला कि स्थानीय थाना और राजनेताओं की शह पर भी सड़क किनारे अतिक्रमण होता है। राजनीतिक पार्टियां अफसरों पर अभियान के वक्त दबाव डालती है।

नाम नहीं छापने की शर्त पर साकची में एक दुकानदार ने कहा कि सड़क और सार्वजनिक जमीन पर दुकान लगाने के एवज में हरेक माह चढ़ावा देना पड़ता है। जबकि एक याचिका की सुनवाई करते वक्त हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाई थी। इस दौरान कहा गया था कि किसी जगह पर दोबारा अतिक्रमण होने पर संबंधित थाना क्षेत्र के अफसर तत्काल निलंबित होंगे। मगर आदेश का पालन नहीं हो रहा है। इधर, 2016 में साकची, बिष्टुपुपर और जुगसलाई रेलवे फाटक के समीप अतिक्रमण हटाने में पुलिस को लाठी चार्ज करनी पड़ी थी।

भारी विरोध के बीच प्रशासन ने सैकड़ों दुकान और झोपड़ीनुमा घरों व खटालों को हटाया था। मगर उन जगहों पर फिर से अतिक्रमण का दौर शुरू हो गया है। इनमें ज्यादातर रेलवे, टाटा लीज और अनावाद बिहार सरकार (झारखंड) की जमीन थी। रेलवे ने अपनी जमीन को बचाने के लिए तुरंत चहारदीवारी करा दी, जबकि टाटा लीज व अनावाद बिहार सरकार की जमीन पर कब्जा हो गया। प्रशासन ने अनावाद जमीन और टाटा लीज की जमीन पर पहले मार्केट बनाने की योजना बनाई थी। इस मार्केट में स्टेशन क्षेत्र के सब्जी दुकानदारों को बसाने की योजना थी। बाद में इस स्थान पर पार्क बनाने की योजना बनी। ये दोनों योजनाएं जुस्को और प्रशासन की फाइलों में सिमट कर रह गई और एक बार फिर अतिक्रमण हो गया। सड़क पर अतिक्रमण होने की वजह से राहगीरों को ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ता है। दस किलोमीटर की दूरी तय करने में राहगीरों को आधा घंटा लग जाता है। खासकर सुबह में ट्रेन पकड़ने के दौरान काफी कठिनाई होती है। जाम के कारण यात्रियों की ट्रेनें छूट जाती है।

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हाईकोर्ट का आदेश भी नहीं मानते थानेदार

अतिक्रमण के खिलाफ हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा था। उन्होंने आदेश देते हुए कहा था कि अतिक्रमण होने पर संबंधित थाना प्रभारी जिम्मेदार होंगे। उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाएगा। लेकिन थानेदार की सेहत पर इसका असर नहीं दिख रहा है। क्राइम मीटिंग में आदेश को सख्ती से पालन करने को कहा जाता है लेकिन खुलेआम थाना क्षेत्रों में अतिक्रमण जारी है।

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शहर में अतिक्रमणकारियों के खिलाफ एक साल पहले अभियान चलाया गया था। मकसद शहर की ट्रैफिक व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त करने के साथ तेजी से बढ़ते सड़क हादसे का ग्राफ कम करना था। लेकिन फिर से अतिक्रमण का दौर शुरू हो गया है। जिला प्रशासन द्वारा समय-समय पर शहर की सड़कों से अतिक्रमण हटाया जाता है। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि जहां भी अतिक्रमण हटाया जाता है कुछ दिनों बाद वहां पुन: अतिक्रमण शुरू हो जाता है।

इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि जिला प्रशासन के पास अभियान की मॉनीटरिंग के लिए पर्याप्त संसाधन और मजबूत इरादे की कमी है। डीबी स्टार की पड़ताल में पता चला कि स्थानीय थाना और राजनेताओं की शह पर भी सड़क किनारे अतिक्रमण होता है। राजनीतिक पार्टियां अफसरों पर अभियान के वक्त दबाव डालती है।

नाम नहीं छापने की शर्त पर साकची में एक दुकानदार ने कहा कि सड़क और सार्वजनिक जमीन पर दुकान लगाने के एवज में हरेक माह चढ़ावा देना पड़ता है। जबकि एक याचिका की सुनवाई करते वक्त हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को फटकार लगाई थी। इस दौरान कहा गया था कि किसी जगह पर दोबारा अतिक्रमण होने पर संबंधित थाना क्षेत्र के अफसर तत्काल निलंबित होंगे। मगर आदेश का पालन नहीं हो रहा है। इधर, 2016 में साकची, बिष्टुपुपर और जुगसलाई रेलवे फाटक के समीप अतिक्रमण हटाने में पुलिस को लाठी चार्ज करनी पड़ी थी।

भारी विरोध के बीच प्रशासन ने सैकड़ों दुकान और झोपड़ीनुमा घरों व खटालों को हटाया था। मगर उन जगहों पर फिर से अतिक्रमण का दौर शुरू हो गया है। इनमें ज्यादातर रेलवे, टाटा लीज और अनावाद बिहार सरकार (झारखंड) की जमीन थी। रेलवे ने अपनी जमीन को बचाने के लिए तुरंत चहारदीवारी करा दी, जबकि टाटा लीज व अनावाद बिहार सरकार की जमीन पर कब्जा हो गया। प्रशासन ने अनावाद जमीन और टाटा लीज की जमीन पर पहले मार्केट बनाने की योजना बनाई थी। इस मार्केट में स्टेशन क्षेत्र के सब्जी दुकानदारों को बसाने की योजना थी। बाद में इस स्थान पर पार्क बनाने की योजना बनी। ये दोनों योजनाएं जुस्को और प्रशासन की फाइलों में सिमट कर रह गई और एक बार फिर अतिक्रमण हो गया। सड़क पर अतिक्रमण होने की वजह से राहगीरों को ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ता है। दस किलोमीटर की दूरी तय करने में राहगीरों को आधा घंटा लग जाता है। खासकर सुबह में ट्रेन पकड़ने के दौरान काफी कठिनाई होती है। जाम के कारण यात्रियों की ट्रेनें छूट जाती है।

हाईकोर्ट ने कहा था- दोबारा अतिक्रमण होने पर तत्काल थानेदार हाेंगे सस्पेंड

साकची और बिष्टुपुर में अतिक्रमण हटाने में छुटा था पसीना

साकची व बिष्टुपुर में अतिक्रमण हटाने के लिए जिला प्रशासन ने बड़े पैमाने पर अभियान चलाया था। कई बार दुकानदारों के विरोध को शांत करने के लिए पुलिस को लाठियां भी भांजनी पड़ी थी। अभियान के बाद साकची और बिष्टुपुर बाजार के हर कोने तक चार पहिया वाहन पहुंच जाता था, लेकिन फिर से स्थिति जस की तस हो गई है। साकची मेन बाजार में फिर से अतिक्रमण हो गया है। राहगीरों को ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ता है।

रेलवे क्षेत्र में भी यही हाल

नगर निकाय के अलावा रेल क्षेत्र में अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया गया था। सड़क और फुटपाथ ठेला, खोमचे के साथ पक्का निर्माण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हुई थी। दोबारा अतिक्रमण न हो इसकी मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी इंजीनियरिंग और आरपीएफ के अफसरों को दी गई थी। बावजूद इसके खुलेआम अतिक्रमण जारी है। कई बार रेल प्रशासन ने जिला प्रशासन के सहयोग से स्टेशन चौक को अतिक्रमणमुक्त कराया था। लेकिन, शाम होते ही रेल क्षेत्र में दुकानें सज जाती है। ऐसे में रेलवे के अलावा स्थानीय पुलिस की मिलीभगत से इनकार नहीं किया जा सकता है।

अतिक्रमण हटाने का प्रयास जारी है

 जहां भी अतिक्रमण है उसे हटाने की कोशिश जारी है। प्रशासन व पुलिस संयुक्त रूप से अतिक्रमण वाले स्थल की मानिटरिंग हो रही। शिकायत मिलने पर कार्रवाई भी की जाती है।  माधवी मिश्रा, एसडीओ

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