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बिल बकाया होने पर निजी अस्पताल दो दिन तक रोक देते हैं डेड बॉडी

जमशेदपुर

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 03:10 AM IST

जमशेदपुर डीबी स्टार

शहर के निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान मरीज की मौत होने पर शव को बंधक बनाने के घटनाएं आम हैं। भिलाई पहाड़ी निवासी निताई दास और बागबेड़ा निवासी आलोक कुमार का क्रमश: तमोलिया और बिष्टुपुर में इलाज हो रहा था। इलाज के क्रम में मरीजों की मौत हो गई थी। डॉक्टरों ने परिजनों को मरीज की मौत की सूचना देने के साथ ही 1 लाख 60 हजार का बिल थमा दिया। इतना बिल चुकाने के लिए परिजनों के पास रुपए नहीं थे। तब भी अस्पताल प्रबंधन नहीं पसीजा। शव तीन दिन अस्पताल की कस्टडी में ही रखा रहा। सांसद और स्थानीय जनप्रतिनिधि से पैरवी कराने के बाद डेड बॉडी रिलीज किया जाता है। इसकी जानकारी जिला प्रशासन और सिविल सर्जन को है। इन अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई के बजाय बिल माफ कराकर अपनी पीठ खुद थपथपाते हैं।

पिछले तीन दिनों में टीएमएच में बिल बकाया होने की वजह से दो डेड बाॅडी को चौबीस घंटे तक रोक कर रखा गया। ब्रह्मानंद अस्पताल में भी दो दिन पहले बागबेड़ा के मरीज का 40 हजार रुपए बकाया होने पर 24 घंटे से अधिक समय तक डेड बाडी रोक कर रखा गया। जिले के सांसद विद्युत वरण महतो, सीएस डॉ. महेश्वर पर खुद पहल कर डेड बाडी को परिजनों को सुपुर्द करवाया। साथ ही, बिल माफ कर डेड बाडी देने पर अस्पताल प्रबंधन व कंपनी के प्रति आभार भी जताया। वहीं परिजन भी बिना बिल भुगतान के डेड बाडी मिलने पर जन प्रतिनिधि व पदाधिकारी के प्रति आभार जता रहे हैं।

तीन दिनों मंंे बिल बकाया होने की वजह से तीन डेड बाॅडी को चौबीस घंटे तक रोक कर रखा गया

पैरवी के बाद प्रबंधन ने डेड बॉडी रिलीज किया

इकबाल का बेटा जुनैद ने कहा- उनके पिताजी का टीएमएच में इलाज चल रहा था। वे सीसीयू में भर्ती थे। इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। अस्पताल ने बकाया बिल के लिए 24 घंटे से अधिक समय तक डेड बाॅडी रोक दिया। फिर भाजपा नेता आफताब अहमद सिद्दीकी से बात कर डेड बाडी रिलीज करने का आग्रह किया। उन्होंने 2.6 लाख रुपए बिल माफ कराकर डेड बाडी रिलीज करवाया।

केस 1

पैसे नहीं दिए तो शव देने से इनकार कर दिया

भिलाई पहाड़ी निवासी निताई दास सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। एमजीएम ने बेहतर इलाज के लिए टीएमएच रेफर कर दिया। इलाज के दौरान मौत हो गई। 1.6 लाख रुपए बकाया की वजह से अस्पताल प्रबंधन ने डेड बाडी देने से इंकार कर दिया। दो दिन तक भटकने के बाद मामला सांसद तक पहुंचा। टाटा स्टील के वीपी सुनील भास्करन से बात कर बिल माफ कराकर बाडी परिजनों को दिलवाया।

केस 2

सांसद की पहल पर परिजनों को मिली राहत

बागबेड़ा निवासी आलोक कुमार का तमोलिया में एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा था। पिछले शुक्रवार को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। 40 हजार रुपए बिल बकाया होने पर अस्पताल प्रबंधन ने डेड बाडी देने से इनकार कर दिया। परिजनों ने इसकी जानकारी सांसद को दी। सांसद प्रतिनिधि ने अस्पताल प्रबंधन से बात कर बकाया बिल माफ कराया।

केस 3

अस्पताल प्रबंधन फीस माफ कर देता है

आईएमए जमशेदपुर के सचिव डॉ. मृत्युंजय सिंह ने कहा- अस्पतालों को डेड बाॅडी रोकने का नियम नहीं है। निजी अस्पतालों के सामने समस्या यह होती है कि वे इलाज के लिए जरूरी दवाइयां बाहर से खरीदते हैं। कभी-कभार इलाज के दौरान मरीजों की मौत हो जाने पर वे फीस तो छोड़ देते हैं, लेकिन दवा वगैरह पर किए खर्च का भुगतान के लिए डेड बाडी रोकते हैं।

एक्सपर्ट व्यू

 निजी अस्पतालों द्वारा बिल बकाया होने पर डेड बाडी रोका जा रहा है। इसकी जानकारी विभाग के वरीय अधिकारियों को भी है। वे चुप रहते हैं। वैसे जितना हो सकता है मैं इस तरह के मामले में परिजनों की सहायता करता हूं।  डॉ. महेश्वर प्रसाद, सिविल सर्जन, जमशेदपुर

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