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अंतरावासी आत्मा की पूजा ही सर्वोच्च पूजा है: कथावाचक

एक वर्ष पहले
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जमशेदपुर | आत्मीय वैभव विकास केंद्र सोनारी में चल रहे रामायण प्रवचन का शनिवार को चौथा दिन था। इस माैके पर स्वामी भूमानंद तीर्थ ने कहा कि अंतरावासी आत्मा की पूजा ही सर्वोच्च पूजा है। उन्होंने कहा कि राम 16 वर्ष की अवस्था में तीर्थ यात्रा पर गए। भ्रमण करते समय उन्होंने लोगों की दुर्दशा दिखी। उन्हें भयंकर कष्ट में देखकर राम चिंतित हो गए। गहरे दुख के कारण वे अपना सामान्य दैनिक कार्य का पालन नहीं कर पा रहे थे। जब वशिष्ठ मुनि ने उनकी मन की अवस्था के बारे में पूछा, तो कहा कि सांसारिकता में सुख क्या है, लोग मरने के लिए जन्म लेते हैं और पुन: जन्म लेने के लिए मरते हैं। मैं कौन हूं? यह सब क्या है, जो अस्तित्व में आया है। रामजी का यह प्रश्न लगातार 18 दिनों तक चलता रहा है। वाल्मीकि ने यह सब रामायण में लिखा है।
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