हम आधा पेट खा सकते हैं, लेकिन जब भूख लगती है ताे बच्चे खाना मांगते हैं

Jamshedpur News - लाॅकडाउन के कारण दिहाड़ी मजदूरों का मलिन चेहरा उनकी बेबसी की कहानियां कह रही हैं। हर मजदूर की पीड़ा और दर्द की...

Apr 03, 2020, 06:57 AM IST

लाॅकडाउन के कारण दिहाड़ी मजदूरों का मलिन चेहरा उनकी बेबसी की कहानियां कह रही हैं। हर मजदूर की पीड़ा और दर्द की अपनी कहानी है। पूछने पर दर्द छलक जाता है और बात करते-करते रोने लग जाते हैं। बताते हैं-एक टाइम भी ठीक से खाना नहीं मिल रहा है। हम तो किसी तरह पेट बांध कर रह ले रहे हैं, लेकिन छोटे-छोटे बच्चों को समझाना मुश्किल हो रहा है। अधिकतर दिहाड़ी मजदूर भाड़े के घर में रहते हैं। जब खाने के लाले पड़े हैं वैसे में भाड़ा देने का पैसा कहां से लाएं। बिरसानगर और टेल्को के दो मजदूरों ने कुछ इस तरह अपनी बेबसी बयां की।

अब दुकानदार भी सामान नहीं दे रहा : सिद्धु मुर्मू

सिद्धु मुर्मू घर बनाने का काम करते हैं। राेजाना 400 रुपए मिलते थे, लेकिन पिछले 13 दिन से घर पर बैठे हैं। पांच सदस्यों का परिवार है। भाड़े पर रहते हैं। रोज कमाने-खाने वाले सिद्धु बताते हैं-दो चार दिन तो इधर-उधर से काम चलाए। अब तो कोई भी मदद नहीं कर रहा। राशन वाले के पास भी बकाया हो गया है। इसलिए उधार देने को तैयार नहीं है। पैसे है नहीं कि दूसरी जगह से राशन खरीदकर लाते। किसी तरह माड़-भात खाकर काम चला रहे हैं।

एक टाइम खाकर गुजारा करना पड़ रहा है: दिनेश

बिहार के रहने वाले दिनेश सिंह जमशेदपुर में रहकर टाटा मोटर्स में ठेकेदारी में काम करते हैं। लेकिन कोरोना के चलते 15 दिन से ठेकेदार ने बैठा दिया है। एक पैसा नहीं आ रहा है। एक टाइम खाकर गुजारा कर रहा हूं। भाड़े पर रहता हूं और प|ी के साथ एक बच्चा भी है। बच्चे के बारे में सोचता हूं। किसी ने बताया कि रतन टाटा ने कहा है कि सभी ठेका कर्मियों को लॉकडाउन की अवधि का पैसा मिलेगा? लेकिन कैसे मिलेगा?

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