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िजसका नाम क्रेडिट रोल में पहले आने से लगता था बुरा उसी को दिल दे बैठे देव **

4 महीने पहले
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क्रेडिट में पहले आता था सुरैया का नाम

40 के दशक में जब देव नए थे तब उन्हें महिला केंद्रित फिल्मों में हीरोइनों के लव इंटरेस्ट का रोल मिलता था। जब देव को उस वक्त की तगड़ी एक्ट्रेस सुरैया के साथ काम करने का मौका मिला तो वे एकदम खुश हो गए। लेकिन फिल्म क्रेडिट में सुरैया का नाम पहले अाता क्योंकि वो बड़ी स्टार थीं। यही बात देव को खलती भी थी। शुरुआत में उन्हें बहुत बुरा नहीं लगा लेकिन अगले पांच साल तक उनके साथ यही होता रहा। फिर अचानक देव को बुरा लगना बंद हो गया क्योंकि दोनों को एक दूसरे से प्यार हो गया था।

सुरैया के साथ की कहानी, देव की जुबानी

देव साहब ने एक इंटरव्यू में बताया था, ‘सुरैया से मेरी पहली मुलाकात फिल्म ‘जीत’ के सेट पर हुई थी, जिसमें हम दोनों पहली बार साथ आ रहे थे। हम एक-दूसरे को पसंद करते थे और फिर प्रेम करने लगे। मुझे याद है, मैं चर्चगेट स्टेशन पर उतरकर पैदल मरीन ड्राइव स्थित कृष्ण महल जाया करता था, जहां सुरैया रहती थीं। हम लिविंग-रूम में बैठा करते थे। सुरैया की मां ने तो हमारी आशनाई को स्वीकार कर लिया था पर उनकी बूढ़ी दादी मुझे गिद्ध की तरह देखती थीं।

हम शादी करना चाहते थे, लेकिन सुरैया अपनी दादी की मर्जी के खिलाफ जाने को तैयार नहीं हुईं। उनके घर कई लोग आने-जाने लगे थे, जिससे वे भ्रमित रहने लगीं। निहित स्वार्थी तत्वों ने हिन्दू-मुसलमान की बात उठाकर हमारे लिए मुश्किलें पैदा कर दीं। उन दिनों की पत्रिकाओं ने भी तमाशा मचाया। हमारा अफेयर रोजाना सुर्खियों में छपता था। एक दिन दादी के हुक्म का पालन करते हुए सुरैया ने मुझे ‘नो’ कह दिया। मेरा दिल टूट गया। उस रात घर जाकर चेतन के कंधे पर सिर रखकर खूब रोया।’

बिना ऑडिशन के मिला ब्रेक

इसके बाद प्रभात फिल्म कंपनी के फाउंडर बाबू राव पाई ने उन्हें इंडस्ट्री में पहला मौका दिया। देव साहब ने खुद बताया था कि जब मैं पहली बार उनके ऑफिस पहुंचा तो उन्होंने मुझे देखते ही मुझे ब्रेक देने का मन बना लिया था। उन्होंने अपने लोगों से कहा कि इस लड़के की आंखें, स्माइल और कॉन्फिडेंस उन्हें बहुत कमाल लगी। मुझे पहली फिल्म बिना किसी ऑडिशन के मिल गई। आखिरकार प्रभात फिल्म्स की ‘हम एक हैं’ से 1946 में देव आनंद ने डेब्यू किया। लेकिन उनको पहचान मिली 1948 में रिलीज हुई फिल्म ‘जिद्दी’ से, जिसे अशोक कुमार ने प्रोड्यूस किया था।

गुरुदत्त से रहा अनाेखा याराना

फिल्म ‘हम एक हैं’ की शूटिंग के दौरान ही देव आनंद की मुलाकात गुरु दत्त से हुई थी। यहां दोनों बहुत अच्छे दोस्त बने और तय किया कि उन दोनों में से जो भी पहले सक्सेसफुल हो जाएगा वो दूसरे का कॅरिअर बनाने में मदद करेगा। पुणे में ही देव और गुरुदत्त को दो और साथी रहमान और रामसिंह भी मिले। चारों एक साथ पुणे की सड़कों पर साइकिल चलाते और पार्टी करते थे।

‘बाजी’ से पूरा किया वादा

1951 में देव आनंद ने अपना वादा पूरा किया और गुरुदत्त को अपने बैनर तले बनी ‘बाजी’ के निर्देशन का भार सौंपा। फिल्म सुपर हिट हुई और देव साहब स्टार बन गए। दोनों ने वर्ष 1952 में फिल्म ‘जाल’ में भी काम किया। इस फिल्म के निर्देशन के बाद गुरुदत्त ने फैसला किया कि वह केवल अपनी प्रोडक्शन हाउस की फिल्मों का निर्देशन करेंगे। बाद में देव ने प्रोडक्शन हाउस की फिल्मों की जिम्मेदारी छोटे भाई विजय आनंद को सौंप दी।

आ ज हम बात करेंगे हिंदी सिनेमा के उस एवरग्रीन सितारे देव आनंद की जो जिंदगी का साथ निभाता चला गया और हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया। जेब में 30 रुपए डालकर मुंबई पहुंचा यह शख्स फिल्मी परदे पर ऐसा छाया कि क्या एक्ट्रेस और क्या फैन हर कोई उनका दीवाना था। दीवानगी भी कुछ यूं कि लड़कियां उन्हें देखकर खुशी के मारे छत से कूद जाया करती थीं। पढ़िए देव साहब के जीवन से जुड़ी रोचक बातें....

30 रुपए जेब में डालकर पहुंचे थे मुंबई

सन् 1943 में जेब में 30 रुपए डाले और हाथों में आर्ट्स की डिग्री लिए एक नौजवान मुंबई पहुंचा। ये नौजवान था धर्मदेव पिशोरीमल आनंद जो बाद में देव आनंद के नाम से मशहूर हुआ। शुरुआती दिनों में देव साहब अपने दोस्तों के साथ रहे थे। ऐसा भी एक वक्त था जब उनकी जेब में खाना खाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे।

सैनिकों की चिट्ठियां पढ़कर किया गुजारा

काफी मेहनत मशक्कत के बाद देव को मिलिट्री सेंसर ऑफिस में नौकरी मिली। यहां उन्हें सैनिकों की चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगों को पढ़कर सुनाना होता था। इसके लिए देव आनंद को 160 रुपए मासिक वेतन मिलना था। इसमें से 45 रुपए वह अपने परिवार के खर्च के लिए भेज देते थे। लगभग एक साल तक यहां नौकरी करने के बाद वे अपने बड़े भाई चेतन आनंद के पास चले गए जो उस समय भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जुड़े हुए थे। देव भी ‘इप्टा’ में शामिल हाे गए। इस बीच उन्होंने नाटकों में छोटे-मोटे रोल किए।

Áदेव आनंद पर काला कोट या काले कपड़े पहनकर घूमने पर पाबंदी थी। वजह बेहद अजीब थी कि देव साहब को काले रंग के कपड़ों में देखकर कुछ लड़कियां अपनी छतों से कूद जाती थीं। अपने प्रति फैंस की इस हद तक दीवानगी को देखकर देव साहब ने काले कपड़े पहनना बंद कर दिया।

Á अमिताभ बच्चन को छोड़कर देव साहब ने हर बड़े स्टार के साथ काम किया। अमिताभ जिस ‘जंजीर’ फिल्म से स्टार बने, उसके लिए पहले देव साहब को ही चुना गया था।

Á फिल्म ‘विद्या’ की शूटिंग के दौरान देव आनंद और सुरैया की नाव पानी में पलट गई थी, जिसमें उन्होंने सुरैया को डूबने से बचाया। इसके बाद सुरैया, देव आनंद से बेइंतहा मोहब्बत करने लगीं।

Áदेव साहब और सुरैया अपने साथी कलाकारों दुर्गा खोटे और कामिनी कौशल की मदद से एक दूसरे को प्रेम पत्र भेजते थे।

Áदेव साहब देश के बाहर मरना चाहते थे और उनकी इच्छा थी कि उन्हें कभी मरा हुआ न दिखाया जाए।

Á देव साहब की दीवानगी का आलम इतना था कि फिल्म ‘हरे राम हरे कृष्ण’ में उनकी बहन का रोल करने के लिए कोई स्थापित अभिनेत्री तैयार नहीं थीं।

कुछ मशहूर किस्से...
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लॉकडाउन के दौर में सभी यादों के गलियारे में सफर कर रहे हैं। ऐसे में हमारे कॉलम ‘क्या आप जानते हैं’ में हम आपको हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों और हस्तियों से रू-ब-रू करा रहे हैं जो इस सफर में मील के पत्थर हैं और आज भी मिसाल हैं।

क्या आप जानते हैं **
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