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देश का सबसे अलग-थलग क्षेत्र अबूझमाड़, दस किमी दूर स्कूल, पैदल जाकर भी पढ़ रहे हैं बच्चे

दे श के लिए दशकों से अबूझ पहेली है छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़। यहां के 90% गांवोें को किसी बाहरी व्यक्ति ने कभी नहीं देखा...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jan 22, 2018, 02:40 AM IST

दे श के लिए दशकों से अबूझ पहेली है छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़। यहां के 90% गांवोें को किसी बाहरी व्यक्ति ने कभी नहीं देखा है। कितने गांव, कितनी आबादी, कितने घर; सब अनुमान है। कहते हैं 5 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले अबूझमाड़ इलाके में 206 गांव हैं। नारायणपुर जिले के 70% भाग में अबूझमाड़ आता है। एक तरफ बीजापुर और दूसरी तरफ महाराष्ट्र की सीमा है। इस अनदेखी दुनिया को देखने भास्कर टीम जटवर गांव पहुंची। इस गांव को भी पहले किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं देखा है। आदिवासियों की छवि की तरह यहां अब लोग आधे कपड़ों में नहीं रहते। बच्चों ने फुलपेंट, बरमूडा, टी-शर्ट पहनना सीख लिया है, युवतियों ने सलवार-कुर्ती, लैगी को अपना लिया है। हालांकि बिजली तो दूर यहां एक हैंडपंप तक नहीं है। लेकिन देश के सबसे दुरूह जंगल अबूझमाड़ में ज्ञान की रोशनी पहुंचने लगी है। बाहरी सीमा पर कुछ गांवों में स्कूल और आंगनवाड़ियां हैं। भीतर घने जंगलों के बीच बसे गांवों से बच्चे पैदल चलकर यहां पहुंच रहे हैं। इसके लिए उन्हें 10 किमी जाना और इतना ही वापस आना पड़ता है। यानी पढ़ने के लिए ये रोज 20 किमी चल रहे हैं।

जटवर नक्सलियों की मांद में बसा है। नारायणपुर से 41 किमी दूर। सरकारी सुविधाओं के नाम पर शून्य। चौबीसों घंटे सुरक्षा बलों और नक्सलियों में टकराव के बीच भी यहां के लोगों ने खिलखिलाकर जीना सीख लिया है। सुविधाएं, संपन्नता भले ही यहां नजर न आएं, लेकिन जिंदगी खुशनुमा बनने लगी है। मेहनतकश लोग पहाड़ों को काटकर धान पैदा कर रहे हैं। पीने का पानी अभी भी नदी, नालाें से ले रहे हैं, पर अब उसे छानना सीख चुके हैं। खुशहाली आई है तो दस-दस साल से बंद घोटुल यानी इनके बनाए पंचायत भवन भी खुल गए हैं। यहां दोपहर में बुजुर्ग और शाम को लड़के-लड़कियां नाच-गाकर खुशियां बांट रहे हैं। जब हम जटवर पहुंचे तो 33 परिवारों के इस गांव में उत्सव-सा माहौल था। युवक-युवतियां, बच्चे और बुजुर्ग सभी बाहर जाने की तैयारी में थे। पुरुषों के झोले में लड़ाकू मुर्गे थे, तो महिलाओं के हाथ में मिट्टी के बर्तन। - शेष पेज-4 पर

नक्सलियों के गढ़ पहुंचा भास्कर, वहां बदल रही है जिंदगी

आधे कपड़ों में घूमने की बातें अब सिर्फ किंवदंतियों में

यहां के 206 गांवों को बाहरी दुनिया में किसी ने नहीं देखा

मो. निजाम, कौशल स्वर्णबेर, शारदा दत्त त्रिपाठी की रिपोर्ट

घने जंगलों और कच्चे रास्तों से 10-10 किमी पैदल चलकर बच्चे स्कूल पहुंचते हैं।

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Web Title: desh ka sabse alga-thlga ksetr abujhmaade, ds kimi dur school, paidl jaakar bhi prh rahe hain bchche
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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