Hindi News »Jharkhand »Nala» 3 किमी के दायरे में हुए 6 पद्मश्री आैर 7 संगीत नाटक अकादमी अवाॅर्डी

3 किमी के दायरे में हुए 6 पद्मश्री आैर 7 संगीत नाटक अकादमी अवाॅर्डी

संजीव मेहता | आदित्यपुर (जमशेदपुर) सरायकेला छऊ नृत्यकला के खाते में एक और संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड जुड़ गया।...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jan 22, 2018, 02:40 AM IST

संजीव मेहता | आदित्यपुर (जमशेदपुर)

सरायकेला छऊ नृत्यकला के खाते में एक और संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड जुड़ गया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बुधवार को सरायकेला के गोपाल प्रसाद दुबे को छऊ नृत्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यों के लिए इस पुरस्कार से सम्मानित किया। जमशेदपुर से 45 किमी दूर सरायकेला की खासियत यह है कि मात्र तीन किमी के दायरे में फैले इलाके ने 6 पद्मश्री अौर 7 साहित्य नाटक अकादमी अवॉर्डी दिए। सरायकेला झारखंड-बिहार में एकमात्र ऐसी जगह है, जहां के 13 लोगों ने पद्मश्री और साहित्य नाटक अकादमी जैसे सम्मानित अवॉर्ड हासिल किए।

आजादी से पहले सरायकेला राजघराने के राजकुमार कुंवर विजय प्रताप सिंहदेव ने युद्ध कौशल को छऊ नृत्य शैली में बदल डाला। उनके वंशजों ने इस कला को आगे बढ़ाया। यहां के राजा खुद इस नृत्यशैली की पूजा करते, नाचते और प्रजा ढोल-नगाड़े बजाती। नृत्य की इस शैली को तब फाड़ीखंडा कहा जाता था। फाड़ी मतलब तलवार और खंडा यानी ढाल। तब शिव शक्ति की पूजा के दौरान इस नृत्यकला का प्रदर्शन किया जाता। छऊ नृत्य को छावनी डांस कहा गया, जो युद्ध काल में सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए प्रदर्शित किया जाने लगा। राजपरिवार के सदस्य सैनिकों के युद्ध कौशल को छऊ नृत्य का रूप देकर देश की सरहदों के पार ले गए। आज दुनिया के 45 देशों में इस कला की धूम है। छऊ नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, सैकड़ों छात्र इस पर रिसर्च कर रहे हैं। यूनाइटेड नेशंस एजुकेशनल साइंटिफिक एंड कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन (यूनेस्को) ने छऊ नृत्य को अतुल्य धरोहर घोषित कर दिया है। इसे आगे बढ़ाने के लिए कई योजनाएं बनाई है।

अंग्रेजों के जमाने में ऐसी रियासत थी सरायकेला, जहां राजा करते थे नृत्य

यूनेस्को ने छऊ नृत्य को अमूल्य धरोहर और झारखंड ने सिलेबस में किया शामिल

45 देशों में छऊ नृत्यकला का प्रदर्शन

45 देशों में छऊ नृत्यकला का प्रदर्शन हो चुका है। भारत महोत्सव के दौरान रूस, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, मलेशिया जैसे देशों में इस कला का प्रदर्शन हुआ। अमेरिका, आस्ट्रेलिया, इटली, बेल्जियम के कई स्कॉलर छऊ नृत्य पर रिसर्च कर रहे हैं। जर्मनी, स्वीडन, डेनमार्क, इंग्लैंड, कनाडा, थाईलैंड, इजरायल के छात्र प्रशिक्षण लेने सरायकेला आते हैं। यहां नृत्य के अलावा मुखौटा बनाने की ट्रेनिंग दी जाती है।

छऊ नृत्यकला ने पूरा किया 400 साल का सफर

झारखंड का सरायकेला जिला देश की आजादी से पहले एक रियासत था। 1620-25 में सिंहदेव राजघराने ने सरायकेला राज की स्थापना की। इसी काल से छऊ नृत्य आकार लेने लगा था। नुआगढ़ व राजेंद्र अखाड़ा के गुरु नृत्यशैली की सीख देते थे। राजघराने की देखरेख में कई और अखाड़े खुले। छऊ नृत्यकला ने राजा और प्रजा की दूरियां मिटा दी। इस कला को कुंवर विजय प्रताप सिंहदेव ने अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। 1938 में उनके मार्गदर्शन और गुरु पन्नालाल घोष के नेतृत्व में पहली बार रॉयल ट्रुप सरायकेला छऊ नृत्यकला का प्रदर्शन यूरोपीय देशों में हुआ।

दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | अब पाइए News in Hindi, Breaking News सबसे पहले दैनिक भास्कर पर |

More From Nala

    Trending

    Live Hindi News

    0

    कुछ ख़बरें रच देती हैं इतिहास। ऐसी खबरों को सबसे पहले जानने के लिए
    Allow पर क्लिक करें।

    ×