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चार दिवसीय हरिनाम संकीर्तन में शामिल हुए श्रद्धालु

भास्कर न्यूज|नाला/बिन्दापाथर नाला प्रखंड क्षेत्र के बन्दरडीहा पंचायत स्थित पिपला गांव में चार दिवसीय अखंड...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 31, 2018, 03:10 AM IST

भास्कर न्यूज|नाला/बिन्दापाथर

नाला प्रखंड क्षेत्र के बन्दरडीहा पंचायत स्थित पिपला गांव में चार दिवसीय अखंड हरिनाम संकीर्तन का आयोजन सोलह आना द्वारा किया गया। जिससे पिपला गांव सहित आपसाप के गांव में भक्ति अाैर उत्साह का महौल है। मौके पर पश्चिम बंगाल के मेदनीपुर के प्रसिद्ध कीर्तन कलाकार नरहरि दास ब्रह्मचारी द्वारा पाला कीर्तन का प्रस्तुत किया गया। प्रथम दिन के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण के आविर्भाव का वर्णन करते हुए कहा ेकि अज्ञान के घोर अन्धकार में दिव्य प्रकाश, परिपूर्णतम भगवान श्यामसुन्दर के शुभागमन के समय सभी ग्रह अपनी उग्रता, वक्रता का परित्याग करके अपने-अपने उच्च स्थानों में स्थित होकर भगवान का अभिनन्दन करने में संलग्न हैं। कल्याणप्रद भाद्रमास, कृष्ण पक्ष की मध्यवर्तिनी अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, बुधवार और आधी रात का समय देवरूपिणी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्णचन्द्र का आविर्भाव हुआ। जैसे पूर्व दिशा में पूर्ण चन्द्रमा उदित हुआ हो। उसी समय वसुदेवजी को अनन्त सूर्य-चन्द्रमा के समान प्रकाश दिखाई दिया और उसी प्रकाश में दिखाई दिया एक अद्भुत असाधारण बालक जिसके बाल-बाल में, रोम-रोम में ब्रह्माण्ड रहते हैं। ऐसा अपूर्व बालक कभी किसी ने कहीं नहीं देखा-सुना। यही भगवान का ‘दिव्य जन्म’ है। वास्तव में भगवान सदा ही जन्म और मरण से रहित हैं। उनके आविर्भाव का नाम ‘जन्म’ है। वहीं दूसरे के अवसर पर कीर्तन कलाकार नरहरि दास ब्रह्मचारी गौर निताई मिलन पर वर्णन करते हुए कहा कि जब-जब भारत वर्ष में भक्ति की महिमा का वर्णन किया जाता रहेगा। तब-तब श्री गौरांग महाप्रभु चैतन्य महाप्रभु और श्री नित्यानन्द प्रभु निताई प्रभु का उल्लेख किया जायेगा। जो कि भक्ति आन्दोलन के प्रमुख प्रणेतायों में से एक हैं। प्रभु निताई और गौरांग महाप्रभु एक-दूसरे के चिरकालिक सखा और सहयोगी रहे हैं। शायद ही कभी ऐसा अवसर आया होगा जब निताई प्रभु के नाम के साथ गौरांग महाप्रभु का नाम नहीं लिया गया होगा। निताई प्रभु गौरांग महाप्रभु के सखा और शिष्य दोनों ही थे। उन्होंने अपना जीवन भक्ति के प्रचार-प्रसार और गौरांग महाप्रभु की सेवा में व्यतीत कर दिया। जैसे कृष्ण और बलराम एक दूसरे के पूरक हैं ठीक वैसे ही गौरांग बिना निताई नाम भी अधूरा है। मौके पर पिपला के अलावे मोहजोड़ी, मधुवचॉक, महुलबोना, ढाड़, बाघमारा, पाटनपुर आदि गॉव से श्रोता पहुंच कर कीर्तन का श्रवण कर रहे हैं।

काली मंदिर में सुविधाओं की कमी से श्रद्धालुओं को हो रही परेशानी

कुंडहित|गढ़ाशिमला काली मंदिर में सुविधाओं के अभाव के कारण यहां आने वाले सैकड़ों भक्तों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जबकि प्रशासन द्वारा इस क्षेत्र को पर्यटन के रूप में विकसित करने की घोषणा किया गया है। मंदिर में बिजली नहीं है, चारदिवारी नहीं है, यहां अलाने वाले महिला एवं पुरूष श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी नहीं हो इसके लिए लाखाें की लागत से शौचालय का निमार्ण कराया गया है। मगर बिजली के अभाव में इसका उपायोग नहीं हो पा रहा है। यहां मंगलवार एवं शनिवार को मां काली की विशेष पूजा होती है। जिसमें काफी संख्या मंे लोग पहुंचते है। लोगों ने विशेष पूजा के दौरान पुलिस के जवान तैनात करने की मांग की है ताकि भीड़ काे नियंत्रित किया जा सके।

कलियुग में गुरु का सम्मान अाैर माता-पिता की अनदेखी करना महा अपराध

फतेहपुर|प्रखंड क्षेत्र के शिमला पंचायत अंतर्गत जोरडीहा सेनपाड़ा गांव में अखंड हरिकीर्तन चल रहा है। जोरडीहा सेनपाड़ा में भजन कीर्तन का आयोजन गुरु पद सेन द्वारा किया गया है। बंगाल के मशहुर गायक संतोष मुखर्जी द्वारा द्वितीय रजनी में प्रभाष यज्ञ में भगवान कृष्ण द्वारा निमंत्रण देने में किसे सबसे पहले देना उचित है उसी क्रम में निमंत्रण पाने का अधिकार गुरु का होता है। इसके बाद अपने परिजनों को निमंत्रण देने का विधि-विधान है। कलियुग में गुरु का सम्मान माता-पिता अनदेखा करना महा अपराध है। लोग अस्तित्व तथा कर्त्तव्य को भुलकर ससुराल अनुरागी बन जाते हैं। जिससे साफ जाहिर होता है कि धर्म के प्रति लोगों का विश्वास नहीं है। भगवान भक्ति श्रद्धा के वशीभूत है। भगवान अपने भक्तों का कष्ट को कभी बर्दाश्त नहीं करते हैं। भगवान भक्ति के पुजारी बनकर दासानुदास बन जाते हैं। इसके साथ प्रभास यज्ञ के आयोजन में भंडारा का उत्तर दायित्व साक्षात लक्ष्मी को दिये भोजन रसोइया का दायित्व अन्नपूर्णा के हाथ में, संबोधन स्वागत का भार सरस्वती के उपर दिया गया था। गणेश के हाथों में सिद्धी का भार कुल मिलाकर देखा जाए तो विशेष विशेष गुण दक्ष से परिपूर्ण को ही प्रभास यज्ञ में संचालित करने का अधिकार दिया गया था। इसके साथ श्रद्धालु आनंद विभोर हो उठे जब तक हरिनाम संकीर्तन चलता रहा तव तक अपने स्थान से उठे नहीं।

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