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आदिवासियों ने किया शिकार, कोई पकड़ा चूहा तो किसी ने मारी चिड़ियां

भास्कर न्यूज | नारायणपुर/बागडेहरी मकर संक्रांति का त्योहार आदिवासी समाज के लोगों द्वारा भी उत्साहपूर्वक मनाया...

Dainik Bhaskar

Jan 15, 2018, 03:15 AM IST
भास्कर न्यूज | नारायणपुर/बागडेहरी

मकर संक्रांति का त्योहार आदिवासी समाज के लोगों द्वारा भी उत्साहपूर्वक मनाया गया। इस दिन शिकार का काफी महत्व होता है। सुबह होते ही आदिवासी समाज के लोग शिकार पर निकल पड़े, चूहा, पक्षी सहित अन्य का शिकार किया। जिसे जो मिला उसी का शिकार किया। बताया कि बिना शिकार के कोई घर नहीं आता है। रविवार को आयोजित शिकार के दौरान समाज के लोगों ने खेतों में चूहा का शिकार अधिक किया। खेतों में शिकार करने वालों की काफी भीड़ देखी गई। काफी मेहनत कर खेत के मेढ़ को खोदकर शिकार को पकड़ा गया। शिकार पकड़ने को लेकर आदिवासी समुदाय के लोगों में काफी उत्साह देखा गया। इस त्योहार के दिन लोग समूह बनाकर शिकार करने निकलते है। जो भी शिकार में मिलता है उसे पकाकर भोजन करते हैं। वहीं बागडेहरी में रविवार को सुगनीबासा, थालपोता, आगयशोला, किस्ठोबांधी, कालीपाथर, पुतुलबोना सहित दर्जनों आदिवासी गांवों के लोगों ने मकर संक्रांति के दौरान जगलों में शिकार किया। बता दे सभी गांवों में पर्व के दौरान फुटबाॅल प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। विजेता प्रतिभागी को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। आदिवासियों ने कहा कि यह पर्व प्रमुख पर्व है। कहा कि धर्म का पालन करते हुये आज के दिन में हमलोग दलबल के साथ तीर.धनुष व गुलटी लेकर पशु-पक्षी के शिकार में जाते है।शिकार में जो मिलता है हमलोग मिल बांटकर लेकर भोजन का लुत्फ उठाते है।इस प्रकार पर्व शांतिपूर्ण व भाईचारे के साथ रविवार को संपन्न हुआ।मौके पर सर्वधन टुडू, छोटू हेम्ब्रम, सोनु हांसदा, रविलाल हांसदा, शिवनाथ हांसदा, दुर्गा मुर्मू, मोदी हांसदा, महेश हांसदा, परिमल टुडू, अनिल टुडू, मार्शल मरांडी, विरजु चांद हांसदा, प्रदीप हांसदा, बाबुजन हांसदा, प्रकाश मरांडी मुख्य रूप से आदि मौजूद थे।

जो भी शिकार मिला उसे ग्रामीणों ने पकाकर खाया

सागुन माहा व शिकार के साथ मनाया सोहराय पर्व

नाला | क्षेत्र में रविवार को मकर संक्राति पर्व के साथ साथ बंदना-सोहराय पर्व भी संपन्न हुआ। आदिवासी समाज में 5 दिनों तक पूजा पाठ और ढोल मांदर के ताल पर नृत्य गीत के उपरांत रविवार को सागुन माहा अनुष्ठान के साथ पर्व काफी धूमधाम व उत्साह पूर्ण माहौल में संपन्न हुआ। पर्व के अंतिम दिन को हर परिवार के बच्चे और बड़े आसपास क्षेत्र में अलग अलग टोली में शिकार करने के लिए सुबह ही निकल पड़ते हैं। दिनभर का इस कार्यक्रम के तहत खरगोश, चूहा, पक्षी से लेकर कुछ न कुछ शिकार करने के बाद ही वे वापस लौटते है। इस संबंध में आदिवासी समाज के जानेमाने धर्मगुरु सीतानाथ हांसदा ने बताया कि संथाल समाज के प्रारंभिक काल से ही संघर्ष और शिकार की गतिविधियों में अभिरूचि रही है। खासकर बंदना-सोहराय पर्व के अंतिम दिनों में घर घर से हर उम्र के लोग शिकार करने निकलते है। उन्होंने बताया कि समाज में इस गतिविधि के माध्यम से वीरत्व का पहचान भी जीवित रखा जाता है। इस अभियान में कौन क्या शिकार कर वापस लौटता है इसे गांव टोला के बुजूर्ग लोगों के अलावा नाईकी, गुडित मांझी हड़ाम इसका मूल्यांकन भी करते है। बताया गया कि प्राचीन काल से इस पर्व में जुड़ी शिकार करने की प्रथा से उदीयमान युवाओं में संस्कृति की रक्षा करने की जहां सीख दी जाती है। वहीं शिकार करना समाज का अभिन्न अंग है। इसके प्रति भी रूचि बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। इस शिकार पर्व के दरम्यान पाथरघाटा, मधुवन, बाघटाना, भंडारकोल, रामपुर, सियालजुड़ी, मालंच आदि जंगल पहाड़ में आदिवासी समुदाय के बच्चे बड़े शिकारी को लाठी, भाला, तीर धनुष आदि पारंपरिक हथियार व वेशभुषा में देखा गया।

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