Hindi News »Jharkhand »Nala» आदिवासियों के सामाजिक समरसता का लोकप्रिय पर्व है बाहा

आदिवासियों के सामाजिक समरसता का लोकप्रिय पर्व है बाहा

संथाल समुदाय में बाहा पर्व होली पर्व की तरह उत्साह के वातावरण संपन्न हुआ है। वसंत ऋतु में होली उत्सव के संग संग यह...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 05, 2018, 03:20 AM IST

संथाल समुदाय में बाहा पर्व होली पर्व की तरह उत्साह के वातावरण संपन्न हुआ है। वसंत ऋतु में होली उत्सव के संग संग यह बाहा पर्व भी विशेषकर झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिसा एवं असम आदि राज्यों में संथाल समुदाय द्वारा पारंपरिक रीति रिवाज से मनाया जाता है। संथाल परगना की पावन माटी में यह पर्व काफी धूमधाम के साथ मनाने की परंपरा है। संथाली भाषा में बाहा का शाब्दिक अर्थ है फूल जो सौंदर्य, खुशबु और सादगी का द्योतक माना जाता है। बसंत के मौसम में होलीं पर्व के जनप्रिय पलाश फूलों की तरह बाहा पर्व में सार्जम बाहा यानी सखुआ फूल का भी अति महत्व है। इस फूल के प्रस्फुटित होने के साथ ही समुदाय में बाहा पर्व का आगाज हो जाता है तथा सभी के मन में पर्व का सुखद एहसास होने लगता है। इस पर्व की अन्यतम विशेषता यह है कि प्रत्येक गतिविधि एवं अनुष्ठान में पारंपरिक सिरींग यानी गीत नृत्य अनिवार्य अंग माना जाता है जिसमे पर्व का महत्व एवं प्राचीन इतिहास स्वतः याद दिलाता है। तीन दिवसीय इस पर्व के प्रथम दिन पवित्रता एवं समर्पण का दिन माना जाता है। आदिवासी परंपरा के अनुसार गांव में नियुक्त गुडीत यानी आदेशपाल द्वारा पर्व एवं प्रस्तुति की सूचना सभी परिवारों में दी जाती है। तदनुसार समुदाय के लोग इस दिन अपना अपना गांव टोला स्थित जाहेरथान यानी इष्टदेव का मंदिर में जमा होते हैं तथा नायकी यानी पूजारी के निर्देशानुसार जाहेरथान की साफ सफाई, सजावट, रंग रौगन से लेकर उपासना करने का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। इसी क्षण से बाहा पर्व का आनंद एवं संदेश हर गली में फैल जाते है। जाहेरथान यानी जहां भगवान जाहेर एरा को पूर्वजों ने स्थापना की है। इस स्थल में अब भी सखुआ के सैकड़ों वर्ष पूराना पेड़ अनमोल धरोहर के रूप में विराजमान है। ये पेड़ धर्म एवं आस्था का प्रतिक माना जाता है जो सदियों से जाहेरथान में साधारण घेरा या बिना घेरा के ही पूर्णरूप से सुरक्षित है। धर्म के प्रतिक इस पेड़ों के पास ही भगवान का निवास स्थान है। बाहा पर्व के दूसरे दिन भी गांव के पुरूष, महिला एवं बच्चे नहा धोकर शुद्ध चित्त में फिर एक बार जाहेरथान में उपस्थित होते है। इस मौके पर गांव के नायकी द्वारा सर्जम यानी सखुआ के फूल एवं पारपंरिक सामग्री के साथ भगवान जाहेर एरा की विधि पूर्वक पूजा की जाती है। जाहेरथान में पूजा उपासना समाप्त होते ही पूजारी पूजा के उस सखुआ फूलों को बांटने के लिए घर घर पहुंचते है। इससे पूर्व उस फूल को ग्रहण करने के लिए घर के प्रवेश द्वार पर महिलाएं लोटा में पानी लेकर इंतजार करती हैं। इस पानी से पुजारी के पैर धोने की परंपरा है बाद में उस फूल को ग्रहण करते हैं।

पारंपरिक तरीके से झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिसा व असम के संथाल समुदाय मनाते हैं त्योहार

दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | अब पाइए News in Hindi, Breaking News सबसे पहले दैनिक भास्कर पर |

More From Nala

    Trending

    Live Hindi News

    0

    कुछ ख़बरें रच देती हैं इतिहास। ऐसी खबरों को सबसे पहले जानने के लिए
    Allow पर क्लिक करें।

    ×