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श्रद्धालुओं ने सुनी हिरण्यकश्प व प्रहल्लाद की कथा

भास्कर न्यूज | नाला/बिंदापाथर नाला विधानसभा क्षेत्र के बिन्दापाथर थाना स्थित बड़वा गांव के राधा गिरिधारी मंदिर...

Dainik Bhaskar

Apr 06, 2018, 03:20 AM IST
श्रद्धालुओं ने सुनी हिरण्यकश्प व प्रहल्लाद की कथा
भास्कर न्यूज | नाला/बिंदापाथर

नाला विधानसभा क्षेत्र के बिन्दापाथर थाना स्थित बड़वा गांव के राधा गिरिधारी मंदिर परिसर में सात दिवसीय श्रीमद भागवत कथा सह प्रवचन सुनने श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। कथा में तृतीय दिन कथावाचक आचार्य गिरीधारी भैया महाराज एवं उनके सहयोगी भरत शास्त्री, बलदेव भैया, सचिन, गुड्डू, मोहन भैया आदि द्वारा श्रीमद् भागवत कथा प्रस्तुत किया गया।

कथा में धुव्र चरित्र, भक्त प्रहल्लाद का चरित्र एवं हिरणकश्व वध प्रसंग से आधारित प्रवचन प्रस्तुत किया गया। धुव्र चरित्र वर्णन करते हुए कहा कि संसार का जीव मात्र उत्तानपाद है। महाराज उत्तानपाद की सुनीति व सुरूचि नाम की दो प|ियां थीं जो न्याय-धर्म व महापुरुषों के आचरण से युक्त थी, उस सुनीति के बेटे का नाम ध्रुव था और जिसकी लालसा सदा सर्वदा संसार के भोगों को भोगने में ही रहती थी, उस सुरूचि के पुत्र का नाम उत्तम था। उत्तम भगवान से विमुख रहने वाला व संसार के विषयों में आसक्ति से युक्त था। ध्रुव जो समस्त मार्ग निर्देशकों का मार्गदर्शक है, जो चल नक्षत्रों में स्थिर है, जिसका विवाह संस्कारादि शुभ कार्यों में स्मरण किया जाता है, जिसकी नक्षत्र मंडल परिक्रमा करता है तथा जो अविनाशी परमानंद स्वरूप है, वह मातृ-पितृ भक्त, निर्गुण सगुण भगवान का परम आराधक था। भगवान के परम-प्रिय भक्त व देवर्षि नारदजी के शिष्य, अविचल धाम के अधिष्ठाता एवं संस्कारवान बालक ध्रुव की ही तो बात है। यदि तुझे पिता की गोद या पिता का सिंहासन चाहिए तो परम पुरुष भगवान् नारायण की आराधना करके, उनकी कृपा से मेरे गर्भ में आकर जन्म ले तभी राज सिंहासन की इच्छा पूर्ण होगी। ध्रुव भगवान् नारायण के चरण कमलों की आराधना में लगे तथा भक्त प्रहल्लाद का चरित्र एवं हिरणकश्व बध प्रसंग से आधारित के प्रवचन किया। भागवत में कहा कि हिरनाक्श दैत्य ने घोर तप किया तो उसके घोर तप को देखकर ब्रह्मा जी प्रगट हुए कहा-’तप प्रवान’ मांग लो जो वार मांगना है। यह सुनकर हिरनाक्शप ने अपनी आंखें खोलीं और ब्रह्मा जी को अपने समक्ष खड़ा देखकर कहा-’प्रभु! मुझे केवल यही वर चाहिए कि मैं न दिन में मरूं, न रात को, न अंदर मरूं, न बाहर, न कोई हथियार काट सके, न आग जला सके, न ही मैं पानी में डूब कर मरूं, सदैव जीवित रहूं। विष्णु भगवान ने हिरनाक्श को मारने के लिए अपने प्रय| आरम्भ कर दिए। हिरनाक्श ने अपने पुत्र प्रहल्लाद से पूछा, प्रहल्लाद ने उत्तर दिया-’आप मेरे पिता हो, पिता जी आप का नाम लेता क्या मुझे शोभा देता है। पिता जी का तो आदर करना चाहिए प्रहल्लाद मुस्कराता हुआ बोलता जा रहा था| वह निर्भय था, मेरी मृत्यु नहीं! तुम्हारी मृत्यु आई है! यह कह कर हिरनाक्श तलवार उठाने ही लगा था कि खम्भा फट गया उस खम्भे में से विष्णु भगवान नरसिंग का रूप धारण करके जिसका मुख शेर का तथा धड़ मनुष्य का था, प्रगट हुए भगवान नरसिंग अत्याचारी दैत्य हिरनाक्श को पकड़ कर हिरनाक्श का पेट चीर कर बध किया। मौके पर काफी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालु पहुंच कर भागवत कथा का श्रवण किया।

प्रवचन करते आचार्य गिरधारी भैया।

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