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श्रीकृष्ण और रुकमणि विवाह की झांकी देख श्रद्धालु हुए भावविभोर

भास्कर न्यूज|नाला/बिन्दापाथर नाला विधानसभा क्षेत्र के बिन्दापाथर थाना अन्तर्गत गेड़िया गांव स्थित बाबा...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 12, 2018, 02:40 AM IST

श्रीकृष्ण और रुकमणि विवाह की झांकी देख श्रद्धालु हुए भावविभोर
भास्कर न्यूज|नाला/बिन्दापाथर

नाला विधानसभा क्षेत्र के बिन्दापाथर थाना अन्तर्गत गेड़िया गांव स्थित बाबा कालींजर मंदिर परिसर में सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन किया गया है। उक्त कथा के छठे दिन के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण का महारासलीला, रुकमनि विवाह आदि से संबंधित प्रवचन किया गया। आयोजक मंडली द्वारा रुकमनी विवाह के अवसर पर झांकी प्रस्तुत कर बड़ी ही धूमधाम से विवाह मनाया गया। विवाह कार्यक्रम में पूरा परिसर भक्तिमय हो गया तथा भगवान श्रीकृष्ण एवं रुकमनि के विवाह की झांकी को दर्शन के लिए श्रद्धालुओं उमड़ पड़े। मौके पर वृन्दावनधाम के प्रख्यात कथा वाचिका पूज्या सुमन किशोरी जी ने श्रीमद्भागवत में भगवान श्री कृष्ण एवं का रासलीला का विस्तारपुर्वक वर्णन किया। जिसमें कहा कि गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण से उन्हें पति रूप में पाने की इच्छा प्रकट की। भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों की इस कामना को पूरी करने का वचन दिया। अपने वचन को पूरा करने के लिए भगवान ने रास का आयोजन किया। इसके लिए शरद पूर्णिमा की रात को यमुना तट पर गोपियों को मिलने के लिए कहा गया। सभी गोपियां सज-धज कर नियत समय पर यमुना तट पर पहुंच गईं। इसके बाद भगवान ने रास आरंभ किया। माना जाता है कि वृंदावन स्थित निधिवन ही वह स्थान है, जहां श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था। यहां भगवान ने एक अद्भुत लीला दिखाई। जितनी गोपियां थीं, उतने ही श्रीकृष्ण के प्रतिरूप प्रकट हो गए। सभी गोपियों को उनका कृष्ण मिल गया और दिव्य नृत्य एवं प्रेमानंद शुरू हुआ एवं रुकमनि विवाह का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार सब राजाओं को जीत लिया और विदर्भ राजकुमारी रुक्मिणी जी को द्वारका में लाकर उनका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। उस समय द्वारकापुरी के घर-घर बड़ा ही उत्सव मनाया जाने लगा। क्यों न हो, वहां के सभी लोगों का यदुपति श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम जो था। वहां के सभी नर-नारी मणियों के चमकीले कुंडल धारण किये हुए थे। उन्होंने आनन्द से भरकर चित्र-विचित्र वस्त्र पहने दूल्हा और दुल्हिन को अनेकों भेंट की सामग्रियां उपहार दीं। उस समय द्वारका की अपूर्व शोभा हो रही थी। कहीं बड़ी-बड़ी पताकाएं बहुत ऊंचे तक फहरा रही थीं। चित्र-विचित्र मालाए, वस्त्र और र|ों के तोरन बंधे हुए थे। द्वार-द्वार पर दूब, खील आदि मंगल की वस्तुएं सजायी हुई थीं। जल भरे कलश, अरगजा और धूप की सुगन्ध तथा दीपावली से बड़ी ही विलक्षण शोभा हो रही थी। मित्र नरपति आमन्त्रित किये गये थे। उत्सव में कुतूहलवश इधर-उधर दौड़-धूप करते हुए बन्धु-वर्गों में कुरु, सृज्चय, कैकय, विदर्भ, यदु और कुन्ति आदि वंशों के लोग परस्पर आनन्द मना रहे थे। जहां-तहां रुक्मिणीहरण की गाथा गयी जाने लगी। महाराज भगवती लक्ष्मीजी को रुक्मिणी के रूप में साक्षात लक्ष्मीपति भगवान श्रीकृष्ण के साथ देखकर द्वारकावासी परम आनन्द हो उठे। मौके पर गेड़िया सहित बान्दो, फुटावांध, श्रीपुर, निमवेड़ा, जाबरदाहा, निमडंगाल, इन्दुरहीड़, केशोरी, सालकुंडा, लाकड़ाकुंदा, मड़ालो, खैरा, पागला, कालाझरिया, जामजोड़िया आदि 44 मौजा के सैकड़ो की संख्या में महिला-पुरुष पहुंच कर कथा श्रवण किया।

नियम निष्ठा के साथ चड़क पूजा प्रारंभ

करमाटांड़|पवित्रता एवं आस्था से मनाये जाने वाला पर्व चड़क पूजा नियम-विधि से बुधवार से प्रारंभ हो गया। यह पर्व झिलुवा स्थित शिव मंदिर में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी चैत्र महीना के अंतिम दिन तथा पहला बैशाख को मनाया जाता है। पूजा में क्षेत्र के भक्तों ने लगातार तीन दिन तक विभिन्न प्रकार के पूजा-अर्चना कर भगवान शिव को मनाने एवं अपने पर दया दृष्टि बनाये रखने हेतु पूजा किया। गुरुवार को प्रथम अर्घ जियालजोरी स्थित राजाबांध तालाब में ब्राह्मणों के मंत्रोच्चारण के साथ किया जाएगा। शुक्रवार को मंदिर मे क्षेत्र के सैंकड़ो ग्राम के हजारों महिलाओँ ने दीपक की आरती लगा अपने परिवार की सुख संम्पति के लिए अराधना करेंगे। इस उपलक्ष्य में पहले बैसाख के दिन रात भर भव्य मेला का आयोजन किया जाएगा। समिति द्वारा मेला के रात्रि में भजन संध्या का भी आयोजन किया गया। जिसमें धनबाद के सोनी श्रीवास्तव तथा रांची से लता कुमारी गायक शामिल होंगे। इस बार पहली बार मेला में मौत का कुआं, मीना बाजार समेत कई आकर्षक खेल हुआ।

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