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श्रीकृष्ण लीला कथा सुन श्रद्धालु हुए मंत्रमुग्ध

सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा सह प्रवचन का आयोजन गेड़िया के कालींजर मंदिर में किया जा रहा है। नाला विधानसभा...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 11, 2018, 02:50 AM IST

सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा सह प्रवचन का आयोजन गेड़िया के कालींजर मंदिर में किया जा रहा है। नाला विधानसभा क्षेत्र के बिन्दापाथर थाना अन्तर्गत गेड़िया गांव स्थित बाबा कालींजर मंदिर परिसर में कथा के पांचवें दिन भी श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। इस मौके पर वृन्दावनधाम के प्रख्यात कथा वाचिका पूज्या सुमन किशोरी जी ने भागवान श्री कृष्ण का बाललीला का वर्णन किया।

उन्होंने कहा कि बालकृष्ण हैं तो अर्जुन को गीता का ज्ञान देने वाले योगेश्वर कृष्ण। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाल्यकाल में अनेकों लीला किया है। प्यारे कृष्ण आपकी एक-एक लीला मनुष्यों के लिए परम मंगलमयी और कानों के लिए अमृतस्वरूप हैं। जिसे एक बार उस रस का चस्का लग जाता है, उसके मन में फिर किसी दूसरी वस्तु के लिए लालसा ही नहीं रह जाती। भगवान श्री कृष्ण ने गृह लीलाएं जब वे मात्र छह दिन के ही थे, तब चतुर्दशी के दिन पूतना आई, जब भगवान तीन माह के हुए तो करवट उत्सव मनाया गया तभी शकटासुर आया, भगवान ने संकट भंजन करके उस राक्षस का उद्धार किया। इसी तरह बाल लीलाएं, माखन चोरी लीला, उखल बंधन लीला, यमलार्जुन का उद्धार आदि दिव्य लीलाए की। श्रीकृष्ण की प्रत्येक लीला दिव्य है और हर लीला का आध्यात्मिक है।श्रीशुकदेवजी कहते हैं- “परीक्षित। नन्दबाबा जब मथुरा से चले, तब रास्ते में विचार करने लगे कि वासुदेवजी का कथन झूठा नहीं हो सकता। इससे उनके मन में उत्पात होने की आशंका हो गयी। तब उन्होंने मन-ही-मन ‘भगवान की शरण है, वे ही रक्षा करेंगे’ ऐसा निश्चय किया। पूतना नाम की एक बड़ी क्रूर राक्षसी थी। गोकुल में नन्दबाबा ने पुत्र का जन्मोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया। ब्राह्मणों और याचकों को यथोचित गौओं तथा स्वर्ण, र|, धनादि का दान किया। कर्मकाण्डी ब्राह्मणों को बुलाकर बालक का जाति कर्म संस्कार करवाया। पितरों और देवताओं की अनेक भांति से पूजा-अर्चना की। पूरे गोकुल में उत्सव मनाया गया। कुछ दिनों पश्चात् कंस ढूंढ-ढूंढ कर नवजात शिशुओं का वध करवाने लगा। उसने पूतना नाम की एक क्रूर राक्षसी को ब्रज में भेजा। पूतना ने राक्षसी वेष तज कर अति मनोहर नारी का रूप धारण किया और आकाश मार्ग से गोकुल पहुंच गई। गोकुल में पहुंच कर वह सीधे नन्दबाबा के महल में गई और शिशु के रूप में सोते हुये श्रीकृष्ण को गोद में उठाकर अपना दूध पिलाने लगी। श्रीकृष्ण सब जान गये और वे क्रोध करके अपने दोनों हाथों से उसका कुच थाम कर उसके प्राण सहित दुग्धपान करने लगे। उसकी भयंकर गर्जना से पृथ्वी, आकाश तथा अन्तरिक्ष गूंज उठे। बहुत से लोग वज्रपात समझ कर पृथ्वी पर गिर पड़े। पूतना अपने राक्षसी स्वरूप को प्रकट कर धड़ाम से भूमि पर वज्र के समान गिरी, उसका सिर फट गया और उसके प्राण निकल गये। जब यशोदा, रोहिणी और गोपियों ने उसके गिरने की भयंकर आवाज को सुना, तब वे दौड़ी-दौड़ी उसके पास गईं। उन्होंने देखा कि बालक कृष्ण पुतना की छाती पर लेटा हुआ स्तनपान कर रहा है तथा एक भयंकर राक्षसी मरी हुई पड़ी है। उन्होंने बालक को तत्काल उठा लिया और पुचकार कर छाती से लगा लिया। पुतना की मृत्यु और श्रीकृष्ण के कुशलपूर्वक बच जाने की बात सुनकर बड़े ही आश्चर्यचकित हुए। परीक्षित उदारशिरोमणि नन्दबाबा ने मृत्यु के मुख से बचे हुए अपने लाला को गोद में उठा लिया और बार-बार उसका सर सूंघकर मन-ही-मन बहुत आनन्दित हुए। भगवान श्रीकृष्ण के बाललीला के अवसर पर आयोजक मंडली द्वारा बालगोपाल की झांकी प्रस्तुत किया। जिसके दर्शन के लिए श्रद्धालु उमड़ पड़ी। मौके पर गेड़िया सहित बान्दो, फुटावांध, श्रीपुर, निमवेड़ा, जाबरदाहा, निमडंगाल, इन्दुरहीड़, केशोरी, सालकुण्डा, लाकड़ाकुन्दा, मड़ालो, खैरा, पागला, कालाझरिया, जामजोड़िया की सैकड़ों महिला व पुरुष श्रद्धालु उपस्थित थे।

श्रीमद्भागवत कथा कहती सुमन किशोरी।

संगीतमय हनुमंत कथा में जुटे हजारों श्रद्धालु

भास्कर न्यूज|जामताड़ा

जेबीसी खेल मैदान में चल रहे श्रीश्री 108 संगीतमय हनुमंत कथा में अंतिम दिन की कथा समिति के सचिव तरुण गुप्ता, पप्पू भैया व उनकी धर्मप|ी नीलम भैया, संजय परशुरामका, राजा नित्यगोपाल सिंह के नेतृत्व में हनुमानजी की आरती के साथ प्रारम्भ हुई। श्री प्रदीप जी महाराज ने अंतिम दिन की कथा में श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि मैंने देश - विदेश में कई कथाएं की है। लेकिन जामताड़ा की जनता धन्य है जो इस पांच दिवसीय कथा में बारिश-तूफान के बावजूद भी कथा का आनंद लेने पहुंचे। कथा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि हनुमान जी सीता से विदा लेकर रामजी के पास पहुंचते है और सीता माता की कथा रामजी को सुनाते है। राम जी हनुमानजी को कहते है कि मैं तुम्हारा ऋणी हो गया, मैं तुम्हारा ऋण कैसे चुकाऊंगा और साथ ही रामजी हनुमानजी की प्रशंसा भी करते है। हनुमानजी का मन अपनी प्रशंसा सुनकर व्याकुल हो उठा , हनुमानजी जोर -जोर से चिल्लाने लगे भगवान हमें बचाइये। तब प्रभु ने कहा कि मैं तुम्हारे साथ हूं, फिर भी तुम घबरा रहे हो, जबकि लंका में तुम्हें राक्षसों से , रावण से डर नहीं लगा। तब हनुमानजी कहते है कि प्रभु मुझे प्रशंसा से डर लगता है। उसी संदर्भ में महाराज जी ने कहा कि हमें प्रशंसा सुनने की आदत नहीं डालना चाहिये। बल्कि इस मानव जीवन का हम कैसे सदुपयोग करे, लोगों की, सेवा करे, मदद करे, इसकी चिंता करना चाहिए। जब हमारा जन्म हुआ है तो मरण स्वाभाविक है। इसलिए हमारे मरने के बाद लोग हमारे कर्म के लिए ही हमें याद करेंगे। महाराज जी ने कथा में राजा दशरथ और श्रवण कुमार की घटना का विवरण किया। उसके पश्चात अंतिम दिन की कथा को समाप्त कर प्रदीप जी महाराज ने विदाई ली। कथा के निमित्त संगीत मंडली द्वारा प्रस्तुत संगीत पर श्रोता झूम उठे। कथा समाप्ति के पश्चात महाप्रसाद का वितरण किया गया। इस अवसर पर आयोजन समिति के सचिव तरुण गुप्ता, पूर्व विधायक विष्णु प्रसाद भैया, प्रदीप केडिया, संजय परशुरामका, राजा नित्यगोपाल सिंह, आशा गुप्ता, चण्डी चरण दे, अनूप राय, प्रदीप भैया, मनीष नारनोलिया, भूपेश गुप्ता, सन्तन मिश्रा, जीतू सिंह, निमाई सेन, सुधीर मंडल, महावीर सरावगी, समेत सैकड़ों श्रोता उपस्थित थे।

प्रसाद वितरण के साथ 108 कथा का समापन

कथा कहते प्रदीप जी महाराज व उनकी टीम।

नाला के अमलाजोड़ा में हरिराम संकीर्तन का समापन

नाला|प्रखंड क्षेत्र के अमलाजोड़ा गांव में चार दिवसीय हरिराम संकीर्तन भक्ति के वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम के अंतिम दिन मंगलवार को वीरभद्र के कीर्तन शिल्पी प्रवीर राय ने कुंजविलास प्रसंग का वर्णन किया। राधा कृष्ण के कुंजविलास और वृंदावनधाम में प्रवाहित भक्तिरस का सैकड़ों भक्त वैष्णव ने आस्वादन किया। कहा कि भगवान की लीलाभूमि श्रीश्री वृंदावनधाम में अब भी धार्मिक वातावरण विराजित है। उस पवित्र भूमि में पहुंचते ही प्राणी में सद्गुण और धर्म का संचार होता है। मानव की मुक्ति के लिए कलियुग में हरिराम ही एकमात्र सहज सरल मार्ग है। कार्यक्रम के अंत में खिचड़ी प्रसाद का वितरण हुआ। जिसमें सुड़ियापानी, अमलाजोड़ा, दलाबड़ समेत आसपास गांव के महिला पुरुष काफी संख्या में शामिल हुए। इस कार्यक्रम का संचालन में बकुल मंडल, बापी पातर, लखन बाउरी, सागर चंद्र मंडल, उज्जवल बाउरी आदि ने अहम भूमिका निभाई है।

भास्कर न्यूज|जामताड़ा

जेबीसी खेल मैदान में चल रहे श्रीश्री 108 संगीतमय हनुमंत कथा में अंतिम दिन की कथा समिति के सचिव तरुण गुप्ता, पप्पू भैया व उनकी धर्मप|ी नीलम भैया, संजय परशुरामका, राजा नित्यगोपाल सिंह के नेतृत्व में हनुमानजी की आरती के साथ प्रारम्भ हुई। श्री प्रदीप जी महाराज ने अंतिम दिन की कथा में श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि मैंने देश - विदेश में कई कथाएं की है। लेकिन जामताड़ा की जनता धन्य है जो इस पांच दिवसीय कथा में बारिश-तूफान के बावजूद भी कथा का आनंद लेने पहुंचे। कथा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि हनुमान जी सीता से विदा लेकर रामजी के पास पहुंचते है और सीता माता की कथा रामजी को सुनाते है। राम जी हनुमानजी को कहते है कि मैं तुम्हारा ऋणी हो गया, मैं तुम्हारा ऋण कैसे चुकाऊंगा और साथ ही रामजी हनुमानजी की प्रशंसा भी करते है। हनुमानजी का मन अपनी प्रशंसा सुनकर व्याकुल हो उठा , हनुमानजी जोर -जोर से चिल्लाने लगे भगवान हमें बचाइये। तब प्रभु ने कहा कि मैं तुम्हारे साथ हूं, फिर भी तुम घबरा रहे हो, जबकि लंका में तुम्हें राक्षसों से , रावण से डर नहीं लगा। तब हनुमानजी कहते है कि प्रभु मुझे प्रशंसा से डर लगता है। उसी संदर्भ में महाराज जी ने कहा कि हमें प्रशंसा सुनने की आदत नहीं डालना चाहिये। बल्कि इस मानव जीवन का हम कैसे सदुपयोग करे, लोगों की, सेवा करे, मदद करे, इसकी चिंता करना चाहिए। जब हमारा जन्म हुआ है तो मरण स्वाभाविक है। इसलिए हमारे मरने के बाद लोग हमारे कर्म के लिए ही हमें याद करेंगे। महाराज जी ने कथा में राजा दशरथ और श्रवण कुमार की घटना का विवरण किया। उसके पश्चात अंतिम दिन की कथा को समाप्त कर प्रदीप जी महाराज ने विदाई ली। कथा के निमित्त संगीत मंडली द्वारा प्रस्तुत संगीत पर श्रोता झूम उठे। कथा समाप्ति के पश्चात महाप्रसाद का वितरण किया गया। इस अवसर पर आयोजन समिति के सचिव तरुण गुप्ता, पूर्व विधायक विष्णु प्रसाद भैया, प्रदीप केडिया, संजय परशुरामका, राजा नित्यगोपाल सिंह, आशा गुप्ता, चण्डी चरण दे, अनूप राय, प्रदीप भैया, मनीष नारनोलिया, भूपेश गुप्ता, सन्तन मिश्रा, जीतू सिंह, निमाई सेन, सुधीर मंडल, महावीर सरावगी, समेत सैकड़ों श्रोता उपस्थित थे।

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