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महिलाओं ने पति की दीर्घायु की कामना की

भास्कर न्यूज|नाला/बिन्दापाथर/ फतेहपुर वट सावित्री व्रत क्षेत्र में भक्ति एवं उत्साह के साथ मनाया गया। मौके पर...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 16, 2018, 03:35 AM IST

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    भास्कर न्यूज|नाला/बिन्दापाथर/ फतेहपुर

    वट सावित्री व्रत क्षेत्र में भक्ति एवं उत्साह के साथ मनाया गया। मौके पर बिन्दापाथर, फतेहपुर, मंझलाडीह, मोहनवांक, सुन्दरपुर, जगन्नाथपुर, कड़या, हरिराखा, डुमरिया, जलाई, बाघमारा, वामनबांधी, बेजबेधिया सहित पूरे क्षेत्र में भक्तिमय वातावरण में मनाया गाया। सौभाग्यवती स्त्री पति के दीर्घ जीवन की कामना के लिए यह व्रत रखती है। इस व्रत को करने वाले को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। प्रत्येक साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। मौके पर क्षेत्र के विभिन्न गांव के वट वृक्ष ने नीचे धूप, दीप, गंध पुष्प आदि से ब्रह्मा सावित्री की पूजा किया गया एवं सौभाग्य की कामना के संकल्प से पूजा के बाद सुहागिन स्त्रियों ने अक्षय वट की परिक्रमा करते हुए धागे के फेरे लगाई ओर सबों ने पति की लम्बी आयु की कामना किया। वहीं वट वक्ष के पास व्रती महिलाओं ने सावित्री और सत्यवान की कथा भी सुनी। कथा कहते हुए पंडित ने कहा कि राजा ऋषि अश्वपति की एकमात्र कन्या थी। वर के खोज में जाते समय उसने वनवासी निर्वासित राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान का वरण कर लिया। सावित्री मन ही मन अपने वरन से खुश वापस घर चली आई और अपने वरण का वृतांत पिता से सुना दिया। राजा अश्वपति के घर नारद जी पधारे थे। राजा ने पुत्री द्वारा वर्णित सत्यवान की कुंडली नारद जी से दिखाई। कुंडली देख कर नारद जी बोले ये लड़का तो अल्पायु है। इस साल के अंत में इसकी मृत्यु निश्चित है। राजा और देवर्षि दोनों ने सावित्री को बहुत समझाया लेकिन, सावित्री मन से सत्यवान को अपना पति मान चुकी थी अपने विचार से अडिग रही। सावित्री सत्यवान से विवाह कर के राजमहल के सुख को छोड़कर वन में चली आई। एक दिन दिन सत्यवान जंगल में समाधि के लिए लकडिय़ां काट रहे थे। अचानक सिर में दर्द होने लगा और चक्कर आने लगा वो कुल्हाड़ी फेंक कर पेड़ से नीचे उतर आए। पति का सिर गोद में लेकर सावित्री अपने आंचल से हवा करने लगी। थोड़ी देर में सावित्री ने दक्षिण दिशा से अपनी ओर आते हुए भैंसे पर सवार एक पुरुष को देखा। इस देव पुरुष का काला शरीर सुन्दर अंगवाला था और इसने अपने हाथ में यम पाश लिए हुए थे। देखते ही देखते इस देवपुरुष ने सत्यवान को पाश में जकड़ लिया और सत्यवान के शरीर से अंगुष्ठ मात्र आकार वाले पुरुष को बलात बाहर खींच लिया। अत्यंत व्याकुल होकर सावित्री ने उस पुरुष से पूछा हे देव आप कौन है। यमराज ने उत्तर दिया मैं यम हूं तुम्हारे पति की आयु क्षीण हो गयी है इसलिए मैं इसे ले जा रहा हूं, यह कह कर यमराज दक्षिण दिशा की ओर जाने लगे। सावित्री भी यम के पीछे पीछे जाने लगी। पतिव्रता स्त्री के तप और निष्ठा से हारकर यमराज ने कहा कि तुम पति के बदले तीन वरदान मांग लो। पहले वर में सावित्री ने अपने अंधे सास ससुर की आंखें मांगी। दूसरे वरदान में उसने अपने पिता के सौ पुत्र मांगे। यमराज ने दूसरा वरदान भी दे दिया। अब तीसरे वरदान की बारी थी। इसबार सावित्री ने अपने लिए सत्यवान से तेजस्वी पुत्र का वरदान मांगा। यमराज एवमस्तु कह कर जाने लगे तो सावित्री ने उन्हें रोकते हुए कहा। पति के बिना पुत्र कैसे संभव है। ऐसा कह सावित्री ने यमराज को उलझन में डाल दिया। बाध्य होकर यमराज को सत्यवान को पुन: जीवित कर दिया। इसी दिन से वट सावित्री व्रत मनाया जाने लगे। फतेहपुर प्रखंड वट सावित्री की पूजा धूमधाम के साथ मनायी गयी। अहले सुबह से ही सुहागिन स्त्रियां वट वृक्ष का विधि-विधान के साथ पूजा अर्चना की। सुहागिन स्त्रियां वृक्ष के चारों और मंत्र उच्चारण के साथ परिक्रमा कर मौली बांधी।

    जामताड़ा में वट सावत्री की पूजा करने जाती महिलाएं।

    नारायणपुर में वट सावित्री की पूजा करती महिलाएं।

    सौभाग्यवती के लिए महिलाओं ने की वटवक्ष की पूजा

    भास्कर न्यूज |मुरलीपहाड़ी

    नारायणपुर प्रखंड के विभिन्न भागों में मंगलवार को दूसरे दिन भी वट सावित्री व्रत के निमित्त पूजा-अर्चना की गयी। मान्यता है कि इस व्रत को करने से सुहागिन महिला को अखंड सौभाग्यवती का वरदान प्राप्त होता है। कुछ महिलायें पुत्र प्राप्ति के लिये भी यह व्रत मन क्रम और वचन के साथ किये जाते है। वट सावित्री व्रत के अवसर पर वट वृक्ष तले सुहागिन महिलायें सती सावित्री एवं सत्यवान की कथा को अपने बुजुर्गों से सुनती है और पति के माथे पर कुमकुम का तिलक कर पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करती है। आज के दिन सुहागिनें सुहाग की सलामती को लेकर भी यह त्योहार निर्जला उपवास कर मनाती है। इस बाबत सुबह से ही महिलाओं ने वट वृक्ष पर रक्षा सूत्र बांधकर पति की सलामती की दुआ मांगा। पूजा-अर्चना में लगने वाली सामग्री में वट वृक्ष के पत्ते, पंखा, रोली, मोली, कुमकुम, सिन्हुआ सिंदूर, धूप, दीप, फल, ठेंकुआ आदि एक सुंदर थाल में लेकर बट वृक्ष पर चढ़ाकर प्रसाद स्वरूप वितरण किया जाता है। सावित्री सत्यवान की अमरकथा में यह वर्णन किया गया है की सती नारी सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण को यमराज से लौटाने हेतु वट वृक्ष की लंबी-लंबी शाखाओं की पूजा मन, क्रम, और वचन से की थी। वट वृक्ष की पूजा कर सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण को यमराज से वापस मांग लिया था। पति के प्राण की रक्षा का प्रण करने वाली सती सावित्री को लोग युगों युगों तक याद करते रहेंगे। इसी मान्यता को लेकर सुहागिन महिलायें हर साल वट वृक्ष की पूजा करती है।

    भास्कर न्यूज|नाला/बिन्दापाथर/ फतेहपुर

    वट सावित्री व्रत क्षेत्र में भक्ति एवं उत्साह के साथ मनाया गया। मौके पर बिन्दापाथर, फतेहपुर, मंझलाडीह, मोहनवांक, सुन्दरपुर, जगन्नाथपुर, कड़या, हरिराखा, डुमरिया, जलाई, बाघमारा, वामनबांधी, बेजबेधिया सहित पूरे क्षेत्र में भक्तिमय वातावरण में मनाया गाया। सौभाग्यवती स्त्री पति के दीर्घ जीवन की कामना के लिए यह व्रत रखती है। इस व्रत को करने वाले को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। प्रत्येक साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। मौके पर क्षेत्र के विभिन्न गांव के वट वृक्ष ने नीचे धूप, दीप, गंध पुष्प आदि से ब्रह्मा सावित्री की पूजा किया गया एवं सौभाग्य की कामना के संकल्प से पूजा के बाद सुहागिन स्त्रियों ने अक्षय वट की परिक्रमा करते हुए धागे के फेरे लगाई ओर सबों ने पति की लम्बी आयु की कामना किया। वहीं वट वक्ष के पास व्रती महिलाओं ने सावित्री और सत्यवान की कथा भी सुनी। कथा कहते हुए पंडित ने कहा कि राजा ऋषि अश्वपति की एकमात्र कन्या थी। वर के खोज में जाते समय उसने वनवासी निर्वासित राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान का वरण कर लिया। सावित्री मन ही मन अपने वरन से खुश वापस घर चली आई और अपने वरण का वृतांत पिता से सुना दिया। राजा अश्वपति के घर नारद जी पधारे थे। राजा ने पुत्री द्वारा वर्णित सत्यवान की कुंडली नारद जी से दिखाई। कुंडली देख कर नारद जी बोले ये लड़का तो अल्पायु है। इस साल के अंत में इसकी मृत्यु निश्चित है। राजा और देवर्षि दोनों ने सावित्री को बहुत समझाया लेकिन, सावित्री मन से सत्यवान को अपना पति मान चुकी थी अपने विचार से अडिग रही। सावित्री सत्यवान से विवाह कर के राजमहल के सुख को छोड़कर वन में चली आई। एक दिन दिन सत्यवान जंगल में समाधि के लिए लकडिय़ां काट रहे थे। अचानक सिर में दर्द होने लगा और चक्कर आने लगा वो कुल्हाड़ी फेंक कर पेड़ से नीचे उतर आए। पति का सिर गोद में लेकर सावित्री अपने आंचल से हवा करने लगी। थोड़ी देर में सावित्री ने दक्षिण दिशा से अपनी ओर आते हुए भैंसे पर सवार एक पुरुष को देखा। इस देव पुरुष का काला शरीर सुन्दर अंगवाला था और इसने अपने हाथ में यम पाश लिए हुए थे। देखते ही देखते इस देवपुरुष ने सत्यवान को पाश में जकड़ लिया और सत्यवान के शरीर से अंगुष्ठ मात्र आकार वाले पुरुष को बलात बाहर खींच लिया। अत्यंत व्याकुल होकर सावित्री ने उस पुरुष से पूछा हे देव आप कौन है। यमराज ने उत्तर दिया मैं यम हूं तुम्हारे पति की आयु क्षीण हो गयी है इसलिए मैं इसे ले जा रहा हूं, यह कह कर यमराज दक्षिण दिशा की ओर जाने लगे। सावित्री भी यम के पीछे पीछे जाने लगी। पतिव्रता स्त्री के तप और निष्ठा से हारकर यमराज ने कहा कि तुम पति के बदले तीन वरदान मांग लो। पहले वर में सावित्री ने अपने अंधे सास ससुर की आंखें मांगी। दूसरे वरदान में उसने अपने पिता के सौ पुत्र मांगे। यमराज ने दूसरा वरदान भी दे दिया। अब तीसरे वरदान की बारी थी। इसबार सावित्री ने अपने लिए सत्यवान से तेजस्वी पुत्र का वरदान मांगा। यमराज एवमस्तु कह कर जाने लगे तो सावित्री ने उन्हें रोकते हुए कहा। पति के बिना पुत्र कैसे संभव है। ऐसा कह सावित्री ने यमराज को उलझन में डाल दिया। बाध्य होकर यमराज को सत्यवान को पुन: जीवित कर दिया। इसी दिन से वट सावित्री व्रत मनाया जाने लगे। फतेहपुर प्रखंड वट सावित्री की पूजा धूमधाम के साथ मनायी गयी। अहले सुबह से ही सुहागिन स्त्रियां वट वृक्ष का विधि-विधान के साथ पूजा अर्चना की। सुहागिन स्त्रियां वृक्ष के चारों और मंत्र उच्चारण के साथ परिक्रमा कर मौली बांधी।

    बिंदापाथर के विभिन्न इलाकों में भी हुई पूजा

    बिंदापाथर|क्षेत्र में वट सावित्री व्रत हर्षोल्लास के साथ सुहागीन महिलाओं ने मंगलवार को मनाया। व्रत को लेकर सुहागिन महिलायें सुबह से ही श्रृंगार कर पति के दीर्घायु की कामना के लिए वट वृक्ष में मंगलसूत्र बांध कर किया। इस दौरान फल फूल नेवेद्य चढ़ाकर सावित्री सत्यवान की पूजा-अर्चना की। मौके पर बुजुर्ग महिलाओं ने सावित्री सत्यावान की पौराणिक कथा सुना। उपस्थित सभी सुहागिनों ने कथा श्रवण करते हुए अपने पति के सुहाग रक्षा की कामना की।

    जामताड़ा में वरगद के पेड़ को रक्षा सूत बांधती महिलाएं।

    मिहिजाम में बरगद के पेड़ पर रक्षासूत बांधती व्रती महिलाएं।

    नारायणपुर में धूमधाम से महिलाओं ने की वट सावित्री की पूजा

    नारायणपुर|नारायणपुर सहित प्रखंड के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों में मंगलवार को वट सावित्री की पूजा काफी धूमधाम के साथ आयोजित की गई। पूजा को लेकर बरगद के पेड़ के नीचे एक दिन पूर्व ही साफ सफाई की गई थी। महिलाएं नए-नए पोशाक पहनकर एवं श्रृंगार कर वट सावित्री की पूजा अर्चना की। पूजा को लेकर हर जगह उत्साह दिखा। यह पूजा सुहागन पति के दीर्घायु होने एवं पुत्र सहित अन्य सुख समृद्धि के लिए करती है। महिलाएं बरगद वृक्ष की पूजा कर उसमें रक्षा सूत्र बांध अपने पति के दीर्घायु होने की कामना की। काफी सुबह से ही बरगद वृक्ष के नीचे पूजा करने वाली महिलाओं की भीड़ देखी गई। इस पूजा के अवसर पर कई स्थानों पर सत्यवान एवं सावित्री की कथा भी सुनाई गई। पूजा के उपरांत प्रसाद का भी वितरण किया गया। नारायणपुर के अलावा कमलडीह, पांडेयडीह, रामनगर सहित अन्य भागों में वट सावित्री की पूजा काफी धूमधाम के साथ आयोजित की गई।

    शहरी इलाकों में भी हुई वट वृक्ष की पूजा

    जामताड़ा|पति की लंबी उम्र की कामना के लिए सुहागिनों ने मंगलवार को वट सावित्री की पूजा पूरे विधि-विधान से किया। जामताड़ा में अलग-अलग जगहों पर महिलाओं की टोली पूजा करती दिखीं। सुहागिनें 16 श्रृंगार करके बरगद के पेड़ के पास पहुंच रहीं थी। षष्टीतला जामताड़ा में पूजा करने आईं महिलाओं ने बताया कि इस दिन महिलाएं वट वृक्ष के फेरे लगाती हैं। ताकि सुहाग दीर्घायु हो और उन्नति के पथ पर आगे बढ़े। बताया कि प्यार, श्रद्धा और समर्पण के इस देश में यह व्रत सच्चे और पवित्र प्रेम की कहानी कहता है। बताया कि मान्यता है कि इसी दिन मां सावित्री ने यमराज के फंदे से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी। भारतीय धर्म में वट सावित्री पूजा स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे करने से हमेशा अखंड सौभाग्यवती रहने का आशीष प्राप्त होता है।

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