--Advertisement--

सरकार को खुली चुनौती: सरकारी स्कूलों की पढ़ाई गलत, चुनावों का बायकॉट कर अपनी अलग करंसी चलाएंगे

ग्रामसभा में राज्य और केंद्र सरकार को खुली चुनौती देते हुए ये एलान किया गया कि हमने बच्चों को सरकारी स्कूल भेजना बंद कर

Danik Bhaskar | Mar 10, 2018, 04:07 AM IST
खूंटी के भंडरा गांव में पत्थलगड़ी की वर्षगांठ पर जुटे कई गांवों के लोग। इस दौरान सरकार और प्रशासन के खिलाफ उन्हें भड़काया गया। चुनाव बहिष्कार का एेलान किया गया। खूंटी के भंडरा गांव में पत्थलगड़ी की वर्षगांठ पर जुटे कई गांवों के लोग। इस दौरान सरकार और प्रशासन के खिलाफ उन्हें भड़काया गया। चुनाव बहिष्कार का एेलान किया गया।

खूंटी(झारखंड). राजधानी रांची से महज 35 किमी दूर खूंटी में पत्थलगड़ी की वर्षगांठ को लेकर शुक्रवार को यहां कई गांवों के आदिवासी ग्रामीण जुटे। इस दौरान डॉ जोसेफ पूर्ति के नेतृत्व में भंडरा मैदान में विशाल सभा का आयोजन किया गया। इस ग्रामसभा में राज्य और केंद्र सरकार को खुली चुनौती देते हुए ये एलान किया गया कि हमने बच्चों को सरकारी स्कूल भेजना बंद कर दिया है। अब हम चुनावों का भी बहिष्कार करेंगे। सरकारी स्कूलों की पढ़ाई को गलत बताते हुए अपने स्कूल खोलने और बच्चों को अपने ढंग से पढ़ाने की भी बात कही।

कहा- हम बहस के लिए तैयार, लेकिन हमसे कोई बहस नहीं करना चाहता

खूंटी के भंडरा गांव में हुई ग्रामसभा में जहां एक ओर पूरे दिन उत्सव जैसा नजारा था, तो दूसरी ओर उनके बीच अपने हक को लेकर सरकार के प्रति गुस्सा भी दिखाया गया। इससे पूर्व एक साल पूर्व भंडरा चौक में की गई पत्थलगड़ी को स्नान कराकर पूजा पाठ की गई। मुख्य अतिथि डॉ जोसेफ पूर्ति ने कहा कि सरकार और जिला प्रशासन के लोग अभियान को गलत ठहरा रहे है। हम इस मुद्दे पर बहस को तैयार है, लेकिन हमसे कोई बहस नहीं करना चाहते है, क्योंकि वैसे लोग जानते हैं कि बहस में कहीं नहीं टिकेंगे।

ये भी पढ़ें-

पीएम हों या सीएम, झारखंड के 4 जिलों के 34 गांवों में बिना इजाजत घुस नहीं सकते

इस जिले के 1585 एकड़ में होती है अफीम की खेती, पुलिस यहां कभी नहीं जाती

झारखंड के खूंटी में कई सरकारी स्कूल बंद, छपवा रहे अपनी किताबें, पढ़ा रहे...च से चाेर

बताया- पूरे देश में सरकार की एक इंच जमीन नहीं है, देश का मालिक आदिवासी है

जोसेफ पूर्ति के मुताबिक, अंग्रेजों से अबतक भारत आजाद नहीं हुआ है, सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण हुआ है। आजादी का मतलब स्वतंत्र होता है। स्वतंत्रता स्वशासन हम आदिवासियों को नहीं मिली है। अभी आदिवासी लोग भारत सरकार के नियमों को पत्थरों पर अंकित करने काम कर रहे हैं। ताकि सरकार के लोग यह देखें कि भारत सरकार का नियम क्या हैं? पूरे देश में सरकार की एक इंच जमीन नहीं है। देश का मालिक आदिवासी है। सरकार बनने के लिए भूमि चाहिए। भारत के पास अपनी कोई भूमि नहीं है, तो सरकार कैसे बन सकती है।

आदिवासी तो मालिक हैं, वे नियम का पालन क्यों करेंगे?

जोसेफ पूर्ति ने कहा कि सरकारी स्कूलों में बच्चों को गलत बातें पढ़ाई जाती है। इसलिए आदिवासियों ने सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को भेजना बंद कर दिया है। ग्रामसभा गांव-गांव में अपना स्कूल चलाएगी। जहां रूढ़ीवादी ढंग से पढ़ाई होगी। पांचवीं अनुसूची के मुताबिक क्षेत्र में चुनाव नहीं हो सकता। इसलिए इन क्षेत्रों में लोकसभा, विधानसभा और पंचायत चुनाव अवैध है। ग्रामसभा सांसद और विधायक को असंवैधानिक मानती है। दिकुओं को यहां का नियम-कानून मानना पड़ेगा। आदिवासी तो मालिक हैं, वे नियम का पालन क्यों करेंगे?

राष्ट्रविरोधी पत्थलगड़ी करने वालों के अजीबो-गरीब तर्क, जिससे ग्रामीणों को बगरलाया जा रहा है

1. भारत अब तक आजाद नहीं

देश का लीज करार भारत सरकार (आदिवासियों) के साथ 1870 में 99 साल के लिए हुई थी। जिसकी अवधि 1969 में समाप्त हो गई। इसके बाद लीज करार बढ़ा नहीं। गैर आदिवासी विदेशियों का कहना है कि आदिवासी वोट के जरिए लीज का नवीनीकरण हर पांच वर्षों में करते आ रहे हैं। ऐसे में वोट न देकर हम अपना यानी आदिवासियों का शासन स्थापित कर सकते हैं।

2. अपनी अलग करंसी चलाएंगे

2 से लेकर 2000 तक के नोट रिजर्व बैँक ऑफ इंडिया जारी करती है। जो केंद्र सरकार से प्रत्याभूत है। एक रुपए करेंसी है। चूंकि पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में केंद्र और राज्य सरकार कानून बनाने का अधिकार समान्यत: नहीं है। इसलिए केंद्र के प्रत्याभूत नोट भी पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में प्रभावी नहीं है। इसलिए ग्राम सभा पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में अपनी करेंसी लाएगी।

3. सबको मिलेंगे ~20-20 लाख

अपनी करंसी लाने के बाद सब ग्रामीणों के खातों में 20-20 लाख रुपए डाले जाएंगे। पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के संसाधनों पर ग्राम सभा अधिकार हो जाएगा तो ये काम संभव है। जैसे पड़ोसी देश नेपाल में भी इंडिया का नोट चलता है। भारत की जिस तरह की करेंसी और नोट चलती है, उसी तरह पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में भी विनिमय और समन्वय स्थापित की जाएगी।

4. हर सवाल का डीसी ने दिया जवाब

डीसी सूरज कुमार ने कहा कि पत्थलगड़ी करने वाले कहते हैें कि वे वोटर कार्ड को नहीं मानते, पर अनुच्छेद 12 में साफ लिखित है कि राज्य की परिभाषा क्या है। इसमें संसद और सरकार के अधिकार िनहित हैं। अनुच्छेद 13 में कहा गया है कि जिस विधि से किसी के मौलिक अधिकार का हनन हो, वह स्वत- ही शून्य हो जाता है। अनुच्छेद 13(3)क में साफ है कि कानून बनाने का अधिकार सिर्फ राज्य का है। अनुच्छेद 19(5)(6) में कहा गया है कि 5वीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में भी राज्य की कार्यकारी शक्तियां निहित हैं।

पत्थलगड़ी राज्य के अंदर एक अलग राज्य का संकेत : सरयू

खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने शुक्रवार को बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में स्वदेशी मेला के उद्घाटन समारोह में कहा कि पत्थलगड़ी राज्य के अंदर एक अलग राज्य बनाने का संकेत है, जिसे समय रहते सरकार गंभीरता से नहीं लेगी और रोकेगी नहीं, तो यह घातक होगा। जैसे एक फुंसी जब नासूर बन जाता है, तो वह लाइलाज हो जाता है। पत्थलगड़ी करने वाले सत्ता में बैठी शक्तियों को हटाना चाहती है, जो राज्यहित में नहीं है।

खूंटी के स्कूलों के बारे में शिक्षा मंत्री ने की सीएम से बात

खूंटी के कुछ स्कूलों को जबरन बंद कराने और वहां पर आपत्तिजनक पढ़ाई शुरू कराने के बारे में शिक्षा मंत्री नीरा यादव ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री से बात की। मंत्री ने कहा कि यह गंभीर मसला है। इस बारे में विभागीय सचिव और शिक्षा विभाग के अन्य अधिकारियों के साथ मंथन किया है। खूंटी के डीसी से भी बात हुई है। विभाग के प्रधान सचिव एपी सिंह ने कहा कि यह मामला पूरी तरह कानून व्यवस्था का है।

पूर्वजों को याद करने का माध्यम है पत्थलगड़ी : डाॅ. प्रकाश उरांव

जनजातीय शोध संस्थान के पूर्व निदेशक डा प्रकाश उरांव का कहना है कि वर्तमान में हो रहे पत्थलगड़ी के उद्देश्य व उसके पीछे क्या रणनीति है, इस पर वे टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं। केवल इतना कहूंगा कि पत्थलगड़ी का उद्देश्य केवल और केवल अपने पूर्वजों को याद करने का माध्यम ही सदियों से रहा है। मुंडा, हो तथा संथाल जनजातीय समाज में यह परंपरा सदियों पूर्व शुरू हुई। जो अभी भी जारी है।

झारखंड के खूंटी समेत 4 जिलों के 34 गांवों में बिना इजाजत घुस नहीं सकते। झारखंड के खूंटी समेत 4 जिलों के 34 गांवों में बिना इजाजत घुस नहीं सकते।