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मैं वहां से नहीं भागता तो मृतकों की संख्या तेरह होती

आठ जून, 2015 की रात पलामू जिले के सतबरवा थाना क्षेत्र के बकोरिया में हुए कथित फर्जी मुठभेड़ से कुछ देर पहले तक नक्सली...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 02:00 PM IST

आठ जून, 2015 की रात पलामू जिले के सतबरवा थाना क्षेत्र के बकोरिया में हुए कथित फर्जी मुठभेड़ से कुछ देर पहले तक नक्सली कमांडर अनुराग के साथ बरवाडीह थाना क्षेत्र के हरातू गांव निवासी राजकमल सिंह का 14 वर्षीय पुत्र सीताराम सिंह भी था। थोड़ी देर पहले वहां से नहीं भागता तो उस कथित मुठभेड़ में मृतकों की संख्या 13 हो जाती। कथित मुठभेड़ से कुछ देर पहले ही वह भागने में सफल हो गया था।

नक्सली कमांडर अनुराग व सीताराम के अलावा इसी गांव के सकेंद्र परहिया, उमेश सिंह व महेंद्र सिंह नामक नाबालिग बच्चे को भी रास्ता बताने के लिए अपने साथ ले गया था, जो कथित फर्जी मुठभेड़ में मारे गए थे। सबसे बड़ी बात कि दोनों की पहचान ढाई साल बाद सीआईडी ने आठ जनवरी, 2018 को की। सीताराम सिंह ने बताया कि बकोरिया से पहले एक छलका (जल स्रोत) के पास अनुराग से चितकबरा ड्रेस पहने हथियार बंद कुछ लोग मिले भी थे। अनुराग ने उनसे हाथ भी मिलाया था। मैं उस समय थोड़ी दूर पर था। मुझे पकड़ने के लिए उनलोगों ने दौड़ाया, लेकिन मैं भागने में सफल हो गया था। इसके बाद मुझे कुछ भी पता नहीं है। दूसरे दिन मुझे जानकारी मिली कि सब लोग मारे गये, जिसके बाद मैं काफी डर गया। मुझे इस बात की चिंता सताने लगी कि वे लोग मुझे भी खोज कर मार देंगे।

सीताराम ने बताया कि भागने के बाद जब वह गांव में आकर रहने लगा, तब मुझे नक्सली जंगल में ले गए। मैं वहां से भी भागकर गांव में आ गया। गांव में कुछ दिन रहने के बाद मैंने नजदीक के पुलिस पिकेट में जाकर पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया, क्योंकि मुझ पर और मेेेेरे परिवार वालों पर सरेंडर करने का पुलिसिया दबाव था। मैंने पुलिस को पूरी बात बताई, जिसके बाद मुझे दूसरी जगह पुलिस पिकेट में भेज दिया गया। लगभग दो साल तक मुझे वहां रखा गया। इस दौरान मुझे पढ़ने के लिए महुडांड़ के सरकारी स्कूल में भेजा जाता था। पुलिस के पास से लौटने के वर्तमान में वह छिपादोहर आवासीय विद्यालय के वर्ग छह में पढ़ रहा है।

पूरी जानकारी देती ग्रामीण महिलाएं।

पुलिस मां से मिलाती थी सीताराम को

सीताराम सिंह की मां संगीता देवी ने बताया कि पुलिस ने सीताराम को करीब दो साल तक अपने साथ रखा। इस दौरान पुलिस उसे लेकर कई बार गांव भी आयी। पुलिस के लोग जब भी सीताराम को लेकर उसके पास आते थे, तब बताते थे कि सीताराम को पढ़ा रहे हैं। संगीता देवी के मुताबिक वह खुद भी कई बार लातेहार गयी। वहां जाकर पुलिस से मिली और सीताराम से मुलाकात की।

रास्ता बताने के लिए साथ ले गये थे नक्सली

सीताराम ने जो बताया है, वह काफी चौंकानेवाला है। उसने बताया कि कथित मुठभेड़ के दो दिन पहले यानी छह जून, 2015 की रात नक्सली अनुराग और उसके साथ के दो लोग लादी गांव में रुके हुए थे। सात जून, 2015 को वह जंगल में गाय चराने गया था। तभी नक्सली अनुराग उर्फ डॉक्टर दो लोगों के साथ उसके पास पहुंचा। अनुराग ने उससे कहा कि चलो रास्ता बताओ, जिसके बाद वह अनुराग के साथ रास्ता बताते हुए चलने लगा। उसके साथ लादी गांव के ही दो और बच्चों सकेंद्र पहारिया व उमेश सिंह को भी अनुराग ने रास्ता बताने के नाम पर साथ ले लिया। बच्चों को साथ लेकर अनुराग सबसे पहले हरातू गांव पहुंचा। वहां से भी एक बच्चे को साथ ले लिया, जिसका नाम महेंद्र सिंह खेरवार था। (सीताराम को छोड़ तीनों बच्चे सकेंद्र पहारिया, उमेश सिंह व महेंद्र सिंह बकोरिया में हुए कथित फर्जी मुठभेड़ में मारे गए।) हरातू से सभी नावाडीह व बेलवा गांव होते हुए औरंगा नदी को पार किया। वहां पर एक बोलेरो आया, जिसपर सभी सवार हो गए। इसके बाद सभी एक जगह छलका पर रुके। सीताराम ने बताया कि रास्ते में अनुराग सभी को कुछ दूरी पर रखकर खुद मोबाइल से किसी से बात भी कर रहा था। ऐसा उसने कई बार किया। रास्ते में कुछ और लोग भी अनुराग से मिले और साथ चल रहे थे, जिन्हें वह नहीं पहचानता। रात 9:30 बजे के करीब छलका के पास सभी बोलेरो से उतरे, तभी कुछ लोग आए, जिससे अनुराग ने हाथ मिलाया। कुछ चितकबरा ड्रेस पहने हुए थे। मुझे लगा कि यहां मुठभेड़ हो सकती है, इसलिए उसने वहां से भागना चाहा। लेकिन चितकबरा ड्रेस पहने एक व्यक्ति ने उसका हाथ पकड़ लिया, लेकिन वह हाथ छुड़ाकर अंधेरा का फायदा उठाते हुए भाग गया।

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