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भक्तों की आस्था का केंद्र है कालेश्वर मंदिर

भक्तों की आस्था का केंद्र है कालेश्वर मंदिर भास्कर न्यूज | जादूगोड़ा पोटका प्रखंड के आसनबनी स्टेशन से मात्र...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 11, 2018, 04:55 AM IST

भक्तों की आस्था का केंद्र है कालेश्वर मंदिर

भास्कर न्यूज | जादूगोड़ा

पोटका प्रखंड के आसनबनी स्टेशन से मात्र दो किलोमीटर दूर कोकदा गांव स्थित 220 साल पुराना कालेश्वर शिव मंदिर ग्रामीणों के आस्था का केंद्र है। मंदिर में महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। इसकी पहचान पूर्वी सिंहभूम के बाबाधाम के रूप में की जाती है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां कमेटी के सदस्यों द्वारा भजन कीर्तन और भक्तों के बीच खिचड़ी महाभोग का वितरण किया जाता है। इस मंदिर के बगल से ही गुर्रा नदी बहती है। मंदिर के चारों ओर प्राकृतिक छटा बहुत ही मनमोहक है। इस मंदिर में आने वाले भक्तों को बहुत ही शांति मिलती है। सच्चे मन से जो भी इस मंदिर में मन्नतें मांगता है। उसकी हर मुरादें पूरी होती हैं।

220 वर्ष पूर्व स्थापित इस शिव मंदिर की पूर्वी सिंहभूम के बाबाधाम मंदिर के रूप में है पहचान

मंदिर के विकास के लिए कालेश्वर विकास समिति का हुआ है गठन

धीरे धीरे मंदिर की चर्चा चारों तरफ होने लगी। श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी। यहां गुप्त गंगा भी है। जहां पानी हमेशा गर्म रहता है जो काफी लाभदायक है। मंदिर के विकास के लिए कालेश्वर विकास समिति का गठन किया गया। जिसके अध्यक्ष हरेंद्र नाथ कश्यप को बनाया गया। जिसके बाद मंदिर को भव्य रूप दिया गया। बगल में बाबा विनय दास के सहयोग से राधा रानी मंदिर बनाया गया है। सामुदायिक भवन भी बना है। अब इसे सरकार के सहयोग से पर्यटक स्थल बनाए जाने की मांग की जाएगी। जिससे यहां सुविधाओं का विकास हो सके। इस बार महाशिवरात्रि पर्व के लिए बड़े पैमाने पर तैयारी की जा रही है।

शिवलिंग पर अभी भी कुल्हाड़ी के निशान

इस मंदिर की स्थापना की कहानी बहुत ही रोचक है। ग्रामीण मिंटू भगत ने बताया कि लगभग 220 साल पहले यहां के दास परिवार की गाय अचानक दूध देना बंद कर दी थी। परिवार के सदस्यों ने ग्रामीणों के सहयोग से गाय को पीछे जंगल में छोड़ा तो देखा कि गाय एक जगह झाड़ी में बहुत देर तक खड़ी है। उसके बाद ग्रामीणों ने कुल्हाड़ी से आसपास सफाई करने लगे तो एक जगह बहुत तेज किसी चीज से टकराने की आवाज आई। लोगो ने देखा तो वहां शिवलिंग था। फिर ग्रामीण वहां पूजा पाठ करना शुरू कर दिए। धीरे-धीरे ग्रामीणों की आस्था बढ़ने लगी। ग्रामीणों ने आपसी सहयोग से यहां मंदिर का निर्माण करवाया। शिवलिंग पर अभी भी कुल्हाड़ी का निशान है। ग्रामीणों ने बताया कि सबसे पहले यहां पुजारी के रूप में रामलखन बाबा पूजा पाठ करते थे। उनके समाधि लेने के बाद विश्वनाथ पूरी बाबा द्वारा पूजा पाठ किया जाता था। फिर नित्यानंद बाबा द्वारा पूजा पाठ किया जाने लगा। अचानक बाबा कहीं चले गए। उसके बाद ग्रामीणों द्वारा ही श्रद्धापूर्वक पूजा पाठ किया जाने लगा।

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