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यहां की कोयला खदानों से निकला पानी पिएंगे ट्रेन पैसेंजर्स, रेलवे करेगा सप्लाई

करीब 8 करोड़ की लागत से बनने वाला यह प्लांट डेढ़ साल में शुरू हो जाएगा।

नितिन चौधरी | Last Modified - Dec 28, 2017, 04:07 AM IST

रांची.झारखंड में बंद पड़े कोयला खदानों के पानी काे अब पीने के उपयोग में लाया जाएगा। इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉरपोरेशन (IRCTC) और कोल इंडिया इससे ‘रेलनीर’ बनाएगा। इसके लिए IRCTC और कोल इंडिया के बीच समझौता हुआ है। सरकार से जमीन लेने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इसमें करीब छह महीने का समय लगेगा।

खदानों के पानी में ज्यादा मिनरल्स

- IRCTC के ग्रुप जनरल मैनेजर देवाशीष चंद्रा के मुताबिक, कोयले के खाली खदानों का पानी नैचुरल होता है। इसमें मिनरल्स भी ज्यादा होता है। इसे प्यूरीफाई करने में ज्यादा समस्या नहीं आएगी। IRCTC यह काम एजेंसी को देगी जो रेलनीर का प्लांट लगाएगी।

- उन्होंने बताया कि कोयला खदानों से हर साल लगभग 5700 लाख क्यूसेक पानी निकलता है। इनमें 2589 लाख क्यूसेक पानी कोल वाॅशरीज और कृषि के उपयोग में लाया जाता है।

- वहीं 1091 लाख क्यूसेक पानी खदान के आसपास के लोग उपयोग करते हैं। रेलवे में रेलनीर की डिमांड रोजाना 16 लाख बोतल है, लेकिन IRCTC केवल 37 फीसदी रेलनीर ही उपलब्ध करा पाता है। इसके लिए सात प्लांट हैँ, जहां से रोजाना 8.3 लाख लीटर पानी की सप्लाई की जा रही है।

रोजाना 72 हजार लीटर बोतलबंद पानी होगा सप्लाई

- देवाशीष चंद्रा ने बताया कि रामगढ़ के अरगरा कोयला खदान का चयन किया गया है, जहां रेलनीर का प्लांट लगेगा। करीब आठ करोड़ रुपए की लागत से बनने वाला यह प्लांट डेढ़ साल में शुरू हो जाएगा। इस प्लांट से रोजाना 72 हजार लीटर बोतलबंद पानी रेलवे स्टेशन पर सप्लाई की जाएगी।

- यहां से रेलनीर रांची, टाटा, बोकारो, आसनसोल, गया, धनबाद, राउरकेला, चक्रधरपुर, सिन्नी और बिहार-बंगाल के अन्य इलाकों में सप्लाई होगी। प्लांट शुरू होने से 100 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलेगा।

यहां की खौफनाक बंद खदानों में होती है बूंदों की तलाश

- झारखंड के ही धनबाद के धर्माबांध, देवघरा और बाबूडीह गांव की महिलाएं प्यास बुझाने के लिए बीसीसीएल की उस खदान में जान जोखिम में डालकर पानी लाने जाती हैं, जिसे खतरनाक मानकर 20 साल पहले बंद किया जा चुका है।

- जून 2016 में भास्कर टीम ने ये रिपोर्ट जारी की थी। जिसमें बताया था कि इस खदान में रिस रहे पानी को डेगची में भर कर लाना, मौत से खेलने जैसा है। यह पानी की तड़प है, जो हर दिन दर्जनों महिलाओं को खदान के मुहाने पर खड़ा कर देती है।

- एक बाल्टी पानी के लिए वे खतरनाक खदानों और पथरीली राहों की यात्रा पर रोज निकलती हैं। लकड़ी के खंभे के सहारे टिकी चट्‌टानों के नीचे बैठ-बैठ कर चलना अपने आप में चुनौती है।

- इस खदान की छत को लकड़ी के खंभों के सहारे रोक कर रखा गया है जो किसी बड़े हादसे को दावत देता दिखता है।

कोयले की गुफा में 60 फीट नीचे पानी

संकरे और उतार-चढ़ाव वाले रास्ते से होकर 60 फीट गहरी खदान में उतराना पड़ता है। मुहाने पर खड़े होकर अंधेरे में अंदर जाने का रास्ता खोजना होता है। रास्ते का अनुमान मिल जाए तो फिर घुटनों के बल बैठकर 500 मीटर तक सरकना होता है। अगर इन मुश्किलों को आपने झेल लिया, तो फिर आपको मिलेगा एक बाल्टी पानी।

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