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झारखंड की संक्रांति : आज 7 संस्कृतियों की संक्रांति, नई शुरुआत और संकल्प का दिन

रांची और खूंटी-तमाड़ इलाके में इसे बुरू मागे पर्व भी कहा जाता है। जबकि बुंडू-तमाड़ एरिया में टुसू पर्व कहते हैं।

Bhaskar News | Last Modified - Jan 14, 2018, 06:11 AM IST

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    रांची. देशभर में मकर संक्रांति अलग-अलग तरीके से मनाई जाती है। हर राज्य की पहचान भी अलग ही है। दिल्ली-पंजाब में लोहड़ी, यूपी-राजस्थान में पतंगबाजी, बिहार में दही चूड़ा...पर हमारा राज्य झारखंड ऐसा अनोखा है जहां ये सभी संस्कृतियां अाकर मिल जाती हैं। साथ ही संक्रांति पर इसकी अपनी अनोखी सांस्कृतिक विरासत भी सामने आती है।

    अगर हम पूरे राज्य पर नजर डालें तो विभिन्न क्षेत्रों में संक्रांति के अलग-अलग रूप नजर आते हैं। बस, एक झारखंडी संस्कृति है जो इनको एक तार में पिरोती है। नया साल, नई फसल के साथ झारखंड की संक्रांति में नई शुरुआत और नए संकल्प का संदेश होता है। इसके पीछे यहां की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति को कारण बताया गया। दरअसल, मुंडा समाज में प्रकृति-पूर्वजों की पूजा होती है, उरांव समाज में शादी-ब्याह का दौर शुरू होता है, खड़िया समाज तिलजांग पर पत्थलगड़ी करते हैं, हो लोग जात्राबोंगा में देवता को घर लाते हैं, संथाली ब्याहता बेटी का सम्मान करते हैं। बिखरते जीवन में परिवार और पूर्वजों का महत्व और जब पूरे देश में नारी को समान अधिकार की बात चल रही है तो हमारे यहां सदियों से नारी पुरुषों के समकक्ष ही नहीं बल्कि आगे हैं।

    तीन उत्सव- जीवन में उमंग, उत्साह और उत्कर्ष का

    टुसू

    - 113 फीट सबसे ऊंची चौड़ल

    - मोरहाबादी मैदान में कुरमाली भाषा परिषद का टुसू महोत्सव। अड़की का 113 फुट ऊंचा बांस और रंगीन कागज से बना चौड़ल आकर्षण रहा। बेटियां ने चौड़ल में टुसू की प्रतिमा स्थापित कर पूजा कीं।

    सांझी लोहड़ी

    -अग्नि प्रज्वलित कर परिक्रमा

    - सिखों का प्रमुख त्योहार। फसलाें की कटाई व बुआई का प्रतीक पर्व। पीपी कंपाउंड में महिला-युवतियां रात में खुशियां मनाती रहीं।

    प्रभु येसु बुलाहट

    - 4 धर्मबहनों का पवित्र आगमन

    - उर्सुलाइन धर्मसंघ की 4 धर्मबहनें 13 जनवरी को रांची पहुंची। उनकी याद में हर वर्ष आग जलाकर जश्न मनाया जाता है।

    कोल्हान में 7 व खोरठा में 4 दिनों की संक्रांति, खड़िया में धांगड़ की पैर पूजा

    कोल्हान में सात तो खोरठा क्षेत्र में चार दिन यह त्योहार मनाया जाता है। वहीं खड़िया समुदाय के लोग तो इस दिन धांगड़ (मजदूर) की पैर पूजा भी करते हैं। उनकी विदाई और आगमन के लिए यह दिन विशेष माना जाता है।


    रांची और खूंटी-तमाड़ इलाके में इसे बुरू मागे पर्व भी कहा जाता है। जबकि बुंडू-तमाड़ एरिया में टुसू पर्व कहते हैं। हो समुदाय में दिसंबर से फरवरी तक मागे पोरोब मनाया जाता है। इसमें जल, जंगल, जमीन की पूजा होती है। पूंजी (अन्न) पृथ्वी को अर्पित किया जाता है। उरांव समुदाय में नई फसल घर आने के बाद मकर संक्रांति से मेहमान नवाजी का दौर शुरू हो जाता है। शादी-ब्याह की बातें भी शुरू होती हंै।

    आगे की स्लाइड्स में पढ़ें बुरू मागे पर्व पर पहाड़ी देवता की पूजा और रातभर नाच-गाना...

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    मुंडा समाज : बुरू मागे पर्व पर पहाड़ी देवता की पूजा और रातभर नाच-गाना

    मुंडारी क्षेत्र के रांची और आसपास खूंटी-तमाड़ इलाके में बुरू पर्व का उल्लास दिसंबर-जनवरी में दिखता है। तमाड़ एरिया में जहां टुसू पर्व की धूम रहती है, वहीं खूंटी में मागे मनता है। मागे को ही बुरू पर्व कहते हैं। इसमें पहाड़ी देवता की आराधना होती है। प्रकृति की पूजा होती है। नई फसल घर में आती है। हर क्षेत्र में पाहन अलग-अलग दिन तय करते हैं, फिर पहाड़ी देवता की जयघोष करते हुए लोग घर आते हैं। लाल मुर्गा, तपान अर्पित किया जाता है। तरह-तरह का पीठा और अरसा बनता है। सकम लाद् (पत्ते में बना पीठा) खास होता है। यह पूजा सुबह ही होती है। शाम को सभी अपने घर में अदिन (पूजा स्थल) में पूर्वजों की आत्मा, कुल देवता की पूजा करते हैं। इसके बाद सभी अखरा में जाते हैं और मागे राग में मागे नृत्य होता है। युवक-युवतियां रातभर यह नृत्य करते हैं। मकर संक्रांति में सदानों की देखादेखी पकवान और तिल-पीठा बनाया जाता है। तमाड़ इलाके में भी मुंडा समाज के लोग टुसू मनाते हैं।


    जैसा इन्होंने बताया :

    - बीरेंद्र कुमार सोय, मुंडारी साहित्यकार
    - शांति नाग, शोधार्थी, जनजातीय विभाग, आरयू

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    उरांव समाज : नई फसल व खलिहान की पूजा कर पूर्वजों को अर्पित करते हैं

    मकर संक्रांति के दिन उरांव समाज के लोग अहले सुबह जागतेे हैं। तालाब-नदी में स्नान के बाद पूर्वजों की उपासना करते हैं। महिलाएं ढेंकी में चावल कूटकर लाती हैं। नए चावल से पीठा तैयार होता है। बिदगी (उड़द) दाल का पीठा खास होता है। गुड़ और सब्जियों के पीठे भी बनते हैं। सबसे खास होता है धुकरी पीठा, जिसे सखुआ के पत्ते में चावल-उड़द के पेस्ट को भरकर, उसे पानी में उबालकर बनाया जाता है। अरहर को आग में भूनकर लोग खाते हैं। पौष महीने से ही गोड़ा धान (जल्दी तैयार होने वाला धान) आने लगता है। माघ महीने कृषक फसल उपजाकर निश्चिंत हो जाते हैं। पहले खरमास में कुड़ुख भाषी लोग एक-दूसरे के घर भी आना-जाना नहीं करते। फसल घर में आ जाने के बाद मकर संक्रांति से मेहमानवाजी का दौर शुरू हो जाता है। शादी-ब्याह की बातें शुरू होती हैं। नवाखानी होता है, जिसमें नई फसल और खलिहान की पूजा होती है। पूर्वजों को अन्न अर्पित कर उन्हें धन्यवाद दिया जाता है। गुमला और कई उरांव बहुल इलाकों में मकर मेला भी लगता है।

    जैसा इन्होंने बताया :

    - भीखू तिर्की, रिटा. डिप्टी डायरेक्टर वेलफेयर, छोटानागपुर रीजन
    - महादेव टोप्पो, प्रसिद्ध साहित्यकार

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    खड़िया समाज : तिलजांग पर्व में पूर्वजों की पूजा, धांगड़ की होगी विदाई

    माघ महीने में खड़िया समाज में तिलजांग पर्व मनाया जाता है। इसमें सालभर में जितने लोगों की मृत्यु हुई है, उनकी हडि्डयों को भुइंहरी क्षेत्र (पुस्तैनी गांव) में गाड़ा जाता है। पाहन पूर्वजों की पूजा करते हैं और उनके नाम से पत्थलगड़ी करते हुए कहते हैं कि अब आपलोगों के परिवार में ये चले गए हैं, सबकी रक्षा कीजिए। अपने सभी गोत्र वालों को बुलाया जाता है। फिर भोज होता है। साथ ही माघ चौठ पर्व भी मनता है। इसमें चावल-गुड़ की ‘गुड़गुड़ा’ रोटी बनती है, कई तरह के पीठे बनते हैं। गुड़ा पीठा खास होता है। सुरगुजा (जटनी) का तेल तैयार किया जाता है, जिसमें गुड़गुड़ा रोटी छानी जाती है। खड़िया समाज में माघ में ही पुराने साल का अंत होता है और नया साल भी शुरू होता है। खड़िया एरिया में कई तरह का माघ जतरा (मेला) लगता है, जैसे बसिया (गुमला) के पास मोरेंग जतरा और कोलेबिरा (सिमडेगा) के पास कोनजोगा जतरा लगता है। जतरा के बाद नया साल शुरू होता है। इस दिन से ही धांगड़ (मजदूर) की भी विदाई होती थी। जिन्हें नया धांगड़ लाना होता है उनका प्रवेश भी इसी दिन होता है। धांगड़ का पैर धोकर उनका पैर और माथा में तेल मलकर स्वागत किया जाता है। परिवार में सदस्य की तरह धांगड़ की घर में प्रवेश होता है।

    जैसा इन्होंने बताया :

    - डॉ. रोज केरकेट्‌टा, साहित्यकार
    - चंद्रकिशोर केरकेट्‌टा, व्याख्याता, खड़िया

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    हो समाज : दिसंबर से फरवरी तक मागे पोरोब, पृथ्वी काे अन्न अर्पण

    हो समुदाय में दिसंबर से फरवरी तक मागे पोरोब मनाया जाता है। इसमें जल, जंगल, जमीन की पूजा होती है। पूंजी (अन्न) पृथ्वी को अर्पित किया जाता है। हो समुदाय मूल रूप से कृषक हैं। इस समय नई फसल घर आ जाती है। लोग घरों की सफाई, लिपाई-पुताई करते हैं। नए कपड़े पहनते हैं। ग्राम देवता की पूजा धूमधाम से की जाती है। पूरा गांव खुशियों से झूम उठता है। जगह-जगह मागे मेला लगता है। दूर-दूर से नाते-रिश्तेदार घर आते हैं। होलोंग पीठे खासतौर पर बनाए जाते हैं। कोल्हाण क्षेत्र में यह सात दिन तो पोराहाट में तीन दिनों तक मागे मनता है। पहले दिन घर की लिपाई-पुताई होती है। दूसरे दिन दिउरी (मुख्य पुजारी) उपवास अपने सहायकों के साथ जैरा या जैर स्थान (पूजा स्थान) में जाकर पूजा करते हैं। तीसरे दिन बड़ा पूजा होता है, जिसे जात्राबोंगा कहते हैं। पूजा के बाद गांव के युवक-युवतियां मांदर-नगाड़ा बजाते हुए नृत्य करते देवता को गांव लाते हैं। फिर रात पर नाच-गान होता है। इस अवसर पर मजाक के रिश्तों में जैसे भाभी, साली, दादी-नानी के साथ अश्लील शब्दों का आदान-प्रदान होता है। माना जाता है कि ऐसे करने से देवता खुश हो जाते हैं।


    जैसा इन्होंने बताया :

    - डॉ. इंदिरा बिरुआ, हो साहित्यकार
    - विजय गागराई पीएचडी शोधार्थी, जनजातीय विभाग, आरयू

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    खोरठा क्षेत्र : मेहमानों को मीट-धुसका खिलाना जरूरी होता है

    रांची पहाड़ से नीचे उतरते ही खोरठा भाषी इलाके शुरू हो जाते हैं, जो रामगढ़, हजारीबाग, बोकारो, गिरिडीह, धनबाद आदि में फैले हैं। यहां तिल सकरात चार दिनों का मनाया जाता है। 12 जनवरी को गुड़ी कूटा के दिन पीठा बनता है, जिसमें उड़द, चना, गुड़, तिल, खोवा, तिसी आदि भरे जाते हैं। चावल से ढक्कन डब्बा या पनरिसका भी बनाते हैं। 13 जनवरी को बावरी मनाया जाता है। इस दिन धुसका बनाया जाता है। कहीं-कहीं मीट भी बनता है। घर आए मेहमानों को मीट-धुसका खिलाना जरूरी माना जाता है। खोरठा क्षेत्र में कहा भी जाता है ‘पीठा या पाठा’ यही असली खाना है। 14 जनवरी को तिलकुट और तिल की लाई बनाकर पूजा के बाद दही-चूड़ा खाया जाता है। 15 को खिचड़ी बनाई जाती है। नया धान घर आता है। मानभूम इलाके (धनबाद-बोकारो आदि) में टुसू मेला भी लगता है। हर नदी के किनारे बावरी या टुसू मेला लगता है। टुसू का चौडल बनाकर पूजा की जाती है। लड़कियां संक्रांति के दूसरे दिन नदी में इसका विसर्जन करती हैं।

    जैसा इन्होंने बताया : -शिवनाथ प्रमाणिक ‘माणिक’, खोरठा साहित्यकार
    - डॉ. विनोद कुमार, विभागाध्यक्ष जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, रांची कॉलेज

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    संथाली समाज : ब्याहता बेटियों को मायके लाकर स्वागत

    संथाली समाज मकर संक्रांति के पहले बांदना पर्व मनाता है। इसे सोहराई भी कहते हैं। अलग-अलग इलाकों में अलग तिथि में बांदना सोहराई पर्व मनता है। 14 जनवरी को यह समाप्त हो जाता है। हर गांव में भाई अपनी बहनों को आमंत्रण देते हैं। उन्हें मायके बुलाया जाता है। ब्याहता बेटियों का स्वागत कर उन्हें तरह-तरह की चीजें खिलाई जाती हैं। बहनें ससुराल से पोचई (हड़िया) बनाकर लाती हैं। उससे पूजा होती है। गुड़, अन्न भेंट किया जाता है। घर-घर में पकवान बनते हैं, जिसमें अरसा-पुआ खास होता है। मवेशियों की भी पूजा होती है। फसल उगाने में मदद के लिए उनका धन्यवाद किया जाता है। गांव और मरंग बुरू की पूजा होती है। सकरात के दिन ‘मोकोरबुड़ी (संथाली देवी) की भी पूजा होती है। सुबह मुर्गे की बलि दरवाजे की चौखट पर दी जाती है। गांव के बुजुर्ग पाहन पूजा करते हैं। फिर गुड़, चूड़ा, तिल भगवान को चढ़ाकर लोग खाते हैं। हाकू यानी मछली और कटकोम यानी केंकड़ा इस दिन खाना शुभ और जरूरी माना जाता है। इस दिन सभी पत्तल-दोना में खाना खाते हैं। फिर जूठे पत्तल को घर के बाहर रख दिया जाता है। माना जाता है कि मोकोरबुड़ी आएगी और पत्तल-दोना गिनकर देखेंगी कि घर में कितने लोग हैं और सभी कुशल हैं या नहीं। दूसरे दिन आग तापकर लोग स्नान करते हैं। नए कपड़े पहनते हैं। निशानेबाजी ‘बेंजातुंई’ का आयोजन भी गांव में होता है।

    जैसा इन्होंने बताया : निर्मला पुतुल, साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त संथाली साहित्यकार
    - दुमनी माय मुर्मू, सहायक प्रोफेसर, संथाली

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