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इस जिले में थे दो लाख से ज्यादा कुपोषित बच्चे, ऐसे बचाई गई 48 की जान

पश्चिम सिंहभूम जिले के खूंटपानी प्रखंड में 33 हजार अति कुपोषित बच्चों को बचाने की अनूठी पहल।

Danik Bhaskar | Jan 22, 2018, 05:49 AM IST
बा बागान में इस तरह खुश रहते है बा बागान में इस तरह खुश रहते है

रांची. पश्चिम सिंहभूम का कोल्हान जंगल। 16 लाख की आबादी वाले इस जिले के दो लाख से अधिक कुपोषित बच्चों में से करीब 33 हजार अति कुपोषित बच्चे इसी इलाके में हैं। लेकिन, इन्हें नई जिंदगी देने के लिए न दवा की जरूरत पड़ रही है, न टीके की। बस, महिलाओं के एक अनूठे प्रयास से इन्हें हृष्ट-पुष्ठ बनाया जा रहा है। इसी का नतीजा है कि खूंटपानी जैसे प्रखंड में अति कुपोषित 800 बच्चों में से 48 बच्चों की जान बचा ली गई हैं। दरअसल, कोल्हान के खूंटपानी प्रखंड के करीब 20 गांवों में महिलाएं खुद मिल-बैठकर कुपोषित बच्चों को बचाने की पहल कर रही हैं। माध्यम बना है बा-बागान। यानी फूलों की क्यारी। बा-बागान को गांव की महिलाएं खुद बनाती हैं। सरकारी या किसी सक्रिय संस्था की मदद से कुपोषित बच्चों की शिनाख्त कराती हैं। फिर तीन साल तक के अति कुपोषित बच्चों का चयन किया जाता है। महिलाएं इन बच्चों को बा-बागान के नाम से बनाए कच्चे मकान में रोज सुबह पहुंचा देती हैं। यहां दो महिलाएं बच्चों की देखभाल करती हैं। उन्हें भोजन कराती हैं। हर सप्ताह बच्चों का वजन कराया जाता है। इसके सुखद परिणाम सामने आए हैं।

बा-बागान : देश के सबसे बीमार जिले पश्चिम सिंहभूम में कुपोषण के खिलाफ अलग-अलग कार्यक्रम चल रहे हैं। महिलाओं ने अपने स्तर पर पहल की। मुरहातु, नारांगाबेड़ा, कोकरोबारू, छोटा कुदाबेड़ा, टपकोचा और चुरगुई में आदिवासी समुदाय ने अपनी भाषा के अनुसार इसे बा-बागान का नाम दिया है।

डब्ल्यूएचओ ने विश्व में लागू किया पीएलए

चक्रधरपुर के एक डॉक्टर दंपती डॉ. प्रशांत त्रिपाठी व डॉ. मीरा नायर द्वारा 2008 में बनाए गए पार्टसेपटरी लर्न एंड एक्शन यानी सहभागी सीख सह कार्यान्वयन मॉड्यूल (पीएलए) से विश्व में हर साल 30 लाख नवजात शिशुओं की जान बचेगी। इस मॉड्यूल से भारत के कई आदिवासी इलाकों में शिशु मृत्यु दर में गिरावट आई है। दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में स्वास्थ्य विशेषज्ञों, संयुक्त राष्ट्र संघ के सचिव वान की मून, हिलेरी क्लिंटन और द. अफ्रीका के उपराष्ट्रपति ने इस मॉड्यूल को लॉन्च किया।

चार चरण में काम करता है मॉड‌्यूल

पहला : महिला समूह के साथ परिचय, समस्याओं का पहचान व प्राथमिकताएं

दूसरा : कारण व प्रभाव समझना और पोषण मुद्दे पर रणनीति तय करना।

तीसरा: रणनीतियों का क्रियान्वन शुरू करना।

चौथा : बैठक के बाद मूल्यांकन कार्य करना।

(रिपोर्ट- कोल्हान जंगल से ऋषिकेश सिंह देव)