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संवाद, गीत, कविता और संगीत बनकर खिले शब्द, दिग्गजों ने की शिरकत

रांची में पहली बार हुए दो दिनी टाटा स्टील झारखंड साहित्य उत्सव ने सर्दी में जरा ही सही भर दी तपिश।

Bhaskar News | Last Modified - Dec 03, 2017, 05:54 AM IST

  • संवाद, गीत, कविता और संगीत बनकर खिले शब्द, दिग्गजों ने की शिरकत

    रांची।कभी राजदीप सरदेसाई और राहुल देव की बेबाकी, तो कभी वरिष्ठ राजनीतिज्ञ जयराम नरेश की स्मृतियों से सियासत का मिलता पता। दोपहर सर्दियों की अगर पिंक फिल्म फेम कीर्ति कुल्हारी के संग गुलाबी हुई, तो शाम को मशहूर अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के काव्य पाठ ने शबनमी बनाया। कत्थई सांझ को उजाला बख्शने में गायक सौम्यजीत दास और सौरेंद्र मल्लिक के स्वरों ने रंग भरे। जिक्र, टाटा स्टील झारखंड नित्योत्सव के अंतिम दिन का है।

    - बात संवाद की हो या कविता की, गीत की हो या संगीत की, राजधानी के एक होटल में हुए दो दिनी इस नित्योत्सव में शब्द ही तो खिलखिलाए। जिसकी खुश्बुओं का असर रांचीवासियों पर दिनों तक रहेगा। शुरुआत हुई लोकतंत्र और क्रिकेट पर वरिष्ठ टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई की गुफ्तगु से।

    - दिलीप सरदेसाई जैसे दिग्गज क्रिकेटर के लफ्जों के गुगलीबाज बेटे ने सचिन तेंदुलकर को भगवान की देन कहा, तो रांची के शहजादे महेंद्र सिंह धौनी की भी प्रशंसा किए बिना नहीं रहे। लेकिन उन्हें इस बात का गिला है कि झारखंड की चर्चा टीवी चैनल तभी करते हैं, जब धौनी शहर में होते हैं या नक्सली हमले की खबर होती है।

    - यहां के रहनेवालों के दुख-दर्द उनके लिए खबर नहीं होती। ही कोई सकारात्मक चीजें झारखंड की उन्हें आकर्षित करती हैं। जबकि दिल्ली की छोटी घटना भी ब्रेकिंग न्यूज बन जाती है। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि पत्रकार को किसी पार्टी का कार्यकर्ता बन जाने से परहेज करना चाहिए। आजकल ऐसा खूब देखने को मिल रहा है।

    - राजनीति के कुछ लोग भी देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं। पिंक फिल्म में काम कर चुकीं कीर्ति कुल्हारी ने खुशी जाहिर की कि अब स्त्री प्रधान फिल्में देश में बनने लगी हैं, लोग उन्हें पसंद भी कर रहे हैं। उन्होंने स्त्री की आबरू के साथ खिलवाड़ की आती खबरों को संवेदना के साथ समझने की अपील की।

    शर्मिला टैगोर ने जब दिल से कहा, तालियाें से हुआ परिसर गुलजार

    - झारखंड के रेमिश कंडुलना समेत तीन कवियों के काव्य पाठ के बाद फिजा को नई ताजगी की तलाश थी, जो मशहूर सिने तारिका शर्मिला टैगोर के मंचासीन होते ही पूरी हो गई। अंतिम बेला का नाम था, कुछ दिल ने कहा।

    - सच ही जैसे ही शर्मिला ने माया एंजेलो की कविता टच को दिल से हौले-हौले सुनाया, परिसर तालियों से गुलजार हो गया। उन्होंने कश्मीरी-अमेरिकी कवि आगा शाहिद अली, एलिजाबेथ बारेट और डब्ल्यूएच ऑडन समेत दर्जनों नामी विश्व कवियों के नज्मों से रू-ब-रू कराया। उनके हर पाठ के बाद सौम्यजीत दास ने यादगार फिल्मी गीतों को अपनी मखमली आवाज में पिरोया। बोलीं, लोगों को अपने अंदर के जानवर को निकालना जरूरी है।

    इंदिरा विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण चाहती थीं : जयराम


    पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम नरेश ने कहा कि कई सालों तक देश की प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी पर्यावरण संरक्षण के साथ कल-कारखाने लगवाने का समर्थन करती थीं। प्रकृति से उनका अटूट लगाव रहा। वहीं, देश का विकास उनकी प्रतिबद्धता रही। उन्होंने कहा कि भारत को दूसरे से पर्यावरण संरक्षण सीखने की जरूरत नहीं है। वृहद अरण्यक उपनिषद में इसके संरक्षण की बातें हजारों साल पहले लिख दी गई थीं। मिट्टी की आवाज शीर्षक सत्र में युवा कवि अनुज लुगुन ने लेखिका डॉ. महुआ माजी और कवयित्री ज्योति लकड़ा से विमर्श किया।

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