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रावण की तपस्या का परिणाम है इस शिवलिंग की स्थापना, कहा जाता है चिताभूमि

यहां एक साथ शैव, शाक्त और वैष्णव के साथ बौद्ध साधना की परंपरा की शुरुआत हुई।

Dainik Bhaskar

Feb 14, 2018, 08:51 AM IST
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रांची. देवघर के बाबाधाम यानी वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग रावण की तपस्या का परिणाम है। शिवरात्रि पर दोनों का विवाह होता है। शिव और शक्ति एकसाथ हो जाते हैं। दोनों के मंदिरों के कलशों को एक बंधन से बांधा गया है। यह दर्शाता है कि शिव और शक्ति एक-दूसरे के साथ हैं। यह स्थान चिताभूमि भी है और भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग भी। हर दिन इस अद्भुत समागम को देखने हजारों भक्त आते हैं। हर साल सिर्फ सावन मास में ही करीब एक करोड़ भक्त पूरे देश से बाबाधाम के दर्शन करने आते हैं। इनमें वे कांवरियें भी शामिल होते हैं जो सुल्तानगंज (बिहार) के गंगाघाट से नंगे पैर जल लाकर बाबा वैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं।

9 सिर काटने के बाद 10वें पर शिव प्रकट हुए,रावण को दिया साथ चलने का वर

रावण ने हिमालय पर शिव के दर्शन के लिए घोर तपस्या की। जब वह थक गया तो उसने एक-एक कर अपने सिर काटकर शिवलिंग पर चढ़ाना शुरू किया। उसने नौ सिर चढ़ा दिए। जब वह अपना 10वां सिर काटकर चढ़ाने लगा, तब शिव प्रकट हो गए। रावण ने शिव से वर मांगा कि वे शिवलिंग के रूप में लंका चलें। भगवान शिव ने उसे यह वरदान तो दे दिया लेकिन शर्त लगाई कि तुम शिवलिंग ले जा सकते हो किंतु रास्ते में कहीं रख दोगे तो वह वहीं स्थापित हो जाएगा। रावण ने इसे स्वीकार कर लिया। रास्ते में उसे लघुशंका महसूस हुई। वह शिवलिंग को एक व्यक्ति के हाथ में थमाकर लघुशंका के लिए चल पड़ा। व्यक्ति शिवलिंग का भार सहन नहीं कर सका। उसने उसे वहीं रख दिया। जब रावण लौटकर आया तो देखा कि शिवलिंग जमीन पर है। उसने बहुत प्रयत्न किया लेकिन उठा नहीं सका। अंत में रावण ने शिवलिंग पर अपने अंगूठे का निशान बनाकर वहीं छोड़ लंका लौट गया। इसके बाद भगवान ब्रह्मा, विष्णु समेत सभी देवी-देवता यहां आए और शिवलिंग की पूजा की और उसे ज्योतिर्लिंग का सम्मान दिया।

तंत्र साहित्य और महाकाल संहिता में भी देवघर का नाम

पूर्वी भारत में देवघर को ही भारतीय इतिहास का केंद्र माना जाता है। यहां एक साथ शैव, शाक्त और वैष्णव के साथ बौद्ध साधना की परंपरा की शुरुआत हुई। वेदोत्तर साहित्य में वैद्यनाथ क्षेत्र का उल्लेख है। तांत्रिक और पौराणिक साहित्य में भी इसका वर्णन है। कुब्जिका तंत्र, ज्ञानार्णव तंत्र, तंत्रसार, काली तंत्र, शक्तिसंगम तंत्र और महाकाल संहिता में भी इस स्थान की प्रशस्ति है। वहीं, मंदिर के अभिलेख में 8वीं शताब्दी के लेख में गुप्तों के अंतिम शासक का उल्लेख है। नौंवी सदी में देवघर मंदिर के प्रसंग को विक्रमशिला विश्वविद्यालय के बटेश्वर लेख में भी वैद्यनाथ की चर्चा है।

पालों के शासन से समृद्ध होता रहा बाबाधाम

11वीं शताब्दी आते-आते पालों के शासन में देवघर समृद्ध होने लगा था। जबकि, मुगलकालीन शासन में देवघर स्वर्णयुग में पहुंच गया था। इस दौरान मुगल राजाओं ने इसका बखूबी ध्यान रखा। कहते हैं कि 1596 ई. में पूरन ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। शाहजहां के काल में इस क्षेत्र को झारखण्ड के नाम से संबोधित किया। पहले इस क्षेत्र का नाम दामिनेकोह (पहाड़ों से घिरा हुआ) था। 1787 ई. में अंग्रेज के पदाधिकारी हैसलरीज देवघर आए थे। 1855 ई में अंग्रेजों ने देवघर में दंडाधिकारी की नियुक्ति की। 1883 ई. में वैद्यनाथधाम रेलवे स्टेशन बना। अब तो यहां इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनाने की तैयारी हो रही है। ताकि धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिले।

दक्ष के यज्ञ की कथा बताती है

दक्ष प्रजापति की 64 कन्याएं थी। इनमें से एक थीं सती। दक्ष ने सती की शादी शिव से की थी। एक बार दक्ष ने यज्ञ किया। इसमें सती अौर शिव काे नहीं बुलाया। लेकिन सती बिना बुलाए ही वहां चली गईं। शिव ने कहा भी कि बिना बुलाए कहीं भी नहीं जाना चाहिए। लेकिन सती मानी नहीं। उस यज्ञ में भगवान शिव का अपमान किया गया। सती ने उस अपमान से नाराज होकर वहीं पर आत्मदाह कर लेती हैं। जब भगवान शिव को यह सूचना मिली तो वे वहां पहुंचे। सती के उस स्वरूप को देखकर शिव नाराज हो गए। तांडव करते हुए उनके अवशिष्ट शरीर को लेकर ब्रह्मांड में घूमने लगे। यह देखकर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से अवशिष्ट शरीर को 51 टुकड़ों में बांट दिया। सभी टुकड़े विभिन्न जगहों पर गिरे। उसी टुकड़ों में से सती का ह्दय वैद्यनाथ में गिरा। इसलिए इसे ह्दयापीठ भी कहा जाता है। बाद में यहीं सती का अंतिम संस्कार किया गया। इसलिए यह चिताभूमि (प्रज्वलिका निधाने) कहलाया। इन पुराणों में है चिताभूमि का जिक्र : पद्मपुराण, वायुपुराण, मत्स्यपुराण, भविष्यपुराण और कालिकापुराण में चिताभूमि में अवस्थित वैद्यनाथ का जिक्र है।

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