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बेल्जियम से आ रांची को बनाई कर्मभूमि, अंग्रेजी बोलने पर नाराज हो जाते थे बुल्के

यदि कोई उनके सामने अंग्रेजी बोलता था, तो वे नाराज हो जाते थे।

प्रो. वीपी शरण | Last Modified - Mar 12, 2018, 11:16 PM IST

  • बेल्जियम से आ रांची को बनाई कर्मभूमि, अंग्रेजी बोलने पर नाराज हो जाते थे बुल्के
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    फादर कामिल बुल्के। (फाइल फोटो)

    रांची.बेल्जियम की धरती पर पैदा होनेवाला कोई शख्स हिंदी को अपनी मां माने, भगवान राम को अपना आदर्श पुरुष.... यह सहसा विश्वास कर पाना बहुत आसान नहीं है। लेकिन हकीकत है फादर डॉ. कामिल बुल्के का। 17 अगस्त 1982 में एम्स दिल्ली में उनकी मौत के बाद दिल्ली में ही उन्हें दफनाया गया था। आज 36 साल बाद उनकी माटी वापस अपनी जमीं पर आ रही है।


    फादर बुल्के को नजदीक से देखने वाले बताते हैं ये

    फादर बुल्के को नजदीक से देखने, जानने, समझने वाले रांची यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोवीसी प्रो वीपी शरण तब संत जेवियर कॉलेज में लेक्चरर थे। प्रो. शरण बताते हैं कि फादर बुल्के को हिंदी बहुत प्यारी थी। वो बोलते थे कि हिंदी मेरी मां है। प्रो. शरण बताते हैं कि फादर बुल्के को अंग्रेजी बोलते उन्होंने कभी नहीं देखा। इसके विपरीत यदि कोई उनके सामने अंग्रेजी बोलता था, तो वे नाराज हो जाते थे। अव्वल तो जवाब ही नहीं देते थे, यदि देते भी थे, तो हिंदी में उसका जवाब देते थे।


    सिविल इंजीनियर की पढ़ाई कर आए थे इंडिया

    फादर बुल्के यूं तो सिविल इंजीनियर की पढ़ाई कर भारत आए थे, पर यहां आकर हिन्दी भाषा व साहित्य से उनको प्यार हो गया। उन्होंने रामकथा, उदभव और विकास विषय पर डिलीट की थिसिस लिखी थी, जिसे बाद में पुस्तक के रूप में छपवायी। इस पुस्तक में रामायण का बड़ा प्रैक्टिकल विवरण है, जो किसी के दिल को छू जाए। तुलसी दास पर लिखा उनका आर्टिकल मेरे तुलसी आज भी भगवान राम और तुलसी जी के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा का जीता-जागता प्रमाण है।


    पसंद नहीं था कोई उनकी प्रशंसा करे

    फादर बुल्के की कोई प्रशंसा करें, यह उनको पसंद नहीं था। पदमश्री सम्मान के बाद जेवियर्स कॉलेज में समारोह रखा गया। समारोह में अपनी तारीफ सुनने के बाद जब उनके संबोधन का समय आया, तो उन्होंने एक लाइन में यह कहकर अपना वक्तव्य समाप्त कर दिया कि खाना हमारा इंतजार कर रहा है, चलिए, चलकर खाना खाया जाए।


    उनकी लिखी डिक्शनरी आज भी स्टूडेंट्स के बीच फेमस

    फादर देखने में बिल्कुल संत जैसे लगते थे। चेहरे पर दिव्य आभा व ओज झलकता था। लगभग 6 फीट की हाइट वाले फादर हमेशा सफेद चोंगा पहनते थे। उनकी लंबी सफेद दाढी संतों जैसी दिखती थी। धीरे-धीरे चलना, धीरे-धीरे बोलना उनका स्वभाव था। वे मनरेसा हाऊस में रहते थे। वहां अक्सर वे बेत की कुर्सी पर बैठकर पढते रहते थे। अध्ययन के प्रति उनका गहरा लगाव था। उनकी लिखी हिन्दी-अंग्रेजी डिक्शनरी आज भी स्टूडेंट्स के बीच काफी लोकप्रिय है। अपने जीवन काल में हर साल फादर उसे रिवाइज करते थे। हर बार नए शब्दों को जोड़ते थे। इस काम में उनका साथ देते थे हिंदी के हेड डॉ. दिनेश्वर प्रसाद।

    1950 -1977 तक कॉलेज के हिंदी-संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे थे

    संत जेवियर कॉलेज के हिंदी-संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे डॉ. फादर कामिल बुल्के का अवशेष और पवित्र मिट्‌टी 13 मार्च को नई दिल्ली से झारखंड लाया जा रहा है। बिरसा मुंडा एयरपोर्ट पर दिन के 12.30 बजे अवशेष पहुंचेगा। इससे पहले रांची जेसुईट प्रोविंशियल सुपीरियर फादर डॉ. जोसेफ मरियानुस कुजूर के नेतृत्व में एल्युमिनी जेवेरियन और छात्रों का समूह एयरपोर्ट पहुंचेगा। यहां से फादर डॉ. कामिल बुल्के के अवशेष को सम्मान के साथ लेकर डॉ. कामिल बुल्के पथ स्थित मनरेसा हाउस पहुंचेगा। उक्त जानकारी संत जेवियर स्कूल डोरंडा के प्रिंसिपल फादर अजीत कुमार खेस ने दी।


    इधर, मनरेसा हाउस को डॉ. फादर कामिल बुल्के के अवशेष के आगमन पर 14 मार्च को होने वाले कार्यक्रम और समारोह को लेकर जेसुइट ब्रदर्स व फादर्स सजाने और संवारने में लगे हैं। यहां डॉ. फादर कामिल बुल्के की जीवनी और उससे संबंधित अन्य जानकारियों का फ्लेक्स तैयार किया गया है, जिन्हें लगाया जा रहा है।

    1909 में बेल्जियम में जन्मे, 1935 में भारत आए, रांची के लोग फादर कामिल को बाबा के नाम से पुकारते थे

    फादर अजीत कुमार खेस ने बताया कि फादर कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम के फ्लैंडस में एक सितंबर 1909 को हुआ था। अपने जीवन में ईश्वरीय बुलाहट को सुन कामिल बुल्के 1930 में येसु धर्मसमाज में प्रवेश किए। 1932 में जर्मनी के जेसुईट कॉलेज में दर्शनशास्त्र मेंं एमए किया। 1935 में वह भारत आए। 1939 में कर्सियोंग कॉलेज से उन्होंने कर्सियोंग से ईशशास्त्र किया। 1941 में पवित्र पुरोहिताभिषेक संस्कार लिया। 1947 में एमए और डी फिल इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया। 1951 में उन्होंने भारत की नागरिकता प्राप्त की। 1950-1977 तक 27 साल संत जेवियर कॉलेज के हिंदी-संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे। 1955 में उन्होंने ए टेक्निकल इंग्लिश-हिंदी ग्लोसरी प्रकाशन किया। 1968 में लोकप्रिय कोश अंग्रेजी-हिंदी तैयार किया। 1973 में बेल्जियम की राय अकादमी के सदस्य बने, 1974 में उनकी हिंदी सेवाओं के लिए पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 17 अगस्त 1982 को फादर बुल्के का निधन हो गया। 13 मार्च 2018 को उनके पार्थिव शरीर का अवशेष दिल्ली से रांची लाया जा रहा है। 14 अप्रैल को संत जेवियर काॅलेज परिसर में पवित्र मिस्सा आराधना होगी। इसके बाद संत जेवियर कॉलेज परिसर में उनका पवित्र पार्थिव अवशेष और पवित्र मिट्‌टी को स्थापित किया जाएगा।

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    संत जेवियर कॉलेज में तैयारी करते जेसुईट फादर्स व ब्रदस।
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Web Title: Padma Bhushan Father Kamil Bulke
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