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18 जनवरी 1941 को पठान के वेश में नेताजी पहुंचे यहां, कहा था मुझे पेशावर जाना है

नेताजी सुभाषचंद्र बाेस काे अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर नजरबंद कर लिया था। नेताजी ने वेश बदल कर भागने की योजना बनाई।

bhaskar news | Last Modified - Jan 23, 2018, 08:40 AM IST

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    इसी घर से नेताजी पेशावर जाने के लिए निकले थे।

    धनबाद.18 जनवरी 1941...। ठंड अपने शबाब पर थी। मेरे दादा एसएम अब्दुल्ला (मरहूम) अपने गोमो के इसी मकान (अब नए तरीके से बन गया है) के पहले कमरे में बैठे थे। हवाएं सर्द थी, इसलिए खिड़की और दरवाजे दोनों ही बंद थे। रात के 8 बजे होंगे...। दरवाजे पर किसी ने आवाज लगाई... वकील साहब (दादा वकील थे) घर पर हैं। दादा ने सवाल के बदले सवाल किया... कौन है? एक धीमी आवाज आयी... मैं। दादा मानो उस आवाज को पहचाने थे। उन्होंने बिना समय गुजारे दरवाजा खोल दिया। दरवाजे पर एक पठान खड़ा था।

    दादा ने उनका हाथ पकड़ा और घर के अंदर ले आएं। पठान का वेश में आने वाला शख्स नेताजी थे। दादा ने पूछा... आप यहां? इस वेश में? वह भी अकेला...? नेताजी ने एक सांस में उनके सभी सवालों का जवाब दिया। कहा...वकील साहब यहां एक खास मकसद से आयी हूं। वेश इसलिए बदला, ताकि पहचाना न जा सकूं। अकेला नहीं था... शिशिर बोस साथ में था। अपनी कार (बेबी आस्टिन कार संख्या बीएलए 7169, जो अभी कोलकाता के म्युजियम में रखी हुई है) से मुझे रेलवे गेट तक छोड़ गया है। वहां से पैदल आ रहा हूं। दादा के मन में कई सवाल थे... इससे पहले वे नेताजी से पूछते, उन्होंने दादा जी को एक रेलवे टिकट की व्यवस्था तत्काल करने को कहा। नेताजी ने दादा जी से कहा कि उन्हें पेशावर है। वह भी आज ही...। कौन सी ट्रेन मिलेगी। टिकट की व्यवस्था करो। नेताजी जी के कहने पर दादा जी टिकट की व्यवस्था में जुट गए। रात 11 बजे होंगे... दादा जी ने पास के ही दर्जी अमीन को घर पर बुलाया। अमीन से दादा जी ने कहा कि वे इन्हें (नेताजी) अपने साथ गोमो स्टेशन ले जाए। टिकट कटवा कर रात वाली हावड़ा-पेशावर मेल 63 अप (अभी की कालका एक्सप्रेस) में बैठा दे। दादा के कहने पर अमीन नेताजी को अपने साथ लेकर इंजन-बोगी लोडिंग यार्ड (अभी लोको सेट) के रास्ते स्टेशन पहुंचा। नेताजी को टिकट के साथ पेशावर एक्सप्रेस में बैठा कर अमीन लौट आया।

    (कहानी एसएम अब्दुल्ला के पोते एसएम हसीबुल्ला से बातचीत पर आधारित)

    सत्यव्रत की यात्रा गाथा में भी इसका जिक्र

    नेताजी सुभाषचंद्र बाेस काे अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर नजरबंद कर लिया था। नेताजी ने वेश बदल कर भागने की योजना बनाई। उनकी इस रणनीति में उनके मित्र सत्यव्रत बनर्जी साथ थे। सत्यव्रत बनर्जी ने इसे महाभिनिष्क्रमण यात्रा का नाम दिया था। बताया जाता है कि नेताजी 18 जनवरी 1941 को दिन के 10 बजे के करीब धनबाद पहुंच गए थे। लापता होने से पहले उनके गोमो में होने का अंतिम प्रमाण मिलता है। यहां उन्होंने रात 8 बजे से रात 12 बजे तक का समय गुजारा था। साल 1986 में धनबाद आए नेताजी के भतीजे शिशिर बोस ने भी सुभाषचंद्र बोस की गोमो यात्रा को अंतिम दृश्य यात्रा बतायी थी।

    रांची के लोगों ने नेताजी से जुड़ी चीजें रखी हैं संभाल

    रांची के फणींद्रनाथ आयकत के यहां नेताजी पांच दिनों तक रुके थे। 1939 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस रांची आए थे। रामगढ़ में कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में वे अध्यक्ष पद के उम्मीदवार थे। फणींद्रनाथ के पोते विष्णु आयकत ने बताया कि सम्मेलन के चार-पांच दिनों पहले ही वे रांची पहुंच गए थे और लालपुर में हमारे घर ठहरे थे। कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए हुए चुनाव में उन्होंने सीतारमैया को 203 मतों से हराकर चुनाव जीता था। उनकी यादों को हमने संभालकर रखा है। नेताजी जिस कुर्सी पर बैठे, जिस मेज पर उन्होंने काम किया सभी जस के तस हैं। नेताजी की रांची प्रवास की तस्वीर संभालकर रखी हुई है। इसके अलावा मुरली मनोहर बोस, डॉ. जोदु गोपाल मुखर्जी ने भी इस यात्रा को यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। डॉ. पीएन चटर्जी की 1932 मॉडल की क्लासिक फिएट रॉल्स कनवर्टिबल कार में वे घूमे भी थे।

    कालिकापुर में आदिवासियों ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को दिए थे 3 प्रशस्ति पत्र


    साल 1939...। जमशेदपुर से करीब 30 किमी दूर पोटका के कालिकापुर में रहकर नेताजी ने लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरित किया था। यहां कांग्रेस के तत्कालीन पोटका अध्यक्ष कमल चंद्र भगत के घर में रहकर सिंहभूम (अब कोल्हान) के विभिन्न हिस्से में लोगों को संगठित करने के लिए सभाएं की थीं।


    नेताजी के आह्वान के बाद पोटका और आसपास इलाके में स्वतंत्रता आंदोलन तेज हुआ। उनको घाटशिला, बहरागोड़ा और पोटका में आदिवासी समाज की ओर से तीन प्रशस्ति पत्र दिए गए थे। प्रशस्ति पत्र मिलने पर नेताजी उत्साहित थे। उन्होंने स्थानीय लोगों के प्रति आभार जताया था। कहा था... वे फिर आएंगे तो प्रशस्ति पत्र लेकर जाएंगे। नेताजी के तीनों प्रशस्ति पत्र कालिकापुर में कमल चंद्र के घर में आज भी रखे हुए हैं।

    साल 1940 : चास में किरण दत्ता की चाय की दुकान पर सुभाष चंद्र बोस ने पी थी चाय

    वर्ष 1940 में कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन के समानांतर नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने रामगढ़ में अधिवेशन किया था। इसमें शामिल होने के लिए नेताजी बोकारो के चास होते हुए गए थे। चास में रानी अहिल्या बाई रोड में किरण दत्ता की चाय की दुकान में रुककर नेताजी ने चाय पी थी। किरण दत्ता के 67 वर्षीय भतीजे किरीटी भूषण दत्ता बताते हैं कि नेताजी अपनी गाड़ी से आए थे। चाय दुकान देखकर यहां रुके। चाय पिए। उस समय का रिवाज था कि चाय पीने के बाद कप में पानी डालकर धोकर रखना पड़ता था। नेताजी को भी किरण दत्ता ने कप धोकर रखने के लिए कहा। इस पर नेताजी के साथ जो लोग थे, उन्होंने टोका कि आप इन्हें पहचानते नहीं हैं। लेकिन नेताजी मुस्कुराते हुए कप धोकर रख दिए। बाद जब उनका परिचय बताया गया तो पूरे चास के लोग वहां इकट्ठा हो गए।

    इनपुट : धनबाद से अशोक/अजय, जमशेदपुर से चंद्रशेखर/अश्विनी और बोकारो से राजेश सिंह देव।

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    एसएम अब्दुल्ला के पोते एसएम हसीबुल्ला। (फाइल फोटो)
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    इसी कार से नेताजी सुभाष चंद्र बोस गोमो आए थे।
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    गोमो में स्टेशन पर लगी नेताजी की प्रतिमा।
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    फणींद्रनाथ आयकत के घर पर उनकी फैमिली के साथ सुभाष चंद्र बोस।
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    इसी फिएट पर नेताजी रामगढ़ गए थे।
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    फणींद्रनाथ आयकत के घर इसी कुर्सी पर बैठे थे सुभाष चंद्र बोस।
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    5 दिसंबर 1939 को बैठक को संबोधित करते नेताजी।
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