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ये मौसम की कैसी बयार, मेरी पायल हुई गंवार, बहक गई फागुन में...

सांसों में चंदन और मन में पलाश की दहकता से रांची प्रेस क्लब गुलजार रहा। खोए रहे मेजबान पत्रकार, तो मेहमान कवि-शायर...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 04, 2018, 03:15 AM IST

ये मौसम की कैसी बयार, मेरी पायल हुई गंवार, बहक गई फागुन में...
सांसों में चंदन और मन में पलाश की दहकता से रांची प्रेस क्लब गुलजार रहा। खोए रहे मेजबान पत्रकार, तो मेहमान कवि-शायर और कलाकार। मंजरों की गंध की मादकता कभी गीत, कभी कविता के मार्फत लोगों को होलियाना मिजाज में लाती रही। कवि सम्मेलन में हास्य की फुहार संग महफिल सराबोर हुई तो गीत-संगीत और देर रात तक फगुआ के राग ने थिरकने को विवश किया। चेतना झा का अंदाज देखिए- मेरी पायल हुई गंवार, बहक गई फागुन में, ये मौसम की कैसी बयार, बहक गई फागुन में। गुरुवार को सिटी के पॉपुलर कवि-कवयित्रियां अपनी फागुनी कविताओं से रांची प्रेस क्लब को खुशनुमा बनाए रखा।

रश्मि शर्मा की शाब्दिक रश्मियां कुछ इस तरह झिलमिलाईं- गुलाबी गाल पर, लाल गुलाल, लजाय गई गोरी, भीगी चुनरिया, दहका अंचरा बौराय गई होरी। इधर, सीमा चंद्रिका तिवारी का गीत मधुर स्वर में गुंजायमान हुआ- न रहे मलाल पले कोई न सवाल, हाल बिना पूछे मेरा कभी यूं ही जान जाइये। मुक्ति शाहदेव की पंक्तियों ने उजागर किया- अलसाई-सी भोर हो, तपती हुई दोपहरी मदमाती सी शाम लगे, और रात बड़ी रंगीली, गांव भर की नार लगे। इसके अलावा कलावंती सिंह, नीरज नीर, प्रणव प्रियदर्शी, सत्या कीर्ति, सूरज श्रीवास्तव और डॉली कुजारा टॉक ने भी कविताएं पढ़ीं।

Kavi Sammelan

डफली की थपक को तालियों का मिला ताल : रेनु त्रिवेदी मिश्रा ने निमंत्रण देते हुए कहा-खेलो रंग-गुलाल के आई होली है, नीले-पीले लाल के आई होली है। डफली की थपक को तालियों का ताल मिलता रहा। दोपहर से देर शाम तक लोग कविताओं में डूबते-उतरारे रहे।

दिल के खिलने का त्योहार

गिरा दो नफरत की दीवार

दिल के खिलने का त्योहार। -वीना श्रीवास्तव

पति ने बोला: टैक्स देने का जब हो महीना

अंगूठी पर मांगे जब आप नगीना

ऊपर से हमारी वर्षगांठ का जब महीना

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-सारिका भूषण

गांधीजी ने देश को एक शब्द दिया चरखा/

उसी का मर्म अपना लिया/जो उनसे बना चर लिये/जो मुझसे बना खा लिया।

-प्रवीण परिमल

ओ देखो मोहे सताए बैरी

भिगा दी चुनरी-भिगा दी चुनरी।

-डॉ. राजश्री जयंती

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