रांची

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मौलाना कारी हाजी अलीमुद्दीन कासमी किए गए सुपुर्द-ए-खाक

अरबी कहावत है, मौतुल आलिम, मौतुल आलम यानी किसी आलिम की मौत दुनिया की मौत के समान है। यह नजारा जुमेरात (गुरुवार)जैसे...

Dainik Bhaskar

Feb 02, 2018, 03:25 AM IST
अरबी कहावत है, मौतुल आलिम, मौतुल आलम यानी किसी आलिम की मौत दुनिया की मौत के समान है। यह नजारा जुमेरात (गुरुवार)जैसे पाक दिन रांची में दिखा। शहर की सबसे बड़ी मस्जिद मदीना मस्जिद की बुनियाद रखने वाले मशहूर इस्लामी आलिम (विद्वान) मौलाना क़ारी हाजी अलीमुद्दीन क़ासमी के जनाजे को कांधा देने के लिए मानो प्रतियोगिता हो। तिल-तिल भीड़ के बीच हर कोई एक बार ही सही डोला के डंडे को छू लेना चाहता था। हालांकि चाहने वालों के लिए डोला में बांस बांध दिए गए थे, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग सवाब कमा सकें। हर लब खामोश, हर आंख नम। जब लब खुलते, तो मरहूम (दिवंगत) आलिम की इंसानियत रोशन होती। वहीं आंख खुलती, तो दर्द बन आंसू लुढ़क आते। सुबह से ही हिंदपीढ़ी मदीना मस्जिद के पास स्थित मौलाना अलीमुद्दीन के घर पर रांची समेत दूसरे जिलों से भी सदमे से भरे लोग पहुंचने लगे थे। अलग-अलग घरों में उनके रहने के इंतजाम किए गए थे।

ला इलाहा इल्लल्लाह...की सदा के बीच उनका जनाजा उठा। महात्मा गांधी मार्ग होते हुए जनाजा जब अपर बाजार पहुंचा, तो लोगों की अंतिम कतार अलबर्ट एक्का चौक पर थी। मरहूम के बेटे क़ारी सुहैब अहमद ने नमाज अदा कराई। वहीं रातू रोड कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। जनाजे में परिवार के मौलाना सिद्दीक़ मज़हरी, सलमान अख़्तर, मौलाना रिज़वान अहमद क़ासमी, मौलाना अंसरुल्लाह क़ासमी, मौलाना शहाबुद्दीन, मौलाना हारिस जैदी, डॉ. अब्दुल जमील नदवी, मौलाना गुलजार नसीम थे, तो मरहूम के गांव के सूरज साहू, लक्ष्मण सरना, कुलदीन केरकेट्टा, पूर्व मंत्री बंधु तिर्की, पूर्व डिप्टी मेयर अजयनाथ शाहदेव, राजेश गुप्ता भी थे।

हर कांधा जनाजे के लिए था उतावला

दैिनक भास्कर, रांची

शुक्रवार, 02 फरवरी, 2018

तालीम को बढ़ावा के लिए खुलवाए थे 17 मदरसे

मजलिस-ए-मुशावरात के खुर्शीद हसन रूमी ने बताया कि मौलाना अलीमुद्दीन शिक्षा पर बहुत जोर देते थे। कहते थे कि हर तरह का अंधेरा तालीम से ही छंटता है। रांची आसपास के ग्रामीण इलाकों में करीब 17 मदरसे खुलवाने में उनका बड़ा योगदान रहा। मुहर्रम कमेटी के अकीलुर्रहमा ने मौलाना अलीमुद्दीन के हंसमुख मिजाजी को याद किया। बोले, बैठक और सफर दोनों में उनके साथ अच्छा लगता था।

कारी हाजी अलीमुद्दीन कासमी

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