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डराने वाली सत्ता आखिर प्रेम के आगे हो जाती है नत्मस्तक

ताशेर देश : रवींद्रनाथ टैगोर की रचना का मंचन मोरहाबादी स्थित आर्यभट्‌ट सभागार में किया गया, दूसरे दिन कलाकारों ने...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 01, 2018, 03:45 AM IST

डराने वाली सत्ता आखिर प्रेम के आगे हो जाती है नत्मस्तक
ताशेर देश : रवींद्रनाथ टैगोर की रचना का मंचन मोरहाबादी स्थित आर्यभट्‌ट सभागार में किया गया, दूसरे दिन कलाकारों ने शानदार ढंग से नृत्य किया, लेकिन अभिनय में थोड़ी कमी नजर आई। बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद रहे।

कल्चरल रिपोर्टर | रांची

नदी की लहरों की उतार-चढ़ाव हो या ताश के पत्तों को आगे-पीछे चिपकाए खड़ाऊं शैली का नृत्य, कलाकारों ने मन मोह लिया। लेकिन नेपथ्य से गूंजते संवाद पर उनका होंठ हिलाना और चेहरे की सपाट बयानी उनके अभिनय को कमजोर करती रही। चर्चा रवींद्रनाथ टैगोर के चर्चित और हजारों बार विश्वभर में मंचित हो चुके नाटक ‘ताशेर देश’ के रांची में दो दिन तक हुए मंचन की है। इसमें रवींद्र संगीत का स्पर्श सभागार को संतुष्ट करता ही रहा, वहीं कहीं-कहीं फ्यूजन भी शिखर को पहुंचा। रांची विश्वविद्यालय के परफॉर्मिंग एंड फाइन आर्ट डिपार्टमेंट के दो दर्ज कलाकारों ने इसे संभव बनाया। परिकल्पना और निर्देशन गार्गी मलकानी का था।

Dance Drama

महल में बंद राजकुमार भरना चाहता है उड़ान

कहानी एक सौदागर और राजकुमार के बीच बातचीत से शुरू होती है। राजकुमार महल की बंद जिंदगी से उकता चुका है। उसे दूर खेतों की लहलहाती फसल, जंगल में कूकती कोयल, पहाड़ों का ऊंचा मस्तक और झरनों के गीत बार-बार पुकारते हैं। एक दिन दोनों पर्यटन को निकलते हैं कि नाव के उलट जाने के कारण दूसरे देश पहुंच जाते हैं। जहां हर जगह, अनीति, अत्याचार, कुरीतियां और विद्रूपताएं अट्टहास करती हैं। जिसे ताश के पत्तों से चरित्र वाले अपनी-अपनी चालों से संचालित करना चाहते हैं। इन दो विदेशी को न सत्ता स्वीकार करती है, और न ही जनता, लेकिन राजकुमार और सौदागर के प्रेम-व्यवहार के आगे सत्ता नत्मस्तक हो जाती है। अंजान-सा दो चेहरा उस देश का बिल्कुल अपना-सा हो जाता है। कुछ संवाद स्मरण में कैद हो जाते हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर के लिखे नाटक के मंचन में कलाकारों के नृत्य ने मोहा मन

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Web Title: डराने वाली सत्ता आखिर प्रेम के आगे हो जाती है नत्मस्तक
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