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बै नी आ ह पी- नाला

भाई जी, खोज और खाज दोनोें एक ही मर्ज के काज हैं। आज मैं भी इस काज में लगा हूं, और ऐसा लगा हूं, कि बस लगा हूं। बात यह है कि...

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 03:45 AM IST
भाई जी, खोज और खाज दोनोें एक ही मर्ज के काज हैं। आज मैं भी इस काज में लगा हूं, और ऐसा लगा हूं, कि बस लगा हूं। बात यह है कि अपने संपादक जी ने इस साल मेरे जैसे निठल्ले जीव को भी रंग अभियान में जोड़ लिया है। पहले तो मुझे लगा कि होली की पूर्व संध्या पर वे मेरे साथ ठिठोली कर रहे हैं। फिर जब उनका गश्ती फोन मिला तो उनका इरादा मुझ पर खुला। काले जादू का खेल जब से बैंकों के रंग महल में करतब दिखाने लग गया और सबकी नजरों में चढ़ गया तो शायद संपादक जी का ब्लड प्रेशर भी बढ़ गया। उन्होंने बीड़ा उठाया है कि अब रंगों की चौपाल सेे बाहर हुआ जाए और पब्लिक को न्यू इंडिया के राज-रंग की खोज में लगाया जाए।

लिहाजा अपनी सांस सांसत में अटकती महसूस हो रही है। कि जैसे होली सुलभ सपनों के हिंडोले पर झूलते हुए आदमी को ब्लैकहोल के दरवाजे पर धरना देने को कहा जा रहा हो। अब यह मामला मेरे लिए जागरूक नागरिक की सनद के छिन जाने जैसा हो गया है। इसलिए दमदार प्रदर्शन के लिए खुद को तैयार कर रहा हूं। भाई जी, ऐसा है कि मैंने संपादकों के रंग-रोगन देखे हैं, उनके रोब-दाब की चहल-पहल भी देखी है, और उस महफिल में अच्छे खासे मर्दों के रंग उड़ते देख दंग रह गया हूं। इसलिए आपसे कह रहा हूं कि मामला पंेचीदा और संगीन है। ऊपर की बात है साब, ऊपर की। बेशी चूं-चपड़ की तो आप गए काम से। संपादक जी भी कोई कच्ची गोटी नहीं खेलने वाले। आसमान का रंग देख कर मौसम की टोह लेते हैं और सुधी किसान की तरह अपने बैलों को मिशन में जोत देते हैं।

साब, मैं नहीं मानता कि होली फगुनाहट के सुर में मनाई जाती है। अपने लोकतंत्र में कादो-माटी का खेल तो बारहों महीने चलता ही रहता है। कभी रंग, कभी पानी, बेमौसम बरसात है जिंदगानी। और जब चित्त पर देशप्रेम का नशा चढ़ जाए तो फिर क्या कहना! अब तो कहना पड़ेगा कि होली आती नहीं, लाई जाती है। रंग हर्बल हो या न हो, उसे जमाना पड़ता है। फिर आप जब चाहें, गा सकते हैं-हर्रे लगे न फिटकिरी और रंग चोखा आय। भले इस उद्योग में धोखा खोना या देना पड़ जाए। भाई जी, एक दफा की बात है, जरा गौर फरमाइए, मेरे छापाखाने से छप कर एक पत्रिका का होली विशेषांक जब बाजार में आया, तब तक लोगबाग दशहरे की खरीदारी में लगे थे। वैसे हमारी कलमकार बिरादरी वक्त की नजाकत को खूब पहचानती है और महंगाई के मौसम में भी ऊपर वालों की शरारत का बुरा नही मानती। वैसे, यह काम थोड़े जोखिम का है, लेकिन कौम की तरक्की के नाम पर मैं जुझारु हो रहा हूं। कहते हैं, भंग प्रेमी से रंग प्रेमी ज्यादा खतरनाक जीव होते हैं। और ऐसे लोगों की गिरफ्त में पड़ कर बेदाग निकल जाना कोई हंसी-ठट्ठा नहीं है। आपबीती की एक ऐसी सुघटना मुझे अब तक हूबहू याद है। आप जानते ही होंगे कि होली और साहित्य सृजन में चूहे और बिल्ली के खेल जैसा रिश्ता है। बिना दृष्टांत कोई कथन सिद्ध नहीं होता न, लिहाजा पेश है भोगी हुई एक आपबीती। वह मेरे वैवाहिक वर्ष का दूसरा संधि काल था। मैं सोत्साह ‘आज फागुन बना पाहुन’ की तर्ज पर अपनी ससुराल पहुंच गया था। उन दिनों मेरी साहित्यसेवा चरम पर स्थित थी और ‘काव्यशास्त्र विनोदेन कालोगच्छति धीमताम्’ में मेरी सहज आस्था भी थी। अस्तु मैं रंगोत्सव की दोपहरी में ससुराली छत पर एकांत में अपनी कविताओं की नई नवेली नोटबुक के साथ रचनाशील होने की चेष्टा कर रहा था कि अचानक भूकंप जैसी धमाचौकड़ी से मेरी कल्पना हठात छू-मंतर हो गई।

बात यह थी कि मेरी सालियां अपनी सहेलियों की टीम के साथ मेरी खोज में निकली हुई थीं और छत पर मुझे अकेला और निहत्था देख कर किलकारियों से भर उठी थीं। सम्हलने से पहले ही मैं रंगों के धुआंधार फव्वारे के नीचे आ चुका था। उस दिन कविता की नोटबुक के साथ मैं बै नी आ ह पी - ना ला में शिखर से तराई तक निःशब्द डूब गया था। आज भी उस हमले की याद से मैं घबरा जाता हूं। मुझे छींटदार बनाने के बाद एक साली ने मेरी कलम मुझस छीन ली और दूसरी ने स्याही से मेरी स्वच्छ मुखछवि का सधुक्कड़ी पोर्टेट तैयार किया। भाई जी, उसी दिन से मैं सतरंगी छतरियों से खार खाए बैठा हूं। साब, साफ बात यह है कि घर चाहे अपने पिता का हो या प|ी के पिता का, मैं चौकस रहता हूं कि होली की हुड़दंग में हरगिज ना फंसूं। परम सत्य यह है कि आज तक होली के हुल्लड़ और हंगामे में हाजिर होने का हौसला मैं हासिल नहीं कर सका। फिलहाल मैं आठवें रंग की खोज के मिशन पर मुस्तैद हूं और अगले रंगपर्व तक अपनी रपट आपकी अदालत में पेश कर ही दम लूंगा।

डॉ. विद्याभूषण, जाने-माने कथाकार, उपन्यासकार, रांची

व्यंग्य

आजादी के बाद स्कूलों में जाने वाली पीढ़ी के लिए रंगों की सरहद सात पर सिमट जाती थी। यादों के हैंगर में टिकाने का फार्मूला था बैनीआहपीनाला। यानी बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी, लाल।...वह सात जन्मों, सात फेरों, सात सुरों में गुलज़ार दौर था।