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तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया

अशोक प्रियदर्शी, प्रसिद्ध व्यंग्यकार, रांची होली का नाम सुनते ही हमारे मानस पटल पर जीवन के कई रंग उभरने लगते हैं।...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 01, 2018, 03:45 AM IST

तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया
अशोक प्रियदर्शी, प्रसिद्ध व्यंग्यकार, रांची

होली का नाम सुनते ही हमारे मानस पटल पर जीवन के कई रंग उभरने लगते हैं। एक चलचित्र की भांति सारे हुड़दंग, सारी मस्ती आप ही चलने लगती हैं। इस तरह से एक प्यारी-सी खुमारी उत्सव का रूप ले लेती है। होली एक ऐसा त्योहार है, जो जाति और उम्र के सारे बंधन तोड़ कर अपने साथ सिर्फ खुशियों का रंग लाती है। बच्चे, बूढ़े, युवा सभी इस रंग में रंगना चाहते हैं। सामाजिक एकता, भाईचारा व सद्भावना को प्रदर्शित करने वाला यह त्योहार हमें अपने संस्कारों और मिट्टी से जुड़े रहने के लिए प्रेरित करता है।

होली का नाम अनायास ही स्मरण कराता है- प्रेम, रसमय, हास्यमय, समतावाला सामंजस्य का। हसरत और हरारत ने होली को अब भी जिंदा रखा है। मस्त, उज्जवल रंगों से सराबोर, फाग में राग भरी दीवानगी ही तो होली है। सबों पर इन रंगों का असर होता है, खुमारी चढ़ती है और मतवाला दिल गा उठता है-

‘दिल में हर्ष अपार है

अपनों के संग

हाथों में गुलाल है

कि रंग दूं होली के दो छंद

सुरमई आंखों में

सपने हजार हैं

उड़ती उमंगों को पकड़

गा लूं आज जी भर तोड़ सारे बंध’ सच! इस चुलबुले , मस्तीभरे त्योहार में भला कोई भी अछूता कैसे रह सकता है? होली के प्रत्येक रंग हमारे जीवन में प्रेम और सौहार्द से भरपूर हमारी अतुलनीय संस्कृति और ऐतिहासिक गाथाओं की कहानी सुनाता है।

मगर आज के परिवेश में वर्तमान पीढ़ी ने होली के महत्व को घटा दिया है। आज वैमनस्यता व ईर्ष्या भाव अधिक प्रतीत होते हैं, जबकि यह त्योहार तो सबको गले लगाने और एक रंग में रंग जाने का है। यही तो इस त्योहार की विशेषता है। शहरी कायनात की बेरंग होली और ग्रामीण कायनात की हुल्लड़ नाम से बख्शी गई होली एक अनकहा दर्द ही पैदा करती है।

इसलिए हमारा भी फर्ज़ बनता है कि इस पावन रंगों वाले त्योहार को बदरंग न करें। आज होली में वर्तमान पीढ़ी में कहीं न कहीं उस जोश की कमी नज़र आती है, जो कभी हमें अपनी मिट्टी से जोड़े रखती थी। पूरा मोहल्ला एक साथ सफाई करके अग़ज़ा जलाया करता था। महिलाएं गीत गाती हुईं स्नेहाशीष देती थीं, बच्चे, बड़े, बूढ़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते थे। आज भी जरूरत है सामाजिक गतिविधियों और हमारी सक्रियता से भावी पीढ़ियों की नींव में संस्कारों के बीज बोने की। हमारा दायित्व है कि हम अपने बच्चों के दिलों में भारतीय त्योहारों की महत्ता बताते हुए उनका स्थान दिलाएं, ताकि उनकी खुशियों के हर रंग में अपनी संस्कृति की खुशबू रहे। तभी तो हम और हमारा त्योहार अपनी ज़िम्मेदारी निभा पाएंगे।

आइए! एक बार फिर से हम इस रंगों भरी, राग भरी होली का अभिवादन करें। ईश्वर करे इस होली में हमारी सारी बुराइयां और नकारात्मकता अग़ज़ा की लकड़ियों के संग जल जाए और प्रेम के नए रंगों से हम सराबोर होकर एक साथ गाएं ‘होली आई रे...’।

सारिका भूषण रांची

होली आई रे...

गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।

कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।

मुंह लाल, गुलाबी आंखें हो और हाथों में पिचकारी हो।

-नज़ीर अकबराबादी

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Web Title: तुम्हीं ने मुझको प्रेम सिखाया
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