रांची

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‘ओ रे गृहोबासी खोल द्वार खोल, लागलो जे दोल...’

कि अब वस्ल(मिलन) का ही जुनूं है फागुन तेरा वह लम्स (स्पर्श) आज भी ताजा है। ऋतुराज वसंत के आगमन से प्रकृति जब...

Dainik Bhaskar

Mar 01, 2018, 03:45 AM IST
‘ओ रे गृहोबासी खोल द्वार खोल, लागलो जे दोल...’
कि अब वस्ल(मिलन) का ही जुनूं है

फागुन तेरा वह लम्स (स्पर्श)

आज भी ताजा है।

ऋतुराज वसंत के आगमन से प्रकृति जब रंगीन होने लगती है और फागुन के आने से वसंत, वासंती रंग का चोला पहनकर चुपके से उसे फाल्गुनी बना देता है, तब प्रकृति के रंग से रंगकर मनुष्य-मन भी प्रफुल्लित हो उठता है। बंगाल में होली को ‘दोल-उत्सव’ कहते हैं। और ‘दोल’ शब्द से ही रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन के रंगीन चित्र मानस-पटल पर उभर आते हंै। शांतिनिकेतन, पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के बोलपुर के पास स्थित प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र है। 1863 में रवींद्रनाथ के पिता महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर एकांत में ईश्वर आराधना एवं धर्म आलोचना के उद्देश्य से इसका निर्माण कराए थे। पर रवींद्रनाथ टैगोर शिक्षा, विशेषतः नारी शिक्षा के उद्देश्य से सन 1901 में यहां एक ब्रह्म-विद्यालय की स्थापना की जो कालांतर में ‘विश्वभारती-विश्वविद्यालय’ के रूप में विख्यात हुआ।

इस शांतिनिकेतन में ‘वसंतोत्सव’ भी अनोखा होता है। छात्र-छात्राएं इस उत्सव के लिए महीनों तैयारी करते हैं। पलाश-शिमुल-अशोक के लाल, केसरिया रंग में सराबोर होकर ऋतुराज वसंत जब मदमस्त चाल एवं फागुनी बयार से सबके तन एवं मन में रंगों का उमंग भर देता है, तब सुबह से ही शांतिनिकेतन के छातिम-वन में छात्र-छात्राएं एकत्रित होकर ढोल-मांदर-बांसुरी आदि के साथ ‘आजि बसोन्तो जाग्रोतो द्वारे...’ तथा ‘ओ रे गृहोबासी खोल द्वार खोल, लागलो जे दोल...’ आदि गाकर वसंत-उत्सव और होली की शुरुआत करते हैं। नृत्य-गीत के माध्यम से वसंत का स्वागत कर एक दूजे को अबीर-गुलाल तथा रंग से रंगीन कर देते हैं। यह एक अद्भुत दृश्य होता है। सैकड़ों छात्र-छात्राएं पारंपरिक बंगाली परिधान में समूह में नृत्य-गीत के साथ आस-पास के गांवों के लोगों के साथ भी होली खेलते हैं। सारा वातावरण होलीयाना रंग से रंगीन हो उठता है।

रिंकू बनर्जी रांची

शांतिनिकेतन का वसंतोत्सव

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