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चंचल सी हसीना जैसे स्वर्णमुद्रिका में नगीना अपना तो वैलेंटाइन है फागुन का महीना

फागुनी शाम और हास्य की फुहार। यह बात आगाज की, लेकिन जैसे-जैसे रात ने अंगड़ाई ली, हंसगुल्ले के पटाखे फूटे और जमकर...

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 03:50 AM IST
फागुनी शाम और हास्य की फुहार। यह बात आगाज की, लेकिन जैसे-जैसे रात ने अंगड़ाई ली, हंसगुल्ले के पटाखे फूटे और जमकर फूटे। कश्मीर, ओवैसी, खालिद और कन्हैया भी कविता के केंद्र बने। दरअसल, बुधवार को मारवाड़ी भवन में हास्य कवि सम्मेलन हुआ, जिसे दिल्ली से लेकर राजस्थान तक के कवियों ने शिखर तक पहुंचाया।

मधुबनी, बिहार के शंभु शेखर की हंसिकाएं लोटपोट करने को उतावली रहीं, बुढ़िया सी लग रही है जो चंचल सी हसीना, जैसे कि स्वर्णमुद्रिका में कोई नगीना, हर ओर मौज-मस्ती है, रंगों का जोर है, अपना तो वैलेंटाइन है फागुन का महीना। ढलती शाम में महफिल की एकमात्र शमा नैनीताल से पहुंचीं गौरी मिश्रा के गीत और उनके अंदाज-ए-बयां ने माहौल में तरंग ला दी। इस मखमली आवाज को तालियों का साथ भी मिला। उनकी पंक्तियां आप भी सुन लीजिए- होली खेलो रे जमके ब्रज वाली, सबको गालों पे आएं लगाओ लाली, दादा ने दादी को मारी पिचकारी, दादी ने प्रिया जैसी आंख मारी, दद्दू हैं भोले, दादी मतवाली। फिर टेक दोहराया- होली खेलो रे जमके ब्रज वाली। शादीशुदा के लिए कहा, अपनी से खेलो पराई से खेलो, जी चाहे जिसकी लुगाई से खेलो। अपनी पिचकारी से श्रोताओं को सराबोर और हंसलोट करने के बाद काव्य प्रेमिल हुआ, उनका स्वर मीठा गूंजा, बीमार-ए-इश्क में दिल की दवा के साथ आई हूं, मोहब्बत की अनोखी सी अदा के साथ आई हूं, महकने लगी रांची की हर गली क्योंकि, मैं नैनीताल की ताजा हवा के साथ आई हूं।

कार्यक्रम का आगाज करते सांसद महेश पोद्दार समेत कवि और आयोजन समिति के सदस्य।

देसी घी की जगह यदि कुरकुरे खिलाओगे तो भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस कहां से लाओगे : मुन्ना बैटरी

गंभीर भाव मुद्रा में मंदसौर के मुन्ना बैटरी ने कहा- मेरी खामोशी को मेरी कमजोरी मत समझना, मैं आंखों से काजल समेट जाता हूं। सच वो काजल पता नहीं समेट पाए कि नहीं, लेकिन हंसगुल्ले जरूर छोड़ते रहे। देसी घी की जगह यदि कुरकुरे खिलाओगे तो भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस कहां से लाओगे’ जैसी कविताओं से खूब हंसाया। जीवन की आम समस्याओं और फिल्मकारों के किरदारो पर व्यंग्य कर जोरदार तालियां बटोरीं। संचालन का दायित्व निभा रहे पद्मश्री डॉ. सुनील जोगी की एक बड़ी लोकप्रिय हास्य-कविता का आनंद लीजिए- मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्‍यार नहीं है खेल प्रिये, तुम एमए फर्स्‍ट डिवीजन हो, मैं हुआ मैट्रिक फेल प्रिये...। मौके पर आयोजन समिति के विनोद जैन, अशोक नारसरिया, ललित पोद्दार, सुरेश चंद्र अग्रवाल, रतन कुमार मोर, अनिल कुमार अग्रवाल, पवन शर्मा, पवन पोद्दार, कमल जैन, मनोज बजाज और किशोर मंत्री समेत अन्य लोग उपस्थित थे।

इन मशहूर कवियों ने दिलों को झकझोरा

वीर रस के सबसे बड़े हस्ताक्षर ने देश की सीमा पर शहीद होते जवानों के बावजूद सरकार की चुप्पी पर कहा- शायद तुम भी सत्ता मद के अहंकार में ऐठे हो, क्या 17 मंत्री मरने के इंतजार में बैठे हो। उनका स्वाभिमान इन पंक्तियों में उजागर हुआ:

मैं ताजों के लिए समर्पण वंदन गीत नहीं गाता

दरबारों के लिए कभी अभिनंदन गीत नहीं गाता।

-डॉ. हरिओम पवार

इटावा से आए इस कवि ने राष्ट्रगौरव भी उठान पर रहा। जो इस तरह अभिव्यक्त हुआ-

हृदय की धड़कनों में देश का सम्मान ही होगा

सदा मस्तक पटल पर ये उच्च अभिमान ही होगा

हमारी सांस की स्याही की अंतिम बूंद से यारो

लिखा जो शब्द जाएगा, वो हिंदुस्तान ही होगा।

-गौरव चौहान

राजस्थानी ठसक के साथ जयपुर के इस कवि ने दहाड़ा-

तूने कहा, सुना हमने, अब मन टटोल कर तू सुन ले

सुन-सुन ओ गद्दार ओवैसी, कान खोलकर सुन ले

जिस दिन मेरी संसद में शिवशंकर बन मोदी डोलेंगे

तू क्या तेरे अब्बा जी भी वंदेमातरम बोलेंगे।

-अब्दुल गफ्फार

कश्मीर, ओवैसी, खालिद, कन्हैया भी कविता के केंद्र बनते रहे