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परिणाम देनेवाली शिक्षण पद्धति पर जोर दें शिक्षक : प्रो. डॉ. विवेकानंदन

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 02:15 PM IST

लॉ विश्वविद्यालय रांची और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी बेंगलुरू द्वारा आयोजित तीन दिवसीय फैकल्टी...
लॉ विश्वविद्यालय रांची और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ़ इंडिया यूनिवर्सिटी बेंगलुरू द्वारा आयोजित तीन दिवसीय फैकल्टी ओरिएंटेशन प्रोग्राम का समापन बुधवार को धुर्वा स्थित न्यायिक अकादमी में हुआ। आखिरी दिन बेनेट यूनिवर्सिटी नोएडा के डीन ऑफ लॉ प्रो. (डॉ) वीसी विवेकानंदन ने परिणाम आधारित शिक्षण पद्धति और बौद्धिक संपदा कानून पर अपना व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि नेशनल लॉ स्कूल में पढ़ना बहुत बड़ी चुनौती है, क्योंकि सभी एनएलएस में आधुनिक शिक्षण पद्धति का उपयोग किया जाता है। बिना किताब पढ़ना एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर आया है। आजकल सूचना और संचार तकनीक के माध्यम से पठन-पाठन हो रहा है।

प्रो.डॉ. वीसी. विवेकानंदन ने कहा कि शिक्षकों को परिणाम आधारित शिक्षण पद्धति पर जोर देने की जरूरत है। इसके लिए सबसे जरूरी है परिणाम आधारित अध्ययन करना। सबसे जरूरी है सीखने वाले के व्यवहार को समझना। रचनात्मक तरीके से सेक्शन और सब-सेक्शन की व्याख्या पर विशेष जोर दिया जाना चाहिए। नई शिक्षण पद्धति अपनाएं, जिससे छात्रों को समझने में आसानी हो और कांसेप्ट बिलकुल स्पष्ट हो सके। जिस प्रकार हम फिल्म, संगीत, पेंटिंग, कला से खुद को जोड़ते हैं, ठीक उसी प्रकार पढ़ने और पढ़ाने से जुड़ने का प्रयास होना चाहिए। लॉ विवि रांची के प्रभारी कुलपति ने कहा कि यह ओरिएंटेशन प्रोग्राम शिक्षकों में ऊर्जा का संचार करेगा और ये बहुत ही फलदायक है। उन्होंने सभी रिसोर्स पर्सन को धन्यवाद दिया। साथ ही आगे भी ऐसे आयोजन कराने की बात कही, जिससे शिक्षक प्रेरित हों।

देश भर से आए फैकल्टीज ने पढ़ाई के नए तरीकों की जानकारी दी

स्टूडेंट्स को शिक्षण पद्धति के बारे में जानकारी देते प्रो. विवेकानंदन।

प्रो. डॉ. टीवी. सुब्बाराव : नेशनल लॉ विश्वविद्यालय बेंगलुरू के प्रोफेसर ऑफ लॉ प्रो. डॉ. टीवी. सुब्बाराव ने अपने व्याख्यान में कहा कि शिक्षक को ऐसे छात्रों को बढ़ावा देने की जरूरत है, जो खुद की विफलता स्वीकार करने की क्षमता रखते हैं। शिक्षकों को क्लास में जाने से पहले खुद को तैयार करना अति आवश्यक है। शिक्षक के पास पढ़ाने से पहले, क्या पढ़ाना है इसका प्लान होना चाहिए। कोई दो शिक्षक समान नहीं होते। दो शिक्षक एक ही विषय पढ़ते भी हैं, तो दोनों में काफी असमानताएं होंगी। किसी विषय को देखने का नजरिया और समझ अलग होगा और ऐसा ही होना चाहिए। शिक्षक को हमेशा कुछ अलग और नया जानना चाहिए, यही एक्ट ऑफ आर्ट है। उन्होंने कांस्टीट्यूशनल लॉ पर भी अपनी बातें रखी। कहा कि सभी को कांस्टीट्यूशनल लॉ पढ़ाने का अवसर नहीं मिलता। क्योंकि ये मजेदार होने के साथ बहुत ही चुनौती भरा है। उन्होंने लॉ टीचिंग पर बिंदुवार अपनी बात रखी।

प्रो. डॉ. पीएस. जायसवाल : राजीव गांधी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय पटियाला के कुलपति प्रो. डॉ. पीएस. जायसवाल ने कहा कि शिक्षकों में कुछ गुण होना बहुत जरूरी है। जिनमें सबसे महत्वपूर्ण गुण है उनका अनुशासन में रहना, दूसरा समय का पाबंद होना। शिक्षक समय पर क्लास में अाए और समय से क्लास खत्म करे। क्लास के दौरान छात्रों को क्लास में सोते हुए देखा जाता है। शिक्षक वो होता है, जो अपने पढ़ाने के ढंग से सोते हुए को भी जगा दे। उन्होंने संवैधानिक लॉ, संविधान और संविधान-वाद के बीच का अंतर समझाया।

प्रो. डॉ. एसएस. विश्वेश्वरैया : कर्णाटक विश्वविद्यालय के भूतपूर्व डीन प्रो. डॉ. एसएस. विश्वेश्वरैया ने लीगल राइटिंग और अनुसंधान प्रक्रिया पर अपना व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि संसार में जितने भी पेशेवर हैं, सबके पास अपना एक औजार होता है, पर वकील एकमात्र ऐसे पेशेवर हैं, जिनका औजार केवल उनके शब्द हैं।

प्रो. डॉ. वी. विजयकुमार : नेशनल लॉ विवि बेंगलुरू के प्रोफेसर ऑफ लॉ सह फैकल्टी ओरिएंटेशन प्रोग्राम के कोऑर्डिनेटर प्रो. डॉ. वी. विजयकुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने अपने अभिभाषण में कहा कि शिक्षण कार्य जॉब नहीं है, बल्कि जुनून है। शिक्षक को स्वार्थी नहीं होना चाहिए, क्योंकि एक शिक्षक की गलती का खामियाजा एक पूरे बैच को भुगतना पड़ता है। उनके ऊपर सभी छात्रों और शिक्षण संस्थान के भविष्य की जिम्मेदारी है।

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