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सुशीला मिश्रा : लड़कियों की उच्च शिक्षा के लिए घर-घर में फैलाई जागरूकता

दीक्षा कुमारी

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 01, 2018, 02:20 PM IST

दीक्षा कुमारी रांची

मेरे पिता पंडित रमा शंकर उपाध्याय ब्रिटिश राज्य में रजिस्ट्रार थे। उनका हमेशा ट्रांसफर होता रहता, जिससे हम भी घूमते रहते। मां मुनेश्वरी देवी घर-गृहस्थी संभालती थीं। हमारे समय में लड़कियों को ज्यादा पढ़ाया नहीं जाता था, न ही स्कूल भेजा जाता था। लेकिन, मेरे पिताजी हमेशा हम सभी को उच्च शिक्षित करना चाहते थे। हमारी पढ़ाई के लिए कोई समझौता नहीं करते। हमारे लिए घर में ही ट्यूशन टीचर रख दिए गए जो हम पांचों बहनों को पढ़ाने आते थे। इसी तरह पढ़ते हुए मैंने ओपन स्कूल से 1951 में मैट्रिक की परीक्षा दी और अच्छे नंबरों से पास हो गई। फिर मैं पटना यूनिवर्सिटी से आगे की पढ़ाई पूरी की। हालांकि, मां नहीं चाहती थीं ऐसा, लेकिन मैं मां के सारे काम कर देती, तो वे मना भी नहीं कर पाती थीं। इसी तरह मैंने हिस्ट्री में एमए किया और साथ ही बीएड की डिग्री भी ली। मैं लॉ पढ़ना चाहती थी, इसलिए उस समय लॉ में दाखिला भी ले लिया, लेकिन सौभाग्यवश उस समय पिताजी मुझे रांची आने के लिए कहे। मेरा लॉ का एग्जाम होने वाला था, लेकिन पिताजी ने कहा कि रांची लड़कियों के रहने के लिए अच्छी जगह है, यहां आ जाओ। पिताजी की बात मान कर मैं 1958 में रांची आ गई और वीमेंस कॉलेज में हिस्ट्री पढ़ाने लगी।

79 साल में भी हैं एक्टिव, लड़कियों को देती हैं डिसिप्लिन की सीख

वीमेंस कॉलेज की प्रिंसिपल रह चुकीं सुशीला मिश्रा का जन्म गाजीपुर जिला के गहमर गांव में 5 मार्च, 1939 को हुआ। 5 बहन, 2 भाइयों में चौथे नंबर पर हैं। बिहार की पहली महिला यूनिवर्सिटी प्रोफेसर बनीं।

सिर्फ 9 लड़कियां कॉलेज पढ़ने आती थीं

जब मैंने वीमेंस कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया था, तब बहुत कम लड़कियां कॉलेज आती थीं। मेरे क्लास में सिर्फ 9 लड़कियां थीं। धीरे-धीरे स्टूडेंट्स बढ़े, दूसरे डिपार्टमेंट की भी स्टूडेंट्स मेरे डिपार्टमेंट में आने लगीं, जिससे मेरा हौसला बढ़ता गया। कम समय में ही मैं रांची में सभी से जुड़ गई, तभी पिताजी ने कहा कि बनारस में बीएचयू ज्वॉइन करो, जहां मेरे काफी रिश्तेदार थे। मैंने झट से पिताजी से कहा, ‘बाबूजी, मैं रांची में रह कर ही पढ़ाना चाहती हूं, अपने काबिलियत पर अपने पैर पर खड़ा होना चाहती हूं। जब पटना से रांची आई तो यहां कॉलेज हॉस्टल में रहती थी। शुरू से डिसिप्लिन में रही थी, तो यहां आने के बाद भी पिताजी कहीं घूमने जाने नहीं कहते। उस समय जब हम सब कहीं निकलते थे तो सिर्फ स्ट्रीट लाइट देखने। उस समय रांची में स्ट्रीट लाइट की जगह पर लालटेन टंगा होता था। पूरे रास्ते में उसी की रोशनी दिखती थी। यह सब हमारे लिए नया था। हमलोग रोड पर गाड़ी गिनने निकलते थे, पूरी रांची शहर में सिर्फ 3 कार ही दिखती थी। पटना से रांची आने के लिए हमें रामगढ़ जाना होता था, वहा से ट्रेन मिलती थी। खरीदारी करने रिफ्यूजी मार्केट जाते थे, साथ ही शॉपिंग के लिए बेस्ट प्लेस था फिरायालाल। अक्सर वहां शाम में जाते और अंधेरा होने से पहले वापस आ जाते थे।

जब मैं पटना यूनिवर्सिटी में थी, कॉलेज के बाहर एक लड़की रो रही थी। वह भूखी थी और पढ़ना चाहती थी। मैंने उसकी परेशानी समझी। मैं घर आई और अपने भाई-बहनों से कुछ पैसे मांगे। उनकी पॉकेट मनी लेकर दूसरे दिन कॉलेज जाकर उसका दाखिला कराया और किताबें जुगाड़ कीं। फिर इसी तरह लोगों की मदद करती रही। जब वीमेंस कॉलेज में थी, एके धान रांची यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर थे। उन्होंने मुझसे कहा कि चाईबासा कॉलेज महीनों से बंद है, उसे सिर्फ आप खुलवा सकती हैं। मैंने भी चैलेंज लिया और हां बोल दी। मैं चाईबासा पहुंच गई। कॉलेज की सभी लड़कियां गेट लॉक कर खड़ी थीं। मैंने उनसे कहा कि मैं आपकी प्रॉब्लम सॉल्व करने आई हूं तो आप अपनी बातें खुल कर कहिए। मुझे प्रिंसिपल की तरह नहीं देखिए। लड़कियों ने गेट खोली और प्रिंसिपल रूम खुलवाया। मैंने ग्राउंड में बैठ कर उनकी प्रॉब्लम सुनी और उसे सॉल्व करने में लग गई। कॉलेज अपने रेगुलर डेज की तरह चलने लगा। आसपास की लड़कियों को कॉलेज में पढ़ाने के लिए कहा, क्योंकि उस समय टीचर्स की कमी थी। इस तरह वो भी मेरी मदद में लग गईं। सबके साथ मिलकर इलाके की लड़कियों को कॉलेज से जोड़ने की मुहिम चलाई। बड़ी संख्या में लड़कियां शिक्षा प्राप्त करने कॉलेज आने लगीं।

मेरी शादी 1964 में डॉ. एनपी मिश्रा से हुई। वे पटना यूनिवर्सिटी के फिलॉस्फी डिपार्टमेंट के हेड हुआ करते थे। अभी 2 बेटों के साथ रहती हूं- नीतीश और रोहित। लड़कियों के लिए हॉस्टल चलती हूं। जिस डिसिप्लिन में रही हूं, उन्हें भी वैसी ही रखने का प्रयास करती हूं।

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