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एक ही प्रांगण में मां काली मंदिर और कुल्हाड़ी बाबा का मजार

1. श्रीश्री मां आनंदमयी का आश्रम पूरे भारत में 20 स्थानों तथा बांग्लादेश में 2 स्थानों पर हंै। 13 दिसंबर, 1953 में मां...

Dainik Bhaskar

Feb 01, 2018, 02:20 PM IST
एक ही प्रांगण में मां काली मंदिर और कुल्हाड़ी बाबा का मजार
1. श्रीश्री मां आनंदमयी का आश्रम पूरे भारत में 20 स्थानों तथा बांग्लादेश में 2 स्थानों पर हंै। 13 दिसंबर, 1953 में मां आनंदमयी रांची आई थीं और यहां आश्रम स्थापित करने की इच्छा व्यक्त की। युवा दंत चिकित्सक डॉ. प्रियरंजन घोष ने अपने नर्सिंग होम को आश्रम के लिए दान दे दिया। बाद में वे साधु बन गए। डॉ. घोष ने मां काली की मूर्ति बनाने के लिए सोना भी दान में दिया। कोलकाता के मूर्तिकार नित्य पॉल ने अष्ट धातु से मां काली की मूर्ति बनाई, जिसकी स्थापना 13 नवंबर, 1955 को मां आनंदमयी की उपस्थिति में हुई। प्राण-प्रतिष्ठा करते समय अलौकिक घटना घटी। मां काली की मूर्ति का लॉकेट हिलने लगा। मां आनंदमयी ने कहा कि अब इसमें मां काली प्रवेश कर गई हैं। मुख्य मंदिर में मां काली के साथ दादी मां जो मां आनंदमयी की माता हैं और स्वामी भोलेनाथ जी उनके पति हैं, की मूर्तियां बाद में स्थापित की गईं।

राधा-कृष्ण मंदिर

रांची में सांप्रदायिक सौहार्द का अनूठा मिसाल है मेन रोड में सुजाता सिनेमा हॉल के पास स्थित श्रीश्री मां आनंदमयी आश्रम और हजरत कुल्हाड़ी शाह बाबा का मजार। यहां मंदिर की घंटियों की खनक और अजान की आवाज एक साथ कानों में रस घोलती हैं।

4 तथ्य जो बताते हैं मंदिर-मजार का इतिहास

2. इस तीन तल्ले आश्रम में मां काली के अलावा राम मंदिर, शिव मंदिर और राधा-कृष्ण मंदिर भी हंै। इस आश्रम में दुर्गा पूजा, जन्माष्टमी, सरस्वती पूजा के साथ-साथ मां आनंदमयी का जन्मोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। काली पूजा में विशेष अनुष्ठान होते हैं, दूर-दूर से लोग पूजा के लिए आते हैं और अपनी मन्नतें पूरी करते हैं।

3. ऐसी मान्यता है कि हजरत कुल्हाड़ी शाह बाबा उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में उत्तर प्रदेश स्थित कछौछा शरीफ से रांची आए थे। उनका सिलसिला हजरत मकदूम शाह से है। वह दीन-दुखियों की सेवा करते और अकीदतमंदों की परेशानी सुनते और उनका निदान करते थे। वह अपने साथ हमेशा कुल्हाड़ी लेकर चलते थे, इसलिए उनको लोग कुल्हाड़ी शाह बाबा के नाम से पुकारते थे। हजरत कुल्हाड़ी शाह बाबा कर्बला के बगल में बरगद के पेड़ के पास बैठकर इबादत किया करते थे। बरगद का पेड़ आज भी है। कुल्हाड़ी शाह बाबा के इंतकाल के बाद लोगों ने उन्हें कर्बला के बगल में दफन किया। पहले मजार झोपड़ीनुमा था और उनकी कब्र मिट्टी की थी। अब उनकी कब्र को पक्का कर दिया गया है। कर्बला और उनके मजार परिसर का जीर्णोद्धार किया जा रहा है।

काली मंदिर

बाबा की मजार

4. हजरत कुल्हाड़ी शाह का मजार एवं कर्बला में अकीदतमंद आकर मन्नतें मानते हैं। यहां सभी धर्मों को मानने वाले लोग आते हैं। यहां समय-समय पर फतेहा खानी, कुरआन खानी और लंगर खानी होता रहता है, परंतु विशेषकर मुहर्रम के एक से 10 तारीख को अकीदतमंद काफी संख्या में आते हैं। यहां उर्स का आयोजन भी होता है। इस मजार की देखरेख एवं संचालन हजरत कुल्हाड़ी शाह बाबा(रह.) दरगाह कर्बला ट्रस्ट करती है। -डॉ. मो. जाकिर, साहित्यकार, शिक्षाविद्

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