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यहां शरीर को कष्ट देकर भोलेशंकर काे खुश करते हैं लोग, महिलाएं रखती हैं सिर पर अंगारे तो पुरूष चलते हैं उन पर

परिवार की खुशहाली के लिए बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक दहकते अंगारों पे चलते हैं

Bhaskar News | Last Modified - May 01, 2018, 01:22 PM IST

    • परंपरा की शुरुआत नागवंशी राजाओं ने की थी

      रांची.राजधानी के अरगोड़ा में मंडा पूजा चल रही है। भगवान भोले शंकर को अपनी भक्ति की शक्ति से खुश करने के लिए करीब सप्ताह भर पूजा की जाती है। पूजा के दौरान बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक दहकते अंगारों पर चलते हैं। इससे पहले वे अंगार स्थल महादेव की पूजा और परिक्रमा करते हैं।


      दो तरह के लोग इस पूजा में शामिल होते हैं, एक तो वे जिन्हें मन्नत मांगनी होती है, दूसरे वे जिनकी मन्नत पूरी हो गई होती है। यह पूजा अच्छी बारिश की कामना के लिए भी की जाती है, ताकि अच्छी बारिश से अच्छी खेती हो और परिवार सुख-शांति से रहे। पूजा से पहले मुख्य भोक्ता कलश का जल छिड़कर सबकी शुद्धि करते हैं।

      परंपरा की शुरुआत नागवंशी राजाओं ने की थी

      मंडा पूजा का इतिहास काफी प्राचीन है। लोग बताते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत नागवंशी राजाओं ने की थी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, झारखंड में की जानेवाली मंडा पूजा भगवान भोले शंकर की पहली पत्नी सती के बलिदान की याद में की जाती है। मंडा पूजा करनेवाले भक्त इसे माता सती का आशीर्वाद मानते हैं। बहरहाल, श्रद्धा भक्ति के नाम पर मासूम बच्चों को भी दहकते अंगारों पर झूला झुलाना थोड़ा अमानवीय जरूर लगता है, लेकिन यह भी सच है कि भक्ति और श्रद्धा के मामले में तर्क की कोई जगह नहीं होती।

      इस पूजा के दौरान भक्त अपने शरीर को कष्ट देकर कड़ी परीक्षा से गुजरते हैं। इसमें भी सबसे कष्टप्रद होता है जलते अंगारों पर चलने की। जो भक्त इस अनुष्ठान के लिए तैयार होते हैं, उन्हें भोक्ता कहा जाता है। वे स्नानादि कर इस प्रक्रिया में शामिल होते हैं। महिलाएं भी सिर पर कलश रख अंगारों पर तबतक चलती हैं, जबतक उनमें सहने की शक्ति रहती है। भक्तों के चलने से जब आग ठंडी पड़ जाती है, तब उसे सूप से हवा देकर फिर दहकाया जाता है, ताकि भक्तों की परीक्षा चलती रहे।

      प्रकृति को बचाने के लिए शुरू की पूजा


      गिरधारी राम गाेंझू के अनुसार, इस पूजा को लेकर मान्यता तो अलग-अलग हैं। लेकिन, कहा जाता है कि प्राचीन काल में असुर समुदाय के लोग लोहा पिघलाने के लिए भारी मात्रा में जंगलों को काटकर आग जलाकर उसमें लोहा पिछलाते थे। इससे प्रकृति नष्ट होने लगी। तब भगवान ने बीमार आदमी का रूप धर असुरों से कहा कि वे खुद को अग्नि को समर्पित करेंगे तो लोहा क्या हीरे-मोती मिलेंगे। यह सुन असुर खुद को आग में झोंकने लगी। तभी से इसकी शुरुआत मानी जाती है।

      वीडियो: मुकेश भट्ट।

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      जो भक्त इस अनुष्ठान के लिए तैयार होते हैं, उन्हें भोक्ता कहा जाता है।
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