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102 साल से लगी आग को बुझाने का प्रयास, बचाएंगे 1864 मिलियन टन कोयला

झरिया फायर प्रोजेक्ट के सबसे अधिक फायर वाले राजापुर प्रोजेक्ट में लगातार काम चल रहा है।

Dainikbhaskar.com | Last Modified - Apr 17, 2018, 11:21 AM IST

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    राजापुर फायर प्रोजेक्ट। जहां जल रहे कोयले का किया जा रहा है खनन।

    धनबाद(झारखंड)। 102 साल से झरिया के जमीन के नीचे स्थित कोयले में आग लगी हुई है।झरिया फायर प्रोजेक्ट के सबसे अधिक फायर वाले राजापुर प्रोजेक्ट में लगातार काम चल रहा है। 80 से 200 डिग्री सेल्सियस से अधिक के तापमान में कोयला मजदूर जलते कोयले की दीवारों (परत) को चीर रहे हैं। धधकते 1864 मिलियन टन कोयले को बचाने का प्रयास शुरू हो चुका है। ताकि तीन सालों तक इन कोयलों से अपना देश रोशन रहे।

    ऐसे हो रहा फायर प्रोजेक्ट में खनन : पानी आधारित अपनाई गई तकनीक
    फायर प्रोजेक्ट में खनन के लिए पानी आधारित तकनीक अपनाई गई। माइंस के पानी को पाइप के माध्यम से प्रोजेक्ट के हर कोने में पहुंचाया गया। जिस जगह पर जलते कोयले का खनन करना होता है, उस जगह पर तेज धार से पानी दिया जाता है। इससे कोयले में लगी आग थोड़ी कम होती है। आग कम होते ही उसे मशीनों के माध्यम से निकाल लिया जाता है। निकाले गए कोयलों को जहां डंप किया जाता है, वहां भी पानी दिया जाता है। ताकि, कोयले की आग पर पूर्णत: अंकुश लग सके।

    गलत माइनिंग से साल 1916 में लगी आग
    सुरंग बनाकर खनन की प्रक्रिया अवैज्ञानिक थी, जिसे आजादी के बाद निजी कोल मालिकों ने जारी रखा। कोयले का गुण है जलना। अगर एक तय समय में कोयले को नहीं निकाला जाए तो वह स्वतः: जल उठेंगे। झरिया व आसपास के खदानों में 45 प्रतिशत कोयला जमीन के अंदर ही रह गया। अंदर के तापमान ने इन्हें जलने का मौका दिया। कोयला धधक उठा। साल 1916 में भौरा कोलियरी में आग लगने का पहला प्रमाण मिला था।

    ऐसे फैली आग : 1986 में 17 किमी स्क्वायर क्षेत्र जला
    साल 1986 में पहली बार आग का सर्वे कराया गया। सर्वे में 17 किमी स्क्वायर क्षेत्र जमीनी आग से जलता हुआ मिला। हुआ कुछ यूं कि तय समय पर नहीं निकाले गए 45 प्रतिशत कोयलों की अलग-अलग सिम में आग लगी। माइंस के सुरंग के रास्ते हवा मिली। कंबाइंड सिम (एक-दूसरे जुड़ी सिम) होने के नाते आग धीरे-धीरे फैलती गई। आग से बचाव के लिए बालू भराई किया गया, पर वह सफल नहीं रहा।

    साल 2006 : सर्वे में 3.01 किमी स्कवायर क्षेत्र में आग
    एनआरएससी (इसरो) ने धनबाद में फायर की स्थिति पर सर्वे किया। आग 3.01 किलोमीटर स्क्वायर क्षेत्र में मिला। बीसीसीएल के सामने इन जल रहे कोयलों को बचाने की चुनौती थी। ओपनकास्ट प्रोजेक्ट (ओसीपी) के माध्यम से फायर प्रोजेक्ट में खनन की योजना बनाई गई। योजना पर काम हुआ। साल 2012 में पुन: सर्वे हुआ तो 0.83 किमी स्क्वायर जलते क्षेत्र में आग कम मिली।

    भूमिगत आग से प्रभावित 54 हजार परिवार बेलगढ़िया में बसाए जाएंगे
    अग्नि और भू-धंसान प्रभावित इलाकों के 54 हजार परिवारों का बेलगढ़िया नया आशियाना बनेगा। गगनचुंबी इमारतों में विस्थापितों का आवास आकार ले रहा है। प्रभावित लोगाें को 400 स्क्वायर फीट का मकान मिलेगा। जिसमें किचन, डायनिंग हॉल, एक बेडरूम, शौचालय शामिल है। कॉलोनी में सड़कों का जाल बिछेगा।

    जलते कोयले को बचाना है तो जल्द खनन कर निकालना होगा
    झरिया व आसपास के इलाके में जल रहा कोयला विश्व स्तरीय है। इसे जलने से बचाने का एक ही उपाय है कि इन्हें निकाला जाए। फायर प्रोजेक्ट में खनन ही इसका रास्ता है। फायर प्रोजेक्ट में खनन कर सिर्फ आप कोयले को बर्बाद होने से ही नहीं बचाते, बल्कि आग पर भी काबू पाते हैं। समय रहते जल रहे कोयले को खनन कर निकाल लेना जरूरी है। - दीपक कुमार, माइंस सेफ्टी विषय पर शोधकर्ता


    ओपनकास्ट माइनिंग के जरिए निकालना होगा जलता कोयला
    झरिया जैसे फायर एरिया में बिना ओपन कास्ट कोयला निकालना संभव नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में ऊपरी सतह में पहले ओपन कास्ट माइनिंग से कोयला निकालना होगा, फिर आग बुझ जाने के बाद नीचे के कोयले को सामान्य माइनिंग प्रक्रिया से खनन करना होगा। जल रहे कोयले को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर खनन करना होगा। इसके लिए व्यापक योजना बनानी होगी।- डॉ. राजेंद्र सिंह, मुख्य वैज्ञानिक, सीएसआईआर सिंफर

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    प्रोजेक्ट चारों तरफ आग से घिरा है। इसके आसपास बस्तियां भी बसी हुईं हैं। आग के बीच जिंदगी जद्दोजहद कर रही है। घरों में जमीनी आग की तपिश है। दीवारों पर दरारें हैं। घर की आंगन से धुआं निकल रहा है।
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