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बिना सैलरी के रहे, बीमारी में भी नहीं मिली छुट्टी, ऐसी है चारा घोटाला ब्रेक करने वाले आईएएस की कहानी

बिना सैलरी के रहे, बीमारी में भी नहीं मिली छुट्टी, ऐसी है चारा घोटाला ब्रेक करने वाले आईएएस की कहानी

Danik Bhaskar | Jan 06, 2018, 02:47 PM IST
अमित खरे अमित खरे

रांची (झारखंड)। बिहार में लगभग 950 करोड़ रुपए के चारा घोटाले का खुलासा सबसे पहले आईएएस ऑफिसर अमित खरे ने किया था। अमित उस समय चाईबासा जिले के कलेक्टर थे। चारा घोटाला सामने लाने के कारण उस समय अमित खरे की ऐसी जगह पोस्टिंग कर दी गई थी, जहां सैलरी ही नहीं मिलती थी। अपने पिता के इलाज के लिए छ़ुट्टी मांगने गए इस कलेक्टर को लीव भी नहीं दी गई। प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटे थे लालू...

- वह नब्बे के दशक का दौर था, जब बिहार में लालू प्रसाद प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापस लौटे थे। दिल्ली की सत्ता भी उनके इशारे पर चलती थी और मीडिया ने उन्हें किंग मेकर का नाम दिया था। ऐसे में एक बाहुबली नेता से सीधे टकराना किसी भी ऑफिसर के लिए बड़ी हिम्मत की बात थी।

करियर और सुरक्षा दोनों पर था खतरा


- ऐसे में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले इस नौकरशाह के सुनहरे कैरियर और सुरक्षा दोनों पर खतरा उत्पन्न हो गया था। तत्कालीन कलेक्टर रहे अमित खरे ने इन तमाम लाभ-हानि पर सोचे बगैर भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंका। पशुपालन विभाग के फर्जी विपत्र के माध्यम से गलत भुगतान की जानकारी मिलते ही उन्होंने घोटाले के खिलाफ पहली एफआईआर दर्ज कराने की हिम्मत की।

- अमित खरे ने ही चाईबासा कोषागार से 34 करोड़ रुपये की अवैध निकासी के मामले को पकड़ा और इस पर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया। चर्चित चारा घोटाला के घोटालेबाजों के खिलाफ यह कार्रवाई मील का पत्थर साबित हुई।

- फर्जी विपत्रों के सहारे दूसरे जिलों में भी इसी तरह के खेल चल रहे थे। इस कार्रवाई के बाद दूसरे जिलों के कलेक्टर भी नींद से जागे, जिसके बाद देश के सबसे चर्चित घोटाले का खुलासा हो सका। बाद में सीबीआई जांच शुरू होने के बाद घोटाले के परत दर परत खुलते गए।

- आईएएस ऑफिसर अमित खरे के कारण ही आज कई सालों तक की सुनवाई के बाद चारा घोटाले के मामले में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद सहित कई ताकतवर लोगों को सजा हो सकी है।

झारखंड के डेवलपमेंट कमिश्नर हैं, चीफ सेक्रेटरी के रेस में भी आगे हैं


- अमित खरे 1985 बैच के आईएएस ऑफिसर हैं। फिलहाल झारखंड के डेवलपमेंट कमिश्नर हैं। अमित खरे की वाइफ निधि खरे भी आईएएस ऑफिसर हैं। निधि फिलहाल झारखंड में कार्मिक की प्रधान सचिव हैं।

- झारखंड के अगले चीफ सेक्रेटरी के लिए भी अमित खरे का नाम रेस में सबसे आगे चल रहा है। हालांकि सेंट्रल गर्वमेंट ने अमित खरे की सेवा मांगी है और इसके लिए चीफ सेक्रेटरी राजबाला वर्मा को लेटर भी भेजा है।

सरकार ने तत्काल कर दिया था ट्रांसफर, मेधा घोटाला पर लगाई थी रोक

- अमित खरे ने जब चारा घोटाले को उजागर किया तो उनके सामने परेशानियां आनी शुरू हो गईं। घोटाले का खुलासा करने के बाद उनका तत्काल ट्रांसफर बिहार स्टेट लेदर कॉरपोरेशन में कर दिया गया। यहां उन्हें बगैर सैलरी के कुछ सालों तक रहना पड़ा था।

- बाद में इन्हें राजस्व में तैनात कर दिया गया। झारखंड कैडर में आने तक उन्हें बिहार में शंटिंग पोजिशंस में ही रखा गया। इन सबके बावजूद भी अमित खरे सत्य और ईमानदारी के रास्ते पर अडिग रहे।

- बोर्ड ऑफ रेवेन्यू में तैनाती के दौरान उन्होंने 1997 में पहली बार बिहार में मेडिकल और इंजीनियरिंग की संयुक्त प्रवेश परीक्षा की शुरुआत की। इसके पीछे इनका विजन बिहार में जारी मेधा घोटाला को रोकने का था। उनकी इस कोशिश का बेहतर परिणाम सामने आया।

अंतिम समय पिता को नहीं दे सके वक्त, सरकार ने नहीं दी छुट्टी

- अमित खरे के लिए सबसे मुश्किल दौर 1997 में आया। उनके पिता बीमार थे। वहीं दूसरी तरफ तत्कालीन बिहार सरकार उन्हें हर ढंग से परेशान कर रही थी।

- अमित खरे ने अपने बीमार पिता को डॉक्टर से दिखाने के लिए छुट्टी ली थी। मगर रांची पहुंचते ही उनकी छुट्टी खारिज कर दी गई। तुरंत पटना तलब किया गया। इसी बीच उनके पिता का देहांत हो गया, जिसके बाद ही इन्हें सरकार ने छुट्टी दी थी। उनके परिवार के लिए यह कठिन वक्त था।

यह मेरा कर्तव्य था, लोग पूछते हैं कि डर नहीं लगा : अमित खरे

- देश के चर्चित घोटाले को सामने लाने वाले अमित खरे की तारीफ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत कुमार डोभाल ने भी की है। ट्विटर पर डोभाल ने चारा घोटाले से संबंधित एक खबर को टैग करते हुए लिखा है।

- ऐसे अधिकारियों के बारे में बराबर सुना है जो नेताओं के जूते चाटते हैं, लेकिन एक ऐसा भी अधिकारी है जिसने ईमानदारी से अपना काम किया।

- पूरे मामले पर अमित खरे ने कहा कि यह मेरा कर्तव्य था, जिसे मैंने ईमानदारी के साथ निभाया। आज भी लोग पूछते हैं कि ये सब करने से पहले डर नहीं लगा। परिवार की सुरक्षा और करियर पर खतरा हो सकता था।

चाईबासा ट्रेजरी में खुद मारा था छापा, भाग गए थे ऑफिसर और कर्मचारी

- अमित खरे बताते हैं कि 27 जनवरी 1996 को उन्होंने चाईबासा ट्रेजरी पर खुद रेड की थी। इसके बाद विभाग के बिलों को मिलाना शुरू किया। वहां पता चला कि सभी बिल एक ही वितरक के थे और सभी फर्जी भी थे।


- छापेमारी की बात पता चलते ही जिले के पशुपालन अधिकारी और उनके सहायक फरार हो गए। इसके बाद अमित खरे खुद मजिस्ट्रेट के साथ पशुपालन अधिकारी के ऑफिस पहुंचे।

- वहां चारों ओर कैश, बैंक ड्राफ्ट और नकली ट्रेजरी बिल बिखरे पड़े हुए थे, जिसे देखकर हर कोई हैरान हो गया। इसके बाद ऑफिस को सील किया गया। पुलिस को सूचना दी गई और पहली एफआईआर दर्ज की गई।

- यह मामला वहां के हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में खूब छपा। इसके बाद कलेक्टर अमित खरे हीरो बन चुके थे। हालांकि इसका श्रेय अमित खरे सतर्क मीडिया को ही देते हैं।

आज भी रात आठ बजे तक ऑफिस में काम करते दिखते हैं

- डेवलपमेंट कमिश्नर अमित खरे आज भी झारखंड मंत्रालय में रात आठ बजे तक फाइलों के बीच ऑफिस में दिख जाते हैं। अमित खरे के पास फिलहाल राज्य की योजनाओं की मॉनिटरिंग की जिम्मेवारी है।
- खरे कहते हैं कि गलत को उजागर करना और दंडित कराना उनका कर्तव्य था। वे सिविल सेवा में आम लोगों की बेहतरी और नए भारत के निर्माण के लिए आए हैं। इसलिए गलत के खिलाफ आवाज उठाना उनकी नैतिक जिम्मेवारी थी।